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लोकपाल के दायरे पर सवाल

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sanjay jiiलोकपाल विधेयक के संशोधित मसौदे को केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। कैबिनेट ने जिस मसौदे को मंजूरी दी है उससे न तो अन्ना हजारे संतुष्ट हैं और न ही अरविंद केजरीवाल। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सख्त लोकपाल व्यवस्था के निर्माण की आवाज बुलंद करने वाले अन्ना और केजरीवाल के अनुसार यह मसौदा लोकपाल के नाम पर जनता के साथ धोखा है।अन्ना और केजरीवाल की तरह मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी संशोधित मसौदा रास नहीं आया है। भाजपा का यह मानना सही है कि जब तक सीबीआइ को स्वायत्तता नहीं मिलेगी तब तक लोकपाल की व्यवस्था सही तरह काम नहीं कर सकेगी। आश्चर्यजनक रूप से संशोधित मसौदे में लोकपाल के दायरे से राजनीतिक दलों को दूर रखा गया है, जबकि सभी इससे परिचित हैं कि भ्रष्टाचार मुख्य रूप से राजनीतिक दलों की ही देन है।



राजनीतिक दलों के काम करने के तौर-तरीकों में न तो कोई पारदर्शिता है और न ही जवाबदेही। उनका एकमात्र मकसद येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करना या सत्ता में बने रहना है। मौजूदा समय राजनीतिक दलों का जैसा आचरण है उससे कुल मिलाकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही मिलता है। राजनीतिक दलों को लोकपाल के दायरे में न रखने के संदर्भ में इस तर्क का कोई मूल्य नहीं कि वे जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत आते हैं और इस लिहाज से उनके आचरण पर चुनाव आयोग की निगरानी रहती है। सब जानते हैं कि राजनीतिक दल जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव के लिए तैयार नहीं। यह भी निराशाजनक है कि सीबीआइ को पूरी तरह स्वायत्त बनाने के मामले में एक बार फिर कदम पीछे खींच लिए गए।



यह ठीक है कि नई व्यवस्था के तहत सीबीआइ के निदेशक की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका होगी, लेकिन सीबीआइ की स्वायत्तता के लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। सीबीआइ जब तक चुनाव आयोग की तरह पूर्ण स्वायत्त संस्था नहीं बनती तब तक उसके राजनीतिक इस्तेमाल की आशंका बनी ही रहेगी। सीबीआइ को जिस तरह पूर्ण स्वायत्तता देने से एक बार फिर इन्कार किया गया उससे स्पष्ट है कि केंद्र सरकार उसे एक कठपुतली की तरह इस्तेमाल करते रहना चाहती है। सीबीआइ को पूर्ण स्वायत्तता न देने को लेकर चाहे जो तर्क दिए जाएं, आम जनता को यही संदेश गया है कि केंद्र सरकार उसके राजनीतिक इस्तेमाल का मोह छोड़ने के लिए तैयार नहीं। लोकपाल के संशोधित मसौदे से राजनीतिक दलों को ही नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं और सरकार से रियायती दर पर जमीन आदि हासिल करने वाले गैरसरकारी संगठनों को भी बाहर रखा गया है।



यह विचित्र है कि सरकार से आर्थिक मदद पाने वाली गैरसरकारी संस्थाएं तो लोकपाल के दायरे में होंगी, लेकिन सरकार से जमीन आदि हासिल करने वाले गैरसरकारी संगठन लोकपाल की निगरानी से मुक्त होंगे। आखिर इस तरह के फर्क का क्या औचित्य? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो गैरसरकारी संगठन सरकार से रियायती दर पर जमीनें हासिल कर चुके हैं उनके कामकाज को निगरानी से बचाने के लिए उन्हें लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया गया? भले ही सरकार यह दावा कर खुद को सही और उदार साबित करने की कोशिश करे कि उसने प्रवर समिति की 16 में से 14 सिफारिशें मान ली हैं, लेकिन सच यह है कि जो दो सिफारिशें नहीं मानी गईं उनके चलते ही लोकपाल कहीं अधिक कमजोर नजर आने लगा है। इनमें पहली सिफारिश भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी को जांच से पहले अपना पक्ष रखने की सुविधा न देने की थी और दूसरी, लोकपाल की संस्तुति से किसी मामले की जांच कर रहे सीबीआइ अफसरों के तबादले का अधिकार लोकपाल के पास ही होने की। इन दोनों महत्वपूर्ण सिफारिशों को ठुकराया जाना निराशाजनक है। इन सिफारिशों को ठुकराए जाने से तो यही स्पष्ट होता है कि सरकार जानबूझकर लोकपाल को पर्याप्त अधिकार देने को तैयार नहीं और उसे भ्रष्ट अफसरों की कुछ ज्यादा ही परवाह है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि लोकपाल विधेयक के संशोधित मसौदे में कुछ बुनियादी खामियां हैं, लेकिन चार दशक से अधिक समय से जिस व्यवस्था का इंतजार किया जा रहा है उसे अस्तित्व में लाने के लिए जो ताजा पहल हुई है उसका स्वागत किया जाना चाहिए।



लोकपाल व्यवस्था के सपने को हकीकत में बदलने के साथ ही इस पर नए सिरे से विचार-विमर्श शुरू होना चाहिए कि राजनीतिक दलों समेत जो संगठन निगरानी से छूट गए हैं उनके भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए जाएं? इसका कोई औचित्य नहीं कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए जो संस्था बन रही है उसके दायरे में कुछ संस्थान और संगठन ही आएं। इस आधी-अधूरी व्यवस्था से न केवल भ्रष्टाचार की गुंजाइश बनी रहेगी, बल्कि यह एक तरह का भेदभाव भी होगा। बेहतर हो कि लोकपाल के सभी पहलुओं, खासकर उसके अधिकारों पर गंभीर चिंतन-मनन हो ताकि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी संस्था अथवा संगठन को बच निकलने का मौका न मिले। एक बड़ी सामाजिक बुराई का रूप ले चुका भ्रष्टाचार न केवल अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की साख पर बट्टा लगा रहा है, बल्कि देश के विकास पर भी रोड़े अटका रहा है। इतना ही नहीं, राजनीतिक दलों के भ्रष्ट आचरण के कारण समाज के अंदर एक तरह का भेदभाव भी पनप रहा है।



भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के मामले में राजनीतिक दलