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ताकत का बेजा प्रदर्शन

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sanjay guptaकांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सजा प्राप्त सांसदों और विधायकों की सदस्यता बचाने वाले अध्यादेश के खिलाफ जिस तरह हमला बोला और उसे बकवास बताते हुए फाड़कर फेंकने लायक बताया उससे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख और गरिमा को तो आघात लगा ही, खुद गांधी परिवार के संदर्भ में देश में गंभीर सवाल खड़े हो गए। राहुल गांधी का यह हमला कई मायने में अप्रत्याशित है। वह न केवल कांग्रेस के मीडिया प्रमुख अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में अचानक आए, बल्कि अपनी ही सरकार के एक फैसले की सार्वजनिक रूप से धज्जियां भी उड़ा दीं-और वह भी तब जब प्रधानमंत्री विदेश में हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले और आम जनता की भावना के खिलाफ दागी राजनेताओं को बचाने के लिए अध्यादेश लाने का फैसला संप्रग सरकार का कोई पहला गलत काम नहीं है और न ही यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर पहली बार चूक हुई। बावजूद इसके विनम्र नेता की छवि वाले प्रधानमंत्री को इस तरह बेइज्जत करना राहुल गांधी की सामंती मानसिकता को ही प्रदर्शित करता है। राहुल के इस बर्ताव के कारण कांग्रेस एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर है। लगभग पूरा विपक्ष यह कहने में जुटा है कि प्रधानमंत्री को इस बेइज्जती के बाद इस्तीफा दे देना चाहिए।

मनमानी की नई मिसाल


राहुल गांधी के अब तक के राजनीतिक करियर को देखा जाए तो वह बिना सरकार में रहे देश की तमाम समस्याओं का निराकरण करना चाहते हैं। वह देश की गरीबी से आहत दिखते हैं। उनकी राजनीति के केंद्र में भी गरीब ही दिखते हैं। वह गरीबों के हित की चाहे जितनी बातें करें, लेकिन इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ सकते कि भाषण देने से निर्धन लोगों का कोई हित होने वाला नहीं है। कांग्रेस भले ही गरीबों के हित के नाम पर चलाई जाने वाली कुछ योजनाओं का श्रेय राहुल गांधी को दे, लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी सभी योजनाएं देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही हैं। लगता है कि राहुल गांधी को इससे कोई मतलब नहीं कि देश गंभीर आर्थिक संकट में फंसता जा रहा है। राहुल अथवा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का दृष्टिकोण मुफ्त में पैसा बांटकर गरीबी दूर करने का नजर आता है। शायद यही कारण है कि वित्तीय संकट सामने दिखने के बावजूद खाद्य सुरक्षा बिल के पारित होने पर दोनों में से किसी ने आर्थिक हालात पर कोई टिप्पणी करना जरूरी नहीं समझा। दोनों ने बिगड़ते आर्थिक हालात को प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के कंधों पर डालकर अपनी कर्तव्य की इतिश्री कर डाली।


सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को बचाने के लिए अध्यादेश की आवश्यकता नहीं थी। लगता है कि इस अध्यादेश का एक उद्देश्य चारा घोटाले में फंसे लालू यादव और ऐसे ही कुछ नेताओं को राहत देना है। चूंकि राहुल गांधी कांग्रेस की गठबंधन राजनीति से अब तक अलग ही रहे हैं इसलिए वह शायद इस राजनीति के दबाव को समझ नहीं पा रहे। गठबंधन राजनीति के दबाव का सामना या तो सोनिया गांधी कर रही हैं या उनके राजनीतिक सलाहकार। राहुल ने जिस तरह से इस अध्यादेश को फाड़कर फेंकने की बात कहीं उससे उन्होंने सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल को भी लपेट लिया है। इसमें कोई हर्ज नहीं कि राहुल कांग्रेस को शिखर पर ले जाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का भी अहसास होना चाहिए। ध्यान रहे कि खुद प्रधानमंत्री ने उन्हें कई बार सरकार में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। हो सकता है कि उनके इस आमंत्रण का एक कारण उन्हें यह अहसास कराना हो कि भाषण देना अलग बात है और सरकार के भीतर रहकर काम करना अलग। यह हास्यास्पद है कि अध्यादेश के मामले में केंद्र सरकार के अनेक मंत्रियों ने भी राहुल गांधी का समर्थन करने में एक क्षण की भी देरी नहीं लगाई।

