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केवल यमुना के लए नहीं

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केवल यमुना के लिए नहीं यमुना को बचाने के लिए हजारों लोगों का कारवां चल पड़ा है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा से शुरू हुई यह यात्रा 10 दिन बाद दिल्ली पहुंचने वाली है। जलपुरुष राजेंद्र सिंह और साधु-संतों के नेतृत्व में शुरू हुई इस यात्रा में जिस तरह हजारों लोग शामिल हुए हैं और पहले ही दिन इसका लोगों द्वारा जैसा जोरदार स्वागत किया गया है, उससे एक बात तो जाहिर हो गई कि यमुना के प्रति अभी लोगों की संवेदना सूखी नहीं है। इसे केवल धार्मिक भावना के कारण जुड़ाव भर कहना बहुत बड़ी गलती होगी। वास्तव में यह संकेत केवल यमुना के लिए नहीं, बल्कि अपने सभी प्राकृतिक संसाधनों के लिए है। इसमें जल संसाधन यानी नदी, ताल, पोखरे और झीलें ही नहीं, जंगल-जमीन से लेकर आसमान तक सब कुछ शामिल है।

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अपनी प्राकृतिक संपदा के प्रति आम जन की यह चेतना आश्वस्त करती है। इसके पहले यमुना की सफाई को लेकर सरकारी अमले द्वारा चलाई गई कई योजनाएं अगर सफल नहीं हो पाईं तो उसकी एक ही वजह है और वह यह कि सरकारी प्रयासों में आम जनता को जोड़ने की सिर्फ औपचारिकताएं ही निभाई गईं। वास्तव में उसे जोड़ने के लिए ईमानदार प्रयास किए ही नहीं गए। सरकारी और गैर सरकारी प्रयास के इस अंतर पर अब भारत में किसी को कोई आश्चर्य भी नहीं होता। हम लोग यह बात लगभग मानकर चलते हैं कि सरकारी प्रयास का मतलब ही है आधे-अधूरे मन से किया गया प्रयास। काम या प्रयास के नाम पर केवल खानापूरी की जाती है। यह बात किसी एक स्तर पर हो, ऐसा भी नहीं है। नीचे से लेकर सर्वोच्च स्तर तक हर जगह स्थिति एक जैसी है। कागजों पर सभी अपना-अपना दायित्व निभा देते हैं। इस दायित्व निभाने के तहत जिस मद में जितना बजट आया होता है, उसे जैसे-तैसे खर्च कर लिया जाता है। यहां सबसे बड़ी चिंता बजट खर्च करने की ही होती है, काम किसी के लिए चिंता का विषय नहीं होता। इसीलिए काम के होने का कोई असर भी दिखाई नहीं देता है। गंगा और यमुना ही नहीं, देश की कई नदियों पर अरबों रुपये का बजट खर्च कर दिया गया, लेकिन आज तक किसी भी नदी की सफाई भी नहीं की जा सकी। सच्चाई यही है कि सभी नदियां अधिक से अधिक प्रदूषित होती चली गई हैं। अब सवाल यह उठता है कि फिर इतना सारा खर्च करने से फायदा क्या हुआ? आखिर क्यों यह सारी कवायद की गई? राजेंद्र सिंह ने अपने दम पर राजस्थान की छोटी-बड़ी कुल मिलाकर पांच नदियों को नए सिरे से जीवन दिया। ये नदियां हैं अरवारी, रूपारेल, सरसा, भगानी और जहाजवाली। इस काम में जनता ने उनका साथ जरूर दिया, लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि वह स्वयं न तो कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और न ही उनके साथ सहयोग के लिए कोई सरकारी अमला था। बल्कि इस काम में सरकारी अमले और राजनीतिक गठजोड़ रखने वाले विभिन्न प्रकार के माफियाओं ने बार-बार उनके रास्ते में अड़ंगा ही डाला। न तो उनके हाथ में कानून था और न सिर पर बड़े लोगों का हाथ। इसके बाद भी इन सारे अड़गों को उन्होंने पार किया तो केवल अपनी इच्छाशक्ति और आम लोगों के सहयोग के दम पर। इसी तरह पंजाब में भी संत बलवीर सिंह सीचेवाल ने काली बेईं को अपने ही प्रयासों के दम पर जीवनदान दिया। उन्हें भी अपने काम में आम लोगों का ही योगदान मिला। ये वही आम लोग हैं जिन्हें सरकारी अमला जाने कैसे समझाने की कोशिश करता है कि करोड़ों रुपये और हजारों दिन खर्च हो जाते हैं, लेकिन वे समझ नहीं पाते। दूसरी तरफ एक आम आदमी आता है, उसके साथ न तो कोई ताकत होती है, न कोई सरकारी अमला और न ही उसके पास कोई संसाधन होता है और फिर भी वह जाने कैसे समझाता है कि जनता सब कुछ समझ जाती है। आखिर समझने और समझाने के बीच का यह फर्क कैसा है? सरकारी ढंग से चलने वाले तमाम पर्यावरणवादी संगठनों और विभागों का आमतौर पर यह मानना है कि जनता ही कोई बात नहीं मानती। अगर लोग सुधर जाएं तो नदी-नाले में बढ़ रही गंदगी पर नियंत्रण करना बहुत मुश्किल नहीं होगा। सरकार इन्हें समझाने पर बहुत खर्च करती है। सरकार से जुड़े सरकारी-गैर सरकारी अमले भी बहुत काम करते हैं, लेकिन आम जनता को समझाया नहीं जा पाता। सरकार अपने स्तर से नदी की सफाई पर अरबों रुपये खर्च कर चुकी है। कहने के लिए सफाई शुरू भी की गई। इसका जोर-शोर से प्रचार भी किया गया, लेकिन वास्तव में सफाई के नाम पर कुछ हुआ भी या केवल तस्वीरें खिंचा कर कर्तव्य पूरा हुआ मान लिया गया, यह कोई पलट कर देखने भी नहीं गया। आज जब एक नदी के लिए हजारों लोगों का कारवां निकल पड़ा है तो उसे दिल्ली से बाहर ही रोक देने के लिए पूरा सरकारी अमला परेशान हो गया है।


