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Congress Party: दुविधा से जूझती कांग्रेस

Posted On: 10 Feb, 2014 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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sanjay gupta15वीं लोकसभा का अंतिम विस्तारित सत्र जिस तरह शोर-शराबे की भेंट चढ़ रहा है उससे यही प्रतीत हो रहा है कि संप्रग सरकार शासन करने की इच्छाशक्ति गंवा चुकी है। केंद्र सरकार संसद में हो रहे हंगामे के लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकती, क्योंकि इस अव्यवस्था में खुद कांग्रेस के सांसद भी शामिल हैं। अब यह अच्छे से साबित हो रहा है कि आंध्र प्रदेश के पुनर्गठन का फैसला राजनीतिक लाभ के इरादे से लिया गया था। चूंकि कांग्रेस ने तेलंगाना पर सभी पक्षों के साथ विचार-विमर्श कर आम सहमति कायम करने की पहल नहीं की इसलिए वह न तो तेलंगाना समर्थक दलों को संतुष्ट कर पाई और न ही विभाजन का विरोध कर रहे सीमांध्र के सांसदों को। हालांकि कैबिनेट ने एक विशेष बैठक के जरिये तेलंगाना विधेयक पर मुहर लगा दी, लेकिन देखना यह है कि वह संसद से पारित हो पाता है या नहीं और इसके सीमांध्र में कैसे परिणाम सामने आते हैं? ध्यान रहे कि आंध्र के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी समेत अन्य कांग्रेसी नेता बगावत के मूड में हैं। तेलंगाना विधेयक के पारित होने की संभावना के साथ ही इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अन्य विधेयकों के पारित होने के आसार अभी भी नहीं दिख रहे। माना जा रहा है कि विपक्ष तेलंगाना विधेयक का समर्थन इसी शर्त पर करेगा जब सत्तापक्ष अन्य विधेयक पेश करने पर जोर नहीं देगा। इसका मतलब है कि राहुल गांधी के पसंदीदा भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक पारित नहीं हो सकेंगे।

कानून का दिखावटी शासन


यह समझना कठिन है कि जो सत्र केवल लेखानुदान पारित करने के लिए बुलाया गया उसमें सरकार ने 39 विधेयक पारित कराने का लक्ष्य क्यों तय कर लिया? क्या इसलिए कि देश को यह संदेश दिया जा सके कि सरकार लंबित विधेयकों को लेकर बहुत गंभीर है या इसलिए कि राहुल गांधी को यह श्रेय दिया जा सके कि वह भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए प्रतिबद्ध हैं? यह समझ आता है कि कांग्रेस आम चुनाव को देखते हुए राहुल की छवि निखारना चाहती है। सवाल यह है कि क्या केवल पांच कथित भ्रष्टाचार विरोधी विधेयकों के पारित होने से भ्रष्टाचार पर अंकुश लग जाएगा? भ्रष्टाचार की जड़ में तो राजनीतिक दलों का कामकाज और उनके अपारदर्शी तौर-तरीके हैं। आज राजनीति जिन तौर-तरीकों से संचालित हो रही है वे मुख्य रूप से कांग्रेस की देन हैं। राहुल भ्रष्टाचार से लड़ने और सिस्टम को सुधारने की बातें तो कर रहे हैं, लेकिन वह यह स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं कि राजनीतिक दलों के कामकाज में सुधार कैसे होगा? चुनावी राजनीति काले धन पर आधारित है। राजनीतिक दल चंदे के बारे में साफ-साफ बताने के लिए तैयार नहीं। वे बीस हजार रुपये से कम के चंदे के स्नोत को सार्वजनिक न करने के नियम का खुलकर फायदा उठा रहे हैं। आखिर ऐसे में वे किस मुंह से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की बातें कर रहे हैं? 1 केंद्र सरकार भलीभांति यह जानती थी कि 15वीं लोकसभा का अंतिम सत्र पिछले कुछ सत्रों की तरह हंगामे और शोर-शराबे का शिकार होगा, बावजूद इसके उसने राजनीतिक लाभ के लिए करीब तीन दर्जन विधेयकों को आगे बढ़ाने का फैसला कर लिया। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि खुद सरकार इन विधेयकों को पारित कराने के प्रति गंभीर नहीं। अगर गंभीर होती तो विपक्ष को विश्वास में लिए बगैर विवादित विधेयक लेकर नहीं आती। ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस अपनी रणनीति को लेकर बुरी तरह दुविधा से ग्रस्त है। इस दुविधा के प्रमाण संसद के बाहर भी दिखते हैं। बतौर उदाहरण कांग्रेस का एक वर्ग राहुल गांधी को चेहरे के रूप में आगे कर आम चुनाव में उतरना चाह रहा था, लेकिन पुराने नेताओं के एक वर्ग ने एक अलग ही धारणा पेश कर दी। इससे पार्टी के साथ-साथ सरकार की किरकिरी ही हुई। इसके बाद पार्+टी की किरकिरी तब हुई जब कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने आरक्षण के आधार को बदलने की बात कही। 24 घंटे के अंदर ही कांग्रेस अध्यक्ष ने उनके विचार को खारिज कर दिया, जबकि इस मुद्दे पर बहस की आवश्यकता थी। दरअसल यह वोट बैंक की राजनीति का ही असर था कि न तो कांग्रेस अध्यक्ष ने जर्नादन द्विवेदी के विचार को खारिज करने में देर लगाई और न ही अन्य दलों ने। कांग्रेस के भीतर का ऐसा ही विरोधाभास आम आदमी पार्टी को लेकर भी दिख रहा है। कांग्रेस दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार के तौर-तरीकों की आलोचना-निंदा करने में लगी हुई है, लेकिन उसे अपना समर्थन भी जारी रखे हुए है।

