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सत्ता का कमजोर केंद्र

Posted On: 19 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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rajeev sachanसत्ता का कमजोर केंद्र यह हमारे इतिहास का सुपरिचित और सर्वज्ञात तथ्य है कि दिल्ली अर्थात भारत की केंद्रीय सत्ता जब-जब कमजोर हुई है, प्रांतों और देश के बाहर के शासकों ने उस पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं। यह इतिहास खुद को एक नए तरीके से दोहरा रहा है। पिछले दिनों मालदीव, इटली और पाकिस्तान की सरकारों ने भारत को चिढ़ाने और उसका निरादर करने वाले जो फैसले किए उनकी एक बड़ी वजह यह रही कि वे इससे भली तरह अवगत हैं कि मौजूदा समय भारत की केंद्रीय सत्ता कमजोर भी है और प्रतिष्ठाहीन भी। आखिर जिस सरकार को अपने देश में मान-सम्मान हासिल न हो उसके मान की परवाह बाहर वाले क्यों करेंगे? केंद्रीय सत्ता की कमजोरी अब महज आरोप भर नहीं रह गई है। अब यह एक तथ्य बन गया है कि वह भी कमजोर है और उसका नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री भी। चूंकि इस तथ्य पर बार-बार मुहर लग रही है इसलिए केंद्रीय सरकार को हर कोई चुनौती दे रहा है। कोई उचित कारणों से ऐसा कर रहा है और कोई अनुचित कारणों से या सिर्फ अपने राजनीतिक स्वार्थो को सिद्ध करने की नीयत से। भारत को श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और अन्य देशों का साथ देना चाहिए या नहीं, यह तय करने का अधिकार विशुद्ध रूप से भारत सरकार का होना चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं दिख रहा है। श्रीलंका के संदर्भ में विदेश नीति पूरी तौर पर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के चंगुल में आ गई है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक एक-दूसरे को मात देने के लिए श्रीलंका सरकार के खिलाफ आग उगल रहे हैं।

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इस आग में झुलस रही है भारत सरकार। उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के दबाव से कैसे मुक्त हो? चूंकि वह हर तरह के दबाव में आ जाती है और हर मामले में कभी भी अपनी नीति बदल लेती है इसलिए उस पर दबाव डालकर अपना उल्लू सीधा करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। रविवार को दिल्ली में हुई जनता दल (यू) की अधिकार रैली इसका ताजा प्रमाण है। जब केंद्र सरकार पिछड़े राज्यों के मानकों पर फिर से विचार करने के लिए तैयार हो गई है तो फिर इस रैली का कोई मतलब ही नहीं बनता था। वैसे सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या पिछड़े राज्यों के मानक बदलने की वास्तव में कोई जरूरत आ पड़ी है? यह सवाल इसलिए और उठ रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार का मकसद जनता दल (यू) को संप्रग के पाले में लाना माना जा रहा है। पता नहीं, सच क्या है, लेकिन यह अजीब है कि नीतीश कुमार विकास के अपने मॉडल को सबसे सही भी बता रहे हैं और साथ ही बिहार के लिए विशेष दर्जे की मांग भी कर रहे हैं। आखिर विकास का यह कैसा असली मॉडल है जिसमें विशेष राज्य के दर्जे की मांग करते हुए केंद्र को चेताया भी जा रहा है? नीतीश के प्रति नरमी दिखाकर केंद्र ने आगे अपनी और फजीहत का माहौल तैयार कर लिया है। वैसे कोई भी समझ सकता है कि नीतीश कुमार ने अधिकार रैली के जरिये नरेंद्र मोदी को भी चुनौती देने की कोशिश की है। वह राजग में रहते हुए नरेंद्र मोदी की राह में मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता का मुकाबला नहीं कर सकते। जहां नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता गुजरात के साथ देश के करीब-करीब सभी हिस्सों और यहां तक कि विदेशों में भी है वहीं नीतीश कुमार लोकप्रियता के मामले में बिहार और ज्यादा से ज्यादा दिल्ली तक सीमित हैं। किसी को इसमें कोई संदेह नहीं रह जाना चाहिए कि विशेष दर्जे की मांग के बहाने नीतीश कुमार राजनीति भी कर रहे हैं और केंद्र पर बेवजह दबाव भी बना रहे हैं। यदि केंद्र सरकार इस दबाव के आगे झुकी तो कल को उसे अन्य राज्य भी घेरेंगे। यदि आने वाले दिनों में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, रमन सिंह, प्रकाश सिंह बादल आदि अपने-अपने राज्यों के अधिकारों को लेकर दिल्ली में रैली करने आ धमकें तो हैरत नहीं। अगर केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल को चाहकर भी आर्थिक पैकेज नहीं दे सकी तो फिर वह बिहार के प्रति नरमी कैसे बरत सकती है? नि:संदेह फिलहाल इसके भी कोई आसार नहीं है कि कथित पिछड़े राज्य केंद्र से ज्यादा रियायत लेने के लिए नीतीश का नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे। वे सब तो अपने-अपने तरीके-तरीके से उस पर दबाव बनाएंगे। यदि केंद्र सरकार संकीर्ण राजनीतिक कारणों से बिहार के प्रति नरमी बरतती है तो एक तरह से अपने लिए मुसीबत बुलाने का ही काम करेगी। केंद्र सरकार जिस तरह से काम कर रही है या यह कहा जाए कि जैसे-तैसे अपने दिन काट रही है उसके चलते उसकी और छीछालेदर होना तय है। चिंता की बात केवल यह नहीं है कि उसका देश में मान-सम्मान घटता जा रहा है, बल्कि यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी फजीहत हो रही है। क्या इससे अधिक अपमानजनक और कुछ हो सकता है कि साढ़े तीन लाख आबादी वाला देश मालदीव भी उसे आंखे दिखाए? उसने ऐसा ही किया और भारत सरकार के लाख चाहने के बावजूद वहां की सरकार पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद को गिरफ्तार करके मानी।


इटली सरकार ने तो उसके मुंह पर तमाचा ही मारा है। अगर 23 मार्च तक इटली के वे दोनों नौसैनिक भारत नहीं आते जिन पर केरल के दो मछुआरों की हत्या का आरोप है तो भारत की और किरकिरी होना तय है। अगर भारत सरकार देश में अपनी लाज बचाने के चक्कर में इटली के राजदूत के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी फजीहत होनी तय है। इटली का मामला भी भारत सरकार के गले की हड्डी इसीलिए बना है, क्योंकि केरल के राजनीतिक दलों ने मारे गए मछुआरों को लेकर वैसी ही राजनीति की जैसी श्रीलंका के राजनीतिक दल श्रीलंका के तमिलों को लेकर कर रहे हैं। केंद्र सरकार केरल की राजनीति के समक्ष मौन बनी रही और नतीजा सबके सामने है।


इस आलेख के लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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Tags: अंतरराष्ट्रीय स्तर, राजनीतिक दलों, श्रीलंका , नरेंद्र मोदी



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