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अंतिम सांसें गिनती एक समिति

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भारत में घपले-घोटाले होना जितना आसान है उनकी सही तरीके से जांच उतनी ही मुश्किल। इसका ताजा प्रमाण है वीवीआइपी हेलीकॉप्टर सौदे की जांच पर केंद्र सरकार का रवैया। केंद्र सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह इस घोटाले की जांच को लेकर गंभीर है। उसने विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद इस सौदे की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित कर दी। इस समिति का गठन जिस आनन-फानन तरीके से किया गया उससे किसी का भी चौंकना स्वाभाविक है। अभी तक जितनी भी संयुक्त संसदीय समितियां बनी हैं वे विपक्ष के दबाव में बनी हैं। कई बार तो इन समितियों के गठन के लिए विपक्ष को संसद के बाहर-भीतर खासा हंगामा भी करना पड़ा है। शायद सभी को स्मरण होगा कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति तब बनी जब संसद का एक सत्र बर्बाद हो गया और केंद्र सरकार को यह भय सताया कि कहीं अगला सत्र भी हंगामे की भेंट न चढ़ जाए। यह पहली बार है जब विपक्ष इसलिए हंगामा कर रहा है कि हेलीकॉप्टर सौदे की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति क्यों गठित कर दी गई? दरअसल विपक्ष यह मानकर चल रहा है कि इस समिति से कुछ भी हासिल नहीं होगा।

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इस समिति के पास बमुश्किल एक साल का समय है और इसमें संदेह है कि इतने समय में वह किसी नतीजे पर पहुंच सकेगी। नि:संदेह एक साल का समय कम नहीं होता, लेकिन अभी तो उसके पास कुछ करने को ही नहीं है। जब सीबीआइ साक्ष्यों के कथित अभाव में हाथ पर हाथ धरे बैठी है तो भला संयुक्त संसदीय समिति क्या कर लेगी? सीबीआइ ने वीवीआइपी हेलीकॉप्टर घोटाले में अभी तक इस बहाने एफआइआर दर्ज नहीं की है कि उसे कोई साक्ष्य हाथ नहीं लगा है। साक्ष्य तो तब हाथ लगेगा जब जांच की जाएगी और जांच आगे तब बढ़ सकेगी जब एफआइआर दर्ज होगी। कोई भी समझ सकता है कि सीबीआइ अर्थात उसकी नीति-नियंता यानी केंद्र सरकार की इसमें दिलचस्पी नहीं कि हेलीकॉप्टर सौदे की कोई गहन जांच हो। दरअसल इसी कारण संयुक्त संसदीय समिति के गठन का निर्णय चौंकाता है। यह समिति देश की आंखों में धूल झोंकने के लिए बनाई गई लगती है, ऐसा कुछ मानने का एक बड़ा आधार उस संयुक्त संसदीय समिति के कामकाज का तौर-तरीका जो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की कथित तौर पर जांच कर रही है। यह समिति जिस तरह से काम कर रही है उससे कोई महान आशावादी ही संतुष्ट हो सकता है। कांग्रेसी सांसद और साथ ही प्रवक्ता पीसी चाको की अध्यक्षता वाली यह समिति 2जी घोटाले के मुख्य अभियुक्त ए.राजा को बुलाने पर जिस तरह शर्म-संकोच कर रही है उससे तो यह लगता है कि घोटाला इस समिति ने किया है और उसकी जांच राजा कर रहे हैं। आखिर यह निपट मूर्खता नहीं तो और क्या है कि जिसने घोटाले को अंजाम दिया उससे पूछताछ किए बगैर जांच पूरी करने की कोशिश की जाए? वैसे किसी को भी यह भरोसा नहीं करना चाहिए कि चाको के नेतृत्व वाली संयुक्त संसदीय समिति 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की तह तक पहुंच सकेगी। इस समिति का अब तक का कामकाज घोटाले पर लीपापोती की ओर ही संकेत कर रहा है। यह समिति सच का पता लगाने के बजाय उस पर पर्दा डालती हुई नजर आ रही है। फिलहाल आसार इसी बात के अधिक हैं कि या तो यह समिति आगामी आम चुनाव तक अपना काम ही खत्म नहीं कर पाएगी या फिर ऐसी कोई रिपोर्ट देगी जिससे विपक्ष संतुष्ट नहीं होगा और उस पर कभी अमल नहीं हो सकेगा। भले ही संयुक्त संसदीय समिति को सबसे ताकतवर समिति कहा जाता हो, लेकिन देश इस नतीजे पर पहुंचने के लिए विवश है कि ऐसी समितियां अपनी ताकत का इस्तेमाल सच को सामने लाने के लिए नहीं कर पातीं।


अब यह धारणा काफूर हो चुकी है कि ऐसी समितियां दलगत हितों से ऊपर उठकर काम करती हैं। सच्चाई यह है कि ऐसी समितियों में दलगत हितों के हिसाब से काम होता है। कम से कम 2जी घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति तो ऐसा ही आभास करा रही है। हेलीकॉप्टर सौदे की जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति के भविष्य के बारे में फिलहाल कुछ कहना कठिन है, लेकिन इतना तय है कि अब जब भी किसी घपले-घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन की कोई मांग उठेगी या इसके लिए कोई पहल की जाएगी तो आम जनता शायद यही कहेगी कि कृपा करिए, रहने दीजिए, यह कष्ट मत करिए। इसमें संदेह है कि भविष्य में शायद ही कोई संसदीय समिति गठित हो। महान और सबसे समर्थ बताई जानी वाली संसद की यह कथित सबसे शक्तिशाली समिति अपनी अंतिम सांसें गिन रही है। यदि भविष्य में कोई संसदीय समिति गठित नहीं होती तो यह इस दृष्टि से अच्छा ही होगा कि देश का कुछ पैसा बचेगा और साथ ही किसी को यह उम्मीद भी नहीं होगी कि इस तरीके से भी सच का पता लगाया जा सकता है। वैसे तो संयुक्त संसदीय समितियों के निराशाजनक हश्र के लिए सभी दलों को श्रेय जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा श्रेय कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता के खाते में जाएगा। अब इस धारणा को और पुष्ट होने से रोका नहीं जा सकता कि जब भी कांग्रेस सत्ता में आती है, लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं की शामत आ जाती है। इस पर गौर करें कि कांग्रेस किस तरह नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पीछे हाथ धोकर पड़ी है। लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति निरादर भाव शायद कांग्रेस के डीएनए में घुल गया है। इस पर भी गौर करें कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं की शामत तब आई है जब प्रधानमंत्री पद पर वह मनमोहन सिंह आसीन हैं जिनकी नेक नियति और ईमानदारी के गुणगान की नौबत बजती ही रहती है।

इस आलेख के लेखक राजीव सचान हैं


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Tags: कांग्रेसी, संयुक्त संसदीय समिति, संयुक्त संसदीय, प्रवक्ता पीसी चाको



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