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कुश्ती की उपेक्षा क्यों

Posted On: 19 Feb, 2013 sports mail में

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CGM sir कुश्ती को 2020 ओलंपिक की मुख्य स्पर्धाओं की सूची से हटाए जाने को लेकर न केवल इस खेल से जुड़े लोग, बल्कि दूसरे तबके भी चिंतित हैं। पंजाब और हरियाणा समेत देश के कई हिस्सों के पहलवानों ने इस पर हैरत जताई है। आमतौर पर इस संबंध में सबका मानना है कि भारत सरकार को इस संबंध में पहल करनी चाहिए। कुश्ती मूलत: किस देश का खेल है, इस विषय पर तो विवाद हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह दुनिया के प्राचीनतम खेलों में शामिल है। हमारे प्राचीनतम ग्रंथों में एक महाभारत में भी कुश्ती का वर्णन मिलता है और उससे यह पता भी चलता है कि इसे न केवल खेल या शक्ति प्रदर्शन की कला, बल्कि युद्ध की एक तकनीक के रूप में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। बहुत ज्यादा नहीं, सिर्फ दो दशक पहले तक उत्तर भारत के लगभग हर गांव में एक-दो अखाड़े देखे जा सकते थे। उन अखाड़ों में गांव के युवक कुश्ती का अभ्यास करते थे।

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अब न तो वैसे अखाड़े दिखते हैं और न कुश्ती का वह अभ्यास। यह शायद संस्थागत उपेक्षा का ही असर है, जो लोकप्रियता की दौड़ से धीरे-धीरे बाहर होती चली गई है। ऐसी स्थिति में ओलंपिक की मुख्य स्पर्धाओं से उसे बाहर करना खेल जगत के लिए एक घातक फैसला होगा। कुश्ती का ओलंपिक जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं से बाहर होना केवल इसलिए चिंताजनक नहीं है कि वह प्राचीनतम खेल है, बल्कि इसलिए भी कि यह एक ऐसा खेल है, जो किसी अतिरिक्त साधन की मांग नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं के स्तर तक पहुंचने के लिए इसमें प्रशिक्षण तो जरूरी होता है, लेकिन शुरुआती दौर में इसके लिए किसी बड़ी पूंजी की आवश्यकता नहीं होती है। बस इतना काफी है कि ठीक-ठाक शरीर और जज्बा हो। देश भर में इसकी इतनी लोकप्रियता की वजह भी शायद यही है। गांवों में तो यह भी देखा जाता रहा है कि लड़के फिट रहने के लिए कुश्ती लड़ा करते थे। नाग पंचमी और संक्रांति जैसे त्योहारों के अवसर पर गांव-गांव में इसकी प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित की जाती थीं। इन स्पर्धाओं में आसपास के गांवों के लोग जुटते थे और कई बार दूर-दराज से भी लोग आते थे। अब गांवों में भी यह सब कहीं-कहीं ही दिखाई देता है। अधिकतर जगहों से तो ये परंपराएं खत्म होती जा रही हैं।

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कुश्ती एक ऐसा खेल है, जो गांवों से लेकर शहरों तक समान रूप से लोकप्रिय रहा है। इसी खेल ने गुरु हनुमान, सतपाल सिंह, चंदगी राम, दारा सिंह और लीला राम जैसे पहलवान दिए। कुश्ती के अधिकतर पहलवान ऐसे रहे हैं, जिन्होंने खेल से बहुत अधिक धन कमाने की अपेक्षा कभी नहीं की। उन्होंने सादगी से जीना और निस्स्वार्थ भाव से खेलते रहना पसंद किया। अभी भी कुश्ती के अधिकतर पहलवान ऐसे ही हैं। इसकी बड़ी वजह शायद यह भी है कि इस खेल में अधिकतर ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग आते हैं, जो खेल को पैसा कमाने के साधन के बजाय एक पवित्र उद्देश्य के रूप में देखते हैं। इसीलिए गरीब घरों के ग्रामीण लड़के भी इसमें आने का साहस कर पाते हैं और वे अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में जाकर देश का नाम रौशन कर पाते हैं। हरियाणा में सरकार ने इसे प्रोत्साहन दिया तो उसका नतीजा आज सबके सामने है। इस नजरिये से देखें तो कुश्ती का ओलंपिक की मुख्य स्पद्र्धाओं से बाहर होना भारत के लिए एक बड़ा झटका है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला सितंबर में होना है, लेकिन अगर इसके लिए अभी से आवाज न उठाई गई तो फिर इसे ओलंपिक की मुख्य स्पर्धाओं में शामिल करा पाना शायद असंभव हो जाए। इस लिहाज से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना बिलकुल सही लगता है कि भारत सरकार को सितंबर में होने वाले आखिरी फैसले का इंतजार नहीं करना चाहिए। प्रधानमंत्री को इसके लिए अभी से आवाज उठानी चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति इस पर पुनर्विचार कर सके। मोदी की इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुश्ती को आधुनिक खेल न मानना इसका अपमान है।

