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मनमानी की नई मिसाल

Posted On: 5 Aug, 2013 Politics में

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1947 में देश को आजादी मिलने के बाद से लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के रूप में आम जनता विकास और अपनी सभी समस्याओं के निराकरण के लिए राजनीतिक दलों की ओर देखती रही है। संसदीय व्यवस्था में यह जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की ही होती है कि वे सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से शासन संबंधी समस्त कार्य करें। कानून एवं व्यवस्था कायम रखने के साथ ही उद्योगों को फलने-फूलने का अवसर प्रदान करना, जनता की सेवा के लिए सरकारी उपक्रम स्थापित करना, आधारभूत ढांचे का निर्माण करना तो शासन का मूल दायित्व है ही, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी किसानों और निर्धन-वंचित वर्ग के हित में कार्य करना है।

लूट सको तो लूट लो


प्रारंभ में दलों ने अपने इन दायित्वों को पूरा करने के क्रम में सौम्यता और शालीनता का परिचय दिया और वे यह स्वीकार भी करते रहे कि उनकी शक्ति आम जनता के प्रतिनिधि के रूप उन्हें मिले अधिकारों के कारण ही है, लेकिन धीरे-धीरे उनमें अहंकार पनपने लगा और जब इस अहंकार के साथ भ्रष्टाचार का घालमेल हुआ तो राजनीति का उद्देश्य ही एकदम पलट गया। एक समय जो राजनीति जनसेवा का माध्यम मानी जाती थी और जिससे देश को दिशा देने की अपेक्षा की गई थी उसने एक व्यवसाय और येन-केन-प्रकारेण पैसा बटोरने के एक उपक्रम का रूप ग्रहण कर लिया। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक दलों के गठन की होड़ सी लग गई, क्योंकि यह महसूस किया गया कि पैसा कमाने के लिए इससे आसान कोई अन्य तरीका नहीं है। आज स्थिति यह है कि राजनीतिक दलों और विशेष रूप से सत्ताधारी दलों की ओर से प्रत्येक छोटा-बड़ा काम जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि यह सोचकर किया जाता है कि इससे उन्हें क्या लाभ होगा? 12005 में जब संप्रग सरकार ने सूचना अधिकार कानून का निर्माण किया तो उसकी बहुत प्रशंसा हुई और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की दिशा में इसे मील का पत्थर माना गया।