इससे यह भी पता चलता है कि वास्तव में कौन नहीं समझ पा रहा है, आम जनता या सरकारी अमला। आज यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या वह आम आदमी द्वारा डाला जाने वाला कूड़ा ही है जो यमुना-गंगा जैसी नदियों को गंदा कर रहा है या कुछ और। अगर नहीं तो सरकार आज अचानक इतनी चिंतित क्यों हो गई है? अभी तक पर्यावरण संरक्षण के नाम पर केवल कानून बना देने और कुछ बातों के लिए शमन-शुल्क या जुर्माना निर्धारित कर देने के अलावा सरकार देश की प्राकृतिक संपदा के संरक्षण लिए क्या करती रही है, इसका पता कभी नहीं चला। भाषणों की बात छोड़ दें तो वास्तव में सरकार ने कभी कोई प्रयास इस दिशा में किया, ऐसा पता नहीं चला। तमाम औद्योगिक इकाइयों में वहां से निकलने वाले कचरे के ट्रीटमेंट के लिए जो संयंत्र लगाए गए हैं, वे सही ढंग से काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी कभी जांच-पड़ताल हुई हो, ऐसा पता नहीं चला। ठीक इसी तरह, शहरों से निकलने वाले गंदे नालों का भी सारा पानी किसी न किसी नदी में सीधे डाल दिया जाता है। उसे नदी में डाले जाने से पहले उसका किसी प्रकार शोधन किया जाता हो, इसकी कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। नगरनिगम से लेकर सभी स्थानीय निकाय हर साल करोड़ों रुपये टैक्स जनता से वसूलते हैं। क्या उनकी इतनी भी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपने आसपास की नदियों को सुरक्षित रखें? अब सरकार इस यात्रा में शामिल लोगों को तरह-तरह से संदेश भिजवा रही है। उसकी कोशिश है कि यात्रा किसी तरह दिल्ली के बाहर ही रुक जाए। वह कुछ मांगें मान लेने की बात भी कर रही है, लेकिन आंदोलनकारियों को याद है कि दो साल पहले भी सरकार ऐसे ही वादे कर चुकी है, तब जबकि इलाहाबाद से लेकर दिल्ली तक पदयात्रा का आयोजन किया गया था। अफसोस की बात है कि आज तक उन वादों की दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका। इसलिए अब वे सरकार को उसके पुराने वादे याद दिला रहे हैं। बेहतर होगा कि सरकार इस दिशा में गंभीर हो। केवल वादे करके किसी भी महत्वपूर्ण मसले को ठंडे बस्ते के हवाले कर देने की नीति छोड़कर समस्याओं के वास्तविक समाधान की दिशा में बढ़े।

इस आलेख के लेखक निशिकांत ठाकुर हैं


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Tags: आंदोलनकारियों, संसाधन, समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों



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