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यह तय किया जाना चाहिए कि किसी खेल को आधुनिक मानने या न मानने के मानदंड क्या हैं। साथ ही, यह भी कि क्या ओलंपिक जैसे विशाल आयोजनों में केवल आधुनिक खेलों को ही शामिल होने का अधिकार है। अगर समिति ने केवल यही एक आधार बनाया है तो यह अभी इसमें शामिल दूसरे खेलों के लिए भी खतरे की घंटी है। ऐसी स्थिति में यह सवाल भी उठता है कि क्या परंपरागत खेलों की अब उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाए। एक तरफ तो प्राचीन धरोहरों को सहेजने पर यूनेस्को समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठन हर साल अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं और दूसरी तरफ प्राचीन खेलों के प्रति यह उपेक्षा भाव.. इसका कोई सीधा कारण समझ में नहीं आता। ओलंपिक पदक विजेता सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे कुश्ती के दिग्गजों ने भी इसे फैसले पर अचरज जताया है। सुशील ने तो यहां तक कहा कि यह भारतीय कुश्ती के लिए काला दिन है। अभी यह खेल तेजी से विकास कर रहा था और इसका भविष्य काफी उज्ज्वल दिख रहा था, लेकिन अब यह अवसान की ओर अग्रसर होगा। योगेश्वर ने इसे युवा पहलवानों के लिए बहुत बड़ा झटका कहा है। हालांकि कोच यशवीर सिंह इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि यह खेल एक बार फिर ओलंपिक में जगह पाने में सफल होगा। ध्यान रहे, बहुत पहले सन 1900 में भी एक बार ऐसा हो चुका है, लेकिन इसके बाद इस फैसले पर पुनर्विचार करके और कुश्ती को फिर से ओलंपिक की मुख्य स्पद्र्धाओं में शामिल कर लिया गया। तब से लेकर अब तक यह लगातार इसमें शामिल रही है। सच तो यह है कि भारत समेत सभी एशियाई देश मिलकर अगर इस बात के लिए दबाव बनाएं तो कुश्ती को ओलंपिक की मुख्य स्पद्र्धाओं में बनाए रखना बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि अभी से सक्रिय हो जाया जाए। उस बात का इंतजार न किया जाए कि अब सितंबर में आखिरी फैसला हो जाए। इसे मुख्य स्पर्धाओं से बाहर किए जाने को लेकर अंतिम रूप से फैसला हो जाने के बाद कुछ कर पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। शायद यह अपने खेलों के प्रति उपेक्षा भाव का ही परिणाम है कि भारत में कई अच्छे और रोमांचक खेल होने के बावजूद हम इन्हें न तो अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में शामिल करा पाए और न अपने देश में उन्हें उनकी वास्तविक प्रतिष्ठा ही कर सके। इसका नतीजा यह हुआ कि अधिकतर भारतीय विस्मृति के गर्भ में समाते चले गए। कई खेल अब केवल दूर-दराज के गांवों में कुछ बच्चों तक सीमित रह गए हैं तो कई खत्म ही हो गए। कम से कम कुश्ती के साथ ऐसा न होने पाए, इसके लिए भारत सरकार को अभी से सक्रिय हो जाना चाहिए।


इस आलेख के लेखक निशिकांत ठाकुर हैं


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Tags: Indiagames, wrestle,  कुश्ती, 2020 ओलंपिक



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