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अवसरवादी राजनीति

Posted On: 25 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Sanjay guptसंप्रग सरकार का दूसरा कार्यकाल समाप्त होने के लगभग एक वर्ष पहले उसके एक प्रमुख घटक दल द्रमुक ने श्रीलंका में तमिलों के नरसंहार के मुद्दे पर सरकार का साथ छोड़ने का फैसला किया। पहले तृणमूल कांग्रेस और फिर द्रमुक के अलग हो जाने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अपने स्थायित्व के लिए सपा और बसपा पर और अधिक आश्रित हो गई है। यह कहना कठिन है कि ये दोनों दल सरकार को समर्थन देने की क्या कीमत वसूलेंगे, लेकिन द्रमुक ने जिस तरह राष्ट्रीय हितों के स्थान पर क्षेत्रीय हितों को तरजीह देते हुए सरकार से अलग होने का फैसला किया उससे गठबंधन राजनीति की खामियां नए सिरे से सतह पर आ गईं। द्रमुक के इस अवसरवाद ने एक बार फिर साफ कर दिया कि राजनीतिक दल किस तरह खुद को मिले जनादेश का दुरुपयोग करते हैं। केंद्र की गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दल एक बार फिर मुसीबत बनकर सामने आए।

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श्रीलंका में तमिलों के साथ जो ज्यादती हुई और हो रही है उसकी निंदा की जानी चाहिए, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि तमिलों के लिए पृथक देश की मांग करते हुए आतंकी संगठन लिट्टे ने एक तरह से श्रीलंका में गृह युद्ध छेड़ रखा था। माना जाता है कि पाबंदी के बावजूद लिट्टे को तमिलनाडु में गुपचुप तरीके से समर्थन मिलता रहा। श्रीलंका सरकार ने लिट्टे को सख्ती से कुचला और इस क्रम में मानवाधिकारों के उल्लंघन की कुछ घटनाएं भी सामने आईं। इन्हीं घटनाओं के कारण श्रीलंका सरकार विश्व समुदाय की आलोचना के केंद्र में है। अमेरिका की पहल पर हाल में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में श्रीलंका के खिलाफ जो प्रस्ताव पारित हुआ उसमें मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। भारत समेत 25 देशों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, लेकिन द्रमुक इससे संतुष्ट नहीं है। वह श्रीलंका के खिलाफ और अधिक सख्त कदम उठाने की मांग कर रहा है। श्रीलंका के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध कैसे हों, यह तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को ही है। किसी भी देश के साथ संबंधों का रूप-स्वरूप राष्ट्रीय हितों के हिसाब से ही तय होना चाहिए। यह उचित नहीं कि क्षेत्रीय दल विदेश नीति के मुद्दों पर केंद्रीय सत्ता पर दबाव डालते नजर आएं। श्रीलंका के मुद्दे पर द्रमुक ने जो कुछ किया उसे ब्लैकमेलिंग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि द्रमुक ने तमिलनाडु में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए खुद को तमिलों का सबसे बड़ा हमदर्द सिद्ध करने की कोशिश की।

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2जी घोटाले में करुणानिधि की बेटी कनीमोरी और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा के जेल जाने के कारण द्रमुक और कांग्रेस के रिश्ते पहले से तल्ख चल रहे थे। ऐसा लगता है कि द्रमुक समर्थन वापसी के लिए किसी बहाने के इंतजार में था। संप्रग सरकार जिस तरह अपने पहले कार्यकाल में वाम दलों के दबाव में थी उसी तरह उसे दूसरे कार्यकाल में तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के दबाव का सामना करना पड़ा। खुद प्रधानमंत्री ने कई बार गठबंधन राजनीति की मजबूरियों का जिक्र किया, लेकिन किसी ने भी इस पर गौर करना जरूरी नहीं समझा कि इस तरह की राजनीति के कुछ नियम-कायदे तय होने चाहिए। जिस तरह कांग्रेस को गठबंधन राजनीति की विसंगतियों का शिकार होना पड़ा है उसी तरह भाजपा को भी समय-समय पर अपने सहयोगी दलों के दबाव से जूझना पड़ा था, लेकिन न तो कांग्रेस गठबंधन राजनीति के कुछ नियम-कायदे तय करने के लिए आगे आती नजर आ रही है और न ही भाजपा। क्षेत्रीय दलों के बढ़ते वर्चस्व और अपनी खुद की सीमाओं से परिचित होने के बाद भी कांग्रेस और भाजपा गठबंधन राजनीति को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहती हैं। दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों की सोच यह है कि अगर गठबंधन राजनीति को नियम-कानूनों में बांधा गया तो उनके लिए दबाव की राजनीति करना संभव नहीं रह जाएगा। जब हर कोई यह महसूस कर रहा है कि गठबंधन राजनीति देश के लिए हितकारी नहीं है और वह विकास के साथ-साथ हर तरह के सकारात्मक परिवर्तन में बाधक बन रही है तब यह विचित्र है कि राजनीति की इस विसंगति को दूर करने के लिए न तो राष्ट्रीय दल तैयार हैं और न ही क्षेत्रीय दल। केंद्र की गठबंधन सरकार में शामिल क्षेत्रीय दलों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने दलीय हितों को राष्ट्र हित के आड़े न आने दें, लेकिन ऐसा मुश्किल से ही हो पाता है। क्षेत्रीय दलों का मनमाना आचरण केंद्रीय सत्ता के कामकाज को एक मजाक बनाकर रख देता है। क्षेत्रीय दलों के इसी मनमाने रवैये के कारण केंद्र सरकार के लिए कोई बड़ी योजना या नीतियों को लागू करना मुश्किल हो गया है। भारत आज एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहां आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में बड़े बदलावों के साथ-साथ राजनीति के तौर-तरीकों में भी बुनियादी परिवर्तन की आवश्यकता है। यह सही है कि विभिन्नताओं वाले इस देश में किसी भी विषय पर आम राय कायम करना आसान काम नहीं है और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति भी आवश्यक है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इसकी आड़ में संकीर्ण स्वार्थो की पूर्ति की जाने लगे और ऐसा करते हुए राष्ट्रीय हितों को हाशिये पर कर दिया जाए। देश आज जिन समस्याओं से जूझ रहा है उनके लिए निश्चित रूप से एक हद तक कांग्रेस का नेतृत्व उत्तरदायी है, लेकिन इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि सहयोगी दलों की दबाव की राजनीति ने कांग्रेस की राह और अधिक मुश्किल बना दी। चूंकि आने वाले समय में इसकी उम्मीद कम ही है कि कोई एक दल अपने दम पर सरकार बनाने लायक सीटें जुटा सके इसलिए गठबंधन राजनीति के नियम-कायदे तय करना और अधिक आवश्यक हो गया है। संविधान निर्माता संभवत: आज की राजनीतिक परिस्थितियों की कल्पना नहीं कर सके थे और इसीलिए संविधान में ऐसे स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं जो खंडित जनादेश की स्थिति में एक स्थिर सरकार सुनिश्चित कर सकें। अब यह आवश्यक जान पड़ता है कि राजनीतिक दलों के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन करना अनिवार्य किया जाए। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए होने वाले गठबंधन राजनीतिक अवसरवाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं। चूंकि ऐसे गठबंधनों से जनादेश का निरादर होता है इसलिए चुनाव बाद होने वाले गठबंधनों पर रोक लगनी चाहिए। यह एक कदम ही देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदलकर रख देगा। जो दल चुनाव के समय एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हों वे अगर चुनाव के बाद जनादेश को ठुकराकर सत्ता पाने के लिए इस या उस बहाने आपस में हाथ मिला लें तो इसे आम जनता के साथ धोखाधड़ी ही कहा जाएगा। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था, लेकिन आज वे संप्रग सरकार को समर्थन दे रहे हैं। आखिर यह किस तरह की राजनीति है? यदि गठबंधन राजनीति के यही तौर-तरीके आगे भी जारी रहे तो समस्याएं और अधिक गंभीर होने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की जगहंसाई होना भी तय है।

इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


Tags: politics in India, politics, गठबंधन राजनीतिक, आम जनता, लोकसभा चुनाव



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