दिशाहीनता का शिकार देश


इस तरह के विरोधाभास से कांग्रेस को क्षति ही पहुंचेगी। चूंकि केंद्र सरकार अब चुनावी तैयारियों में लग गई है इसलिए उससे सुधारों और खासकर अर्थव्यवस्था संबंधी सुधारों की दिशा में आगे बढ़ने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। एक तो उसके पास इतना समय नहीं कि बड़े फैसले ले सके और दूसरे, वह इच्छाशक्ति भी नहीं जो अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए आवश्यक है। रही-सही कसर येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने की कवायद ने पूरी कर दी है। यही कारण है कि सब्सिडी में कटौती के जो फैसले पिछले वर्ष लिए गए थे उन्हें वापस लिया जा रहा है। इसी तरह बुनियादी ढांचे से संबंधित जिन परियोजनाओं पर दो-ढाई साल से चर्चा भी नहीं हो रही थी उन्हें आनन-फानन आगे बढ़ाने की घोषणा की जा रही है ताकि सरकार विकास के मोर्चे पर कुछ करती नजर आए। देश जानना चाहेगा कि इन परियोजनाओं पर अब तक हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे रहा गया? ध्यान रहे कि तमाम परियोजनाओं को पर्यावरण मंत्रलय की आपत्तियों के चलते आगे बढ़ाने से इन्कार किया गया। स्थिति ऐसी बनी कि इस मंत्रलय को उद्योगीकरण की राह में अवरोध के रूप में देखा जाने लगा। अब हड़बड़ी में अवरोध हटाए जा रहे हैं। इससे केंद्र सरकार और कांग्रेस में तालमेल न होने की ही पुष्टि होती है। संसद का सत्र 21 फरवरी को समाप्त हो जाएगा और केंद्र सरकार सही तरह सदन न चला पाने के लिए एक बार फिर आलोचना के घेरे में होगी। उसे इस सवाल का जवाब देना होगा कि केवल राहुल गांधी को श्रेय देने के लिए पांच विधेयकों समेत 39 विधेयक एजेंडे में क्यों शामिल किए गए? अगर ये विधेयक इतने ही जरूरी थे तो इसके पहले वाले सत्र को समय से दो दिन पहले क्यों खत्म किया गया था? अगर कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के पिछले कई महीनों के निर्णयों पर गौर किया जाए तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि सरकार और संगठन में नीतिगत निर्णयों को लेकर विरोधाभास है। यह विरोधाभास इस बात की ओर इंगित करता है कि सत्ता के दो केंद्र काम कर रहे हैं। वैसे तो सत्ता के दो केंद्र वाली बात को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नकारते रहे हैं, लेकिन पार्टी के दबाव में सरकार जिस तरह के निर्णय ले रही है उससे स्पष्ट है कि मनमोहन सिंह की अनदेखी हो रही है। जब खुद कांग्रेस ही अपने प्रधानमंत्री की अनदेखी करने लगे और सरकार के अधिकांश निर्णय सत्ता के दूसरे ताकतवर केंद्र यानी गांधी परिवार की इच्छा से होते नजर आएं तो शासन में असमंजस व्याप्त होना और उसकी किरकिरी होना स्वाभाविक है। बेहतर होगा कि सरकार अपनी किरकिरी कराना बंदकर जल्दी से जल्दी लेखानुदान मांगें पारित कराकर लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दे।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं



Web Title : indian central government policies



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