आत्ममंथन का समय


कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इस कानून को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन जब केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआइसी ने राष्ट्रीय मान्यता वाले सभी छह दलों को आरटीआइ कानून के दायरे में लाने का फैसला सुनाया तो पूरी राजनीतिक जमात न केवल इस फैसले के विरोध में खड़ी हो गई, बल्कि बचाव के लिए हर तरह के कुतर्को का सहारा लेने में भी जुट गई। अब कैबिनेट ने राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए संसद के मानसून सत्र में विधेयक पेश करने का फैसला लेकर यह साबित कर दिया कि राजनीतिक दलों ने पारदर्शिता से बचने के लिए शील-संकोच त्याग दिया है। आखिर राजनीतिक दल देश की जनता से क्या छिपाना चाहते हैं? वे जनता को क्यों यह बताने के लिए तैयार नहीं कि उनका संचालन कैसे होता है और उनकी आय के स्नोत क्या हैं? संभवत: उन्हें डर है कि एक बार उनकी आय के स्नोतों की जानकारी हो गई तो उस भ्रष्टाचार की पूरी कहानी सामने आ जाएगी जिसमें वे डूबे हुए हैं। 1 लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी विडंबना कोई और नहीं हो सकती कि राजनीतिक दल जनता के लिए जैसे नियम-कानून चाहते हैं वैसे अपने लिए नहीं चाहते? राजनीतिक दलों के संचालन से जुड़ी जानकारियां कोई ऐसी नहीं जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ती हो और इस कारण उन्हें आरटीआइ से बाहर रखना आवश्यक हो। देखना है कि आरटीआइ से बचने के लिए कानून में संशोधन करते हुए राजनीतिक दल संसद में क्या दलीलें देते हैं? यह स्वागतयोग्य है कि राजद के सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने यह कहने का साहस दिखाया कि राजनीतिक दलों को आरटीआइ के दायरे में आना चाहिए और इससे बचने की जो कोशिश की जा रही है वह अनुचित-अनैतिक है। उन्हें बड़ी संख्या में सांसदों का समर्थन शायद ही मिले, क्योंकि भले ही भाकपा एकमात्र ऐसा दल हो जिसने आरटीआइ के तहत मांगी गई सूचना का जवाब दिया हो, लेकिन उसके रुख को भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। 1सूचना अधिकार कानून के निर्माण का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर लगाम लगाना है। जब यह स्पष्ट है कि सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें राजनीतिक दलों तक जाती हैं तब इसका कोई औचित्य नहीं कि उन्हें आरटीआइ के दायरे से अलग रखा जाए। कानून मंत्री कपिल सिब्बल तर्क दे रहे हैं कि राजनीतिक दल सार्वजनिक निकाय नहीं हैं इसलिए सूचना अधिकार कानून उन पर लागू नहीं होता और नेता अधिकारियों की तरह नियुक्त नहीं होते, बल्कि उनका निर्वाचन होता है। आखिर राजनीतिक वर्ग एक ऐसे मामले में याचिकाकर्ता और न्यायाधीश की भूमिका कैसे निभा सकता है जिसमें खुद उसके संकीर्ण हित प्रभावित हो रहे हों? शायद इस तथ्य की भी अनदेखी की जा रही है कि सत्तारूढ़ दल सरकार का ही अंग होते हैं।


जब सरकार के विभिन्न विभाग सूचना अधिकार के दायरे में आते हैं तो सरकार संचालित करने वाले दल उससे बाहर कैसे रखे जा सकते हैं? 1राजनीतिक दल जैसी मनमानी का परिचय सूचना अधिकार कानून से बचने के लिए दे रहे हैं वैसा ही रवैया सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के प्रति भी अपनाए हुए हैं जिसके तहत सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों की सदस्यता छीनने और जेल में बंद लोगों के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने वाला माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को बेअसर करने के लिए पहले उपाय के तहत पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला किया गया है। इससे बात न बनने पर कानून का सहारा लिया जा सकता है। इस संदर्भ में संसद की सर्वोच्चता का हवाला दिया जा रहा है। क्या ऐसी संसद अपनी गरिमा की रक्षा कर सकती है जो आपराधिक चरित्र वाले नेताओं का संरक्षण करती नजर आए? 1सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राजनीतिक दल यह दलील दे रहे हैं कि इस फैसले का दुरुपयोग हो सकता है और सत्ताधारी दल बदले की भावना से विरोधी दलों के नेताओं को फंसा सकते हैं। यह आशंका निराधार नहीं, लेकिन आखिर राजनीतिक दल राजनीति के अपराधीकरण पर लगाम क्यों नहीं लगा रहे हैं? जब राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी का परिचय नहीं देंगे तो न्यायपालिका को तो दखल देना ही होगा और फिर दुरुपयोग तो हर कानून का हो सकता है। यह राजनीतिक दलों की मनमानी नहीं तो और क्या है कि वे न तो अपने स्तर पर राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कोई कदम उठाने को तैयार हैं और न ही न्यायपालिका के निर्देशों का पालन करने के इच्छुक हैं। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के अनुसार अकेले लोकसभा के 162 सदस्यों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। ऐसी ही स्थिति विधानसभाओं में भी है। लोकतंत्र का अर्थ जनता के द्वारा, जनता के लिए जनता का शासन माना जाता है, लेकिन हमारे राजनीतिक दल ऐसा जाहिर कर रहे हैं मानो भारत में लोकतंत्र राजनीतिक दलों के द्वारा, दलों के लिए,दलों का शासन भर बन कर रह गया है।

इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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