आतंक पर खतरनाक राजनीति


ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि वह गांधी परिवार से संबंध रखते हैं। नि:संदेह लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन अगर राहुल सिर्फ पार्टी के उपाध्यक्ष ही होते तो न तो प्रधानमंत्री का इस तरह सार्वजनिक रूप से निरादर कर सकते थे और न ही कैबिनेट द्वारा मंजूर अध्यादेश को बकवास बता सकते थे। राहुल के पहले कांग्रेस के कुछ अन्य नेताओं ने भी इस अध्यादेश का विरोध किया था, लेकिन संयमित भाषा में और एक दायरे में। कांग्रेस में गांधी परिवार के प्रभाव को देखते हुए इस पर आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री ने अमेरिका से लौटने के बाद अध्यादेश के मसले पर चर्चा करने और राहुल के सुझावों पर ध्यान देने की बात कही, लेकिन क्या यह लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण है कि एक व्यक्ति पूरी सरकार पर भारी पड़ जाए? अब जब कांग्रेस के तमाम नेता और यहां तक कि केंद्रीय मंत्री राहुल का समर्थन करने की बात कर रहे हैं तब यह सवाल उठेगा ही कि उन्होंने उस समय अपनी बात क्यों नहीं कही जब विधेयक पेश किया गया और अध्यादेश लाने का फैसला किया गया? 1 राहुल गांधी अक्सर यह दावा करते हैं कि वह सत्ता की राजनीति से दूर रहना चाहते हैं। उनके इस दावे पर भरोसा भी किया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वह अपने दल के नेतृत्व वाली सरकार के गलत फैसलों को समय रहते रोक क्यों नहीं पाते?


प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह की अपनी कुछ सीमाएं हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उनके समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी जाएं कि वह कैबिनेट पर अपना नियंत्रण ही खोते हुए दिखें। संप्रग सरकार के दोनों कार्यकाल और विशेष रूप से दूसरे कार्यकाल में सत्ता के दो केंद्रों की बात उठती रही है। यह माना जा रहा है कि सत्ता के दो केंद्रों के कारण ही सरकार के भीतर अनिर्णय की स्थिति है। यह स्थिति देश पर बहुत भारी पड़ रही है। यदि आज कांग्रेस की ताकत कम होती दिख रही है तो इसका एक बड़ा कारण शक्ति के दो केंद्र स्थापित हो जाना है। मनमोहन सिंह यह जानते हैं कि वह गांधी परिवार के कारण ही प्रधानमंत्री बने हैं और उनके बाद पूरी कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर देखना चाहती है, लेकिन अभी तक खुद राहुल ने ऐसे संकेत नहीं दिए हैं कि वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। कम से कम अब तो उन्हें यह स्पष्ट करना ही चाहिए कि वह क्यों सरकार में शामिल होने अथवा प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं? यदि वह ऐसा नहीं करते तो उन्हें प्रधानमंत्री में हीनता का भाव उत्पन्न करने का भी अधिकार नहीं है। वैसे एक समय राहुल के पिता राजीव गांधी ने भी ऐसे ही तेवर दिखाए थे। उन्होंने योजना आयोग को तब जोकरों का समूह कहा था जब मनमोहन सिंह उसके उपाध्यक्ष थे। बतौर प्रधानमंत्री वह अपने विदेश सचिव से इस कदर नाराज हो गए थे कि उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में उनकी लगभग बर्खास्तगी की घोषणा कर दी थी। इससे आहत विदेश सचिव ने उसी दिन अपना त्यागपत्र दे दिया था। राहुल गांधी को यह ध्यान रखना होगा कि प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय को मात्र गांधी परिवार की इच्छाओं के अनुरूप कार्य करने वाला बना देने से न तो सरकार का भला होने वाला है और न कांग्रेस का। अगर राहुल गांधी दागियों को बचाने वाले अध्यादेश से आहत हैं तो बेहतर होगा कि वह सरकार में शामिल होकर सरकारी कामकाज की जटिलताओं को समङों, क्योंकि उनके बर्ताव से प्रधानमंत्री के साथ-साथ कानून मंत्री का भी मान गिरा है

इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं

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Web Title: rahul gandhi latest speech



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