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कानून का दिखावटी शासन

Posted On: 28 Aug, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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rajeev sachanमुंबई में एक फोटोग्राफर से सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद देश में फिर से गुस्से की लहर दिखी। यह लहर पिछले साल दिल्ली में एक फिजियोथेरेपेस्टि से चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म के बाद उमड़े गुस्से की तरह तो नहीं थी, फिर भी मुंबई की घटना ने दिल्ली के हादसे की याद दिला दी। मुंबई की घटना पर संसद में भी गुस्सा जाहिर किया गया, लेकिन यह याद करना कठिन है कि दिसंबर से लेकर अगस्त के बीच देश में जो सैकड़ों दुष्कर्म हुए उन्हें लेकर भी राजनीतिक दलों ने संसद में या उसके बारह गम और गुस्से का इजहार किया हो। यह एक तथ्य है कि मीडिया, समाज, सरकार और राजनीतिक दल कुछ खास घटनाओं पर ही गर्जन-तर्जन करते हैं। इसके पीछे कारण जो भी हो, लेकिन शायद इसी प्रवृत्ति के चलते समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता। दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद दुष्कर्म रोधी कानून कड़े किए गए, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। इसमें संदेह है कि कोई इस पर विचार करने जा रहा है कि दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई के लिए गठित की गईं फास्ट ट्रैक अदालतें वास्तव में त्वरित ढंग से काम कर भी रही हैं या नहीं? दिल्ली दुष्कर्म के आरोपियों के वकीलों ने जिस तरह शीला दीक्षित और मुलायम सिंह को गवाही के लिए बुलाने की मांग की उससे यही स्पष्ट हुआ कि फास्ट ट्रैक अदालतों में भी वही सब कुछ होता है जो सामान्य अदालतों में।1कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारे देश में संगीन जुर्म में शामिल आरोपियों-अपराधियों को सामान्य नागरिकों से कहीं अधिक अधिकार प्राप्त हैं। मुंबई की घटना के बाद किशोर अपराधियों की उम्र सीमा का सवाल एक बार फिर सतह पर आता दिख रहा है। कायदे से तो यह होना चाहिए था कि दिल्ली की घटना के बाद या तो किशोर अपराधियों की उम्र सीमा नए सिरे से निर्धारित कर दी जाती या फिर ऐसी व्यवस्था बनाई जाती कि 16 से 18 साल के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई में उनकी उम्र के बजाय अपराध की गंभीरता के हिसाब से निर्णय होगा। ऐसा कुछ भी नहीं हो सका, जबकि किशोर अपराधियों की उम्र सीमा का सवाल संसद के समक्ष भी खड़ा हुआ और सर्वोच्च न्यायालय के भी। शिथिल और अदूरदर्शी नेतृत्व ऐसा ही करता है। वह देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से न तो स्वयं को बदलता है और न ही गंभीर सवालों को हल करने की कोशिश करता है।

मनमोहन और आडवाणी


जागरूक नेतृत्व किस तरह न्यायसंगत व्यवहार करता है, इसका उदाहरण है आयरलैंड, जहां एक त्रसदी के बाद गर्भपात संबंधी नियम-कानून बदल दिए गए। भारत एक ऐसा देश बन गया है जो ज्यादातर मामलों में बदलाव को स्वीकार करने के स्थान पर शुतुरमुर्गी रवैये का परिचय देता है। मुंबई में फोटोग्राफर के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद संसद में रोष-आक्रोश के प्रदर्शन के समय कई सांसदों की ओर से कहा गया कि ऐसा लगता है कि कानून का भय नहीं रह गया है और अपराधियों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। यही बात संसद के बाहर भी कही गई। यह बिलकुल सही है और ऐसा इसलिए है, क्योंकि समाज यह भली तरह देख रहा है कि इस देश में गलत काम करने-कानून तोड़ने वालों के खिलाफ मुश्किल से ही कार्रवाई होती है। अगर गलत काम करने वाले लोग रसूख वाले होते हैं तो एक फिल्मी डायलॉग की तरह सारी कायनात उन्हें बचाती हुई दिखने लगती है।1आखिर उस देश में कानून का शासन कायम होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है कि जहां अपराधी विधायकों-सांसदों को बचाने के लिए सारे राजनीतिक दल एकजुट हों और वह भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले खिलाफ। हमारे राजनीतिक दल देश को यही संदेश दे रहे हैं कि उन्हें सजा पाए नेताओं की ज्यादा परवाह है। राजनीतिक दलों को अपने इस रवैये पर लाज आनी चाहिए, लेकिन वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ एक से बढ़कर एक बेढंगे कुतर्क देने में लगे हुए हैं। इनमें मूल्यों और मर्यादाओं की बात करने वाली भाजपा भी शामिल है।

गर्म होती पतीली के मेढक


भाजपा का यह रूप हैरान करने वाला है। खुद को औरों से अलग बताने वाली भाजपा उस पहल में भी शामिल है जिसके तहत राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून से बाहर करने की कोशिश हो रही है। भाजपा के शुभचिंतकों को इस दल के नेताओं से पूछना चाहिए कि वे उत्थान की राह पर हैं या पतन की? इसी तरह कांग्रेस के शुभचिंतकों को भी इस दल के नेताओं से यह पूछना चाहिए कि क्या मनमोहन सिंह वाकई ईमानदार कहे जा सकते हैं? अगर वह ईमानदार हैं तो यह प्रश्न अनुत्तरित क्यों है कि उनके कार्यालय के एक अफसर ने कोयले घोटाले की जांच रपट किसके कहने पर बदलवाई? अगर देश में कानून का शासन होता तो न जाने कब इस सवाल का जवाब मिल जाता। अभी इस सवाल का जवाब मिलना तो दूर रहा, कोई यह सवाल पूछने की भी जहमत नहीं उठा रहा। कानून के ऐसे नकली-दिखावटी शासन में भ्रष्ट और अपराधी तत्वों का मनोबल बढ़ने पर हैरानी कैसी?1पिछले कुछ समय से यह अनुभूति ज्यादा होने लगी है कि हमारे देश में आरोपियों-अपराधियों को सामान्य नागरिकों से कहीं अधिक अधिकार प्राप्त हैं? अगर ऐसे तत्व थोड़ा भी समर्थ होते हैं तो वे बहुत आसानी से अदालत-अदालत खेलने में भी कामयाब हो जाते हैं। ये तत्व निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इतने चक्कर लगाते हैं कि न्याय को ही चक्कर आ जाता है। कई मामलों में ऐसे तत्वों केपक्ष में कोई न कोई संगठन-समूह भी खड़ा हो जाता है। यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि किशोर वय के दुष्कर्मियों से लेकर अपराधी नेताओं, नक्सलियों और बूढ़े आतंकियों के हितों की चिंता करने वाले लोग हैं। यदि कोई असहाय-निरुपाय है तो वह है आम आदमी।


इस आलेख के लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


साख के संकट से घिरी सत्ता




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