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तस्वीर बदलने की कोशिश

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Sanjay guptआम बजट सरकार की आर्थिक नीतियों को स्पष्ट करने के साथ-साथ एक तरह से उसके राजनीतिक एजेंडे की झलक भी देता है। आर्थिक आंकड़ों के जरिये सरकारें आम और खास, सभी के लिए अगले एक वर्ष के लिए अपनी नीतियों का खाका प्रस्तुत करती हैं और इन्हीं नीतियों के आधार पर देश की जनता सरकारों के कामकाज का हिसाब-किताब लगाती है। आम बजट के जरिये ही सरकार का राजनीतिक एजेंडा और खासकर यह तय होता है कि वह लोगों को राहत पहुंचाने के लिए कैसे तौर-तरीके अपनाने जा रही है। प्राय: बजट में ऐसी लोकलुभावन घोषणाएं की जाती हैं जो सत्तारूढ़ दल अथवा दलों के गठबंधन को राजनीतिक लाभ पहुंचा सकें। संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के आखिरी पूर्ण बजट को इसी नजरिये से देखा जा रहा था कि गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस देश की जनता को किस तरह आकर्षित करती है?

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चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में युवाओं, महिलाओं और गरीबों का जिस तरह जिक्र किया और इन वर्गो को अपनी विभिन्न नीतियों के केंद्र में रखा उससे यही संकेत मिलता है कि कांग्रेस नए वोट बैंक की तलाश में है। महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर देते हुए चिदंबरम ने कहा कि हम देश की लड़कियों और महिलाओं के साथ पूरी ताकत से खड़े हैं और उनके सशक्तीकरण के साथ उनकी सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। चिदंबरम ने इसे अपनी बुनियादी सोच बताते हुए कहा कि यही हमारी पार्टी का नजरिया भी है। कोई भी समझ सकता है कि बजट भाषण में इसकी जरूरत इसीलिए पड़ी, क्योंकि सरकार यह समझ रही है कि महिलाओं की सुरक्षा एक मुद्दा बन गया है। इसी तरह चिदंबरम ने युवाओं का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा लक्ष्य देश के उन युवाओं तक पहुंचना है जो दिल्ली में दुष्कर्म की घटना के खिलाफ उभरे जनांदोलन में सबसे आगे थे। उनके अनुसार, केंद्र सरकार युवाओं में कौशल के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। चिदंबरम ने अपनी पार्टी की नई नीति की ओर एक तरह से इशारा करते हुए कहा कि देश में 70 प्रतिशत वोटर 35 वर्ष से कम आयु के हैं।

