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मनमोहन और आडवाणी

Posted On: 25 Jun, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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इस आशय की खबरों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा कि उत्तराखंड सरकार बाढ़, बारिश, भूस्खलन का शिकार बने लोगों को समुचित सहायता पहुंचाने में नाकाम साबित हो रही है। हालांकि आपदा की विकरालता को देखते हुए किसी भी राज्य सरकार के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों को राहत पहुंचाना मुश्किल होता, लेकिन कांग्रेस को इससे चिंतित होना चाहिए कि आपदाग्रस्त इलाकों से बचकर निकलने वालों में ऐसे लोगों की तलाश करना मुश्किल है जो राज्य सरकार और उसके प्रशासन की सराहना कर रहे हों। कोई नहीं जानता कि अव्यवस्था का आलम कब खत्म होगा, लेकिन यह जानकारी संभवत: सबको हो गई होगी कि कांग्रेस ने राहत और बचाव कार्यो को गति देने के लिए जिन नेताओं को दिल्ली से देहरादून भेजा उनमें मोतीलाल वोरा भी हैं। 85 बरस के वोरा जी स्वस्थ और सक्रिय हैं, लेकिन क्या कांग्रेस को उनके स्थान पर किसी युवा नेता की तलाश नहीं करनी चाहिए थी? कुछ इसी तरह का सवाल पिछले हफ्ते तब भी उठा था जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के तहत 86 बरस के शीशराम ओला को केंद्रीय मंत्री की शपथ दिलाई गई थी। नि:संदेह ओला जी भी स्वस्थ और सक्रिय हैं, लेकिन क्या यह अच्छा नहीं होता कि उनके स्थान पर किसी युवा शख्स की तलाश की जाती, खासकर यह देखते हुए कि केंद्र सरकार के पास समय कम है और काम ज्यादा? केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के क्रम जो आठ नए लोग मंत्री बने हैं उनमें से ज्यादातर के चयन का आधार जो भी रहा हो, यह कहना कठिन है कि दक्षता और कौशल को प्राथमिकता प्रदान की गई।

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इस फेरबदल के पहले जिस तरह केंद्रीय मंत्रिमंडल से अजय माकन और सीपी जोशी को संगठन में ले आया गया उससे देश को यही संदेश गया कि अब सरकार चलाना कांग्रेस की प्राथमिकता में नहीं रहा। कहीं ऐसा तो नहीं कि पार्टी ने यह मान लिया है कि शेष कार्यकाल में और कुछ करना संभव नहीं रह गया है और अब तो यही बहुत है कि सरकार किसी तरह चलती रहे? यह तय है कि अब मनमोहन सरकार के लिए कहीं कोई खतरा नहीं दिख रहा है, लेकिन आखिर एक नाकाम सरकार की निष्क्रिय अवस्था कांग्रेस के लिए मददगार कैसे साबित हो सकती है? कांग्रेस जब चुनाव मैदान में उतरेगी तो उसे मनमोहन सरकार के कामकाज का हिसाब तो देना ही होगा। वह यह नहीं कह सकती कि देश संप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल भूल जाए और केवल पहले कार्यकाल के आधार पर हाथ को मजबूती प्रदान करे। संप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल देश के लिए किसी आपदा से कम नहीं। इस दौरान देश ने करीब-करीब वह सब गंवा दिया जो पहले अर्जित किया था। कांग्रेस माने या न माने, सच यही है कि भारत तेजी से आगे बढ़ते, उभरते और सफलतापूर्वक चुनौतियों का सामना करते देश की छवि खो चुका है। इसी तरह मनमोहन सिंह भी एक सक्षम-सक्रिय प्रधानमंत्री की छवि से हाथ धो बैठे हैं। इससे भी बुरा यह रहा कि ईमानदार पीएम की उनकी छवि पर बट्टा लग गया। मुश्किल यह है कि उन्हें इस सबका आभास नहीं है और शायद यही कारण रहा कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान एक चुनावी सभा में वह यह कह गए कि भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार के कारण राज्य का विकास बाधित हुआ है।


उनके इस कथन पर सारा देश उन पर हंसा। जबसे यह बात सामने आई है कि कोयला घोटाले की सीबीआइ जांच रपट में प्रधानमंत्री कार्यालय के एक अफसर ने भी छेड़छाड़ की थी तबसे तो प्रधानमंत्री एक अभियुक्त सरीखे दिखने लगे हैं। आखिर ऐसी छवि वाले प्रधानमंत्री के रहते कांग्रेस आम चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद कैसे कर सकती है? इसमें दोराय नहीं कि अजय माकन और सीपी जोशी की भागीदारी के बाद कांग्रेस सांगठनिक रूप से कहीं अधिक सक्षम नजर आने लगी है, लेकिन यह समझना कठिन है कि राहुल गांधी का सारा ध्यान संगठन पर क्यों है? वह केंद्र सरकार को उसके हाल पर छोड़कर जिस तरह संगठन पर ध्यान दे रहे हैं उससे यह संभव है कि आने वाले समय में पार्टी चुस्त-दुरुस्त नजर आने लगे, लेकिन क्या कोई यह दावा करने की स्थिति में है कि केंद्र सरकार भी तेजी से काम करती हुई दिखाई देने लगेगी?

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सरकार की नाकामी-निष्क्रियता तो संगठन की सक्रियता-सकारात्मकता का हरण ही करेगी। अगर यह मान भी लिया जाए कि प्रधानमंत्री बनना राहुल गांधी की प्राथमिकता नहीं तो भी यह तो उनका एजेंडा है ही कि कांग्रेस एक बार फिर सत्ता में आए। यह एजेंडा केवल संगठन के काम पर ध्यान देने से शायद ही पूरा हो। अगर सरकार के लोग संगठन में जाकर उनके निर्देश के हिसाब से काम कर सकते हैं तो क्या इसके उलट भी ऐसा ही नहीं हो सकता?1 यह तय है कि अगर मनमोहन सिंह और केंद्र सरकार की छवि में सुधार नहीं हुआ तो वह कांग्रेस के लिए वैसे ही साबित होंगे जैसे भाजपा के लिए लालकृष्ण आडवाणी हो रहे हैं। आडवाणी की कथित नाराजगी ने भाजपा को नए सिरे से कलह ग्रस्त पार्टी की छवि प्रदान कर दी है। अगर आडवाणी इसी तरह नाराज बने रहते हैं तो भाजपा का एकजुट होना तो दूर रहा, वह एकजुट दिख भी नहीं पाएगी। यह दुयरेग ही सही, लेकिन दिलचस्प है कि दो परस्पर विरोधी दलों के बुजुर्ग नेता अपनी-अपनी पार्टी की संभावनाओं को स्याह करने का काम कर रहे हैं। एक अपनी नाकामी से और दूसरे अपनी नाराजगी से। ऐसा लगता है कि दोनों ही इससे अनजान हैं कि आम जनता उनके बारे में क्या सोचती है और पार्टी को उनसे क्या अपेक्षाएं हैं? इन दोनों नेताओं में एक समानता यह भी देखी जा सकती है कि उनमें से कोई भी यह कहने को तैयार नहीं कि वह पीएम पद की दौड़ में शामिल नहीं।


इस आलेख के लेखक राजीव सचान  दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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