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ध्यान रहे कि संप्रग सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में अभी तक आम आदमी का नारा बुलंद किया जाता रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि बदली परिस्थितियों में कांग्रेस को यह अहसास हो रहा है कि आम आदमी और विशेष रूप से अति गरीब लोगों के कल्याण का उसका दावा कारगर सिद्ध नहीं होने वाला। पहले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पक्ष में और फिर दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना के विरोध में उभरे जन आंदोलन के साथ-साथ सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने संभवत: कांग्रेस को अपनी राजनीति की दिशा फिर से निर्धारित करने के लिए मजबूर किया है। हर कोई इससे परिचित है कि भारत में इस समय युवाओं का एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो अभी राजनीतिक रूप से अछूता है। यह वर्ग सोशल मीडिया के जरिये अपनी भावनाएं भी व्यक्त कर रहा है। कांग्रेस की कोशिश इस वर्ग को अपने पक्ष में लाने की है। कांग्रेस की इस रणनीति में कहीं न कहीं राहुल गांधी का प्रभाव है। कांग्रेस यह जानती है कि उसे अगले आम चुनाव में दो चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। एक, भाजपा की ओर से नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए संभावित दावेदारी और दूसरी, बढ़ती महंगाई। बजट मोदी से मुकाबले की तैयारी का अवसर नहीं हो सकता, लेकिन दूसरी चुनौती का सामना करने के मामले में चिदंबरम कुछ करते हुए दिखाई देते हैं। वित्तमंत्री ने राजकोषीय घाटे को अगले साल तक 4.8 फीसदी तक कम करने का भरोसा जताया है और इसके लिए कुछ कदम उठाने का एलान भी किया है। लगता है कि चिदंबरम के इस भरोसे पर कांग्रेस को यकीन है कि वह इस बजट से अगले आम चुनाव में सफलता हासिल कर लेगी। शायद यही कारण है कि आम जनता को यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि आने वाले दिनों में महंगाई नियंत्रित होगी। स्पष्ट है कि यह एक चुनावी संदेश है। अगर वित्तमंत्री आने वाले छह-आठ महीनों में मुद्रास्फीति को नियंत्रित कर पाए तो नि:संदेह आम जनता को राहत मिलेगी और इससे एक सकारात्मक माहौल बन सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह संभव है कि रिजर्व बैंक भी ब्याज दरों में कमी करने पर सहमत हो जाए। बजट में चिदंबरम ने विकास से जुड़ी कुछ दूरगामी महत्व वाली योजनाओं का खाका खींचा है और अलग-अलग वर्गो को यह संदेश देने की कोशिश की है कि इन योजनाओं के पूरा होने पर आर्थिक सूरत बदलेगी। स्पष्ट है कि यह शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के ऊपर है कि वे चिदंबरम की योजनाओं पर भरोसा करते हैं या नहीं? आम बजट को सरकार के आर्थिक आंकड़ों का एक लेखा-जोखा ही होना चाहिए, लेकिन देखा यही जाता है कि तमाम नीतिगत घोषणाएं बजट के लिए रख ली जाती हैं। नीतिगत घोषणाओं का लाभ तभी है जब उन पर समय रहते सही तरह से अमल हो। नीतिगत घोषणाओं के लिए एक वर्ष तक इंतजार करना भारत सरीखे देश के लिए ठीक नहीं। दुर्भाग्य से संप्रग ही नहीं, पिछली सभी सरकारों ने ऐसा ही किया है और अब तो यह एक रिवाज सा बन गया है कि नीतिगत घोषणाओं के लिए बजट का इंतजार किया जाता है। अब यह व्यवस्था बदलनी चाहिए। इसके साथ ही बजट के दायरे के बाहर की चीजें जैसे कि नौकरशाही के रवैये और निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी लाया जाना भी आवश्यक है। इसमें संदेह नहीं कि संप्रग सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में वह नैतिक साहस नहीं दिखा सकी जिसकी इस समय देश को आवश्यकता थी। बजट भाषण के आखिर में चिदंबरम ने विवेकानंद का उद्धरण देते हुए कहा कि समस्त ताकत हमारे अंदर है। लिहाजा अपने भविष्य का निर्माण भी हमें ही करना चाहिए। उन्होंने पूरे राजनीतिक वर्ग से यह अपील की कि सभी दल मिलकर ऐसे निर्णय लें जिससे भारत में एक नए युग की शुरुआत हो। नि:संदेह यह समय की मांग है कि ऐसी कोई शुरुआत वास्तव में हो।


पूरा विश्व भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। इसका एक बड़ा कारण ज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत की शक्ति तो है ही, एशिया और एक तरह से विश्व में चीन का एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरना भी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि भारत न केवल मजबूत हो, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका भी बढ़ाए। इसमें दो राय नहीं कि संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इन उम्मीदों को तोड़ने का ही काम किया है। चिदंबरम के पास बजट भाषण के रूप में इतना समय नहीं था कि वह भारत की तमाम कमजोरियों को देश के सामने रखते। बजट भाषण वह माध्यम है भी नहीं कि ऐसा किया जाए, लेकिन फिर भी उन्होंने जो उम्मीद जगाई है उसके अनुरूप यदि आने वाले समय में वास्तव में काम भी हो सके तो कुछ हद तक तस्वीर बदल सकती है।

इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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Tags: आर्थिक आंकड़ों , चीन , चिदंबरम, बजट, कांग्रेस की रणनीति, वैश्विक स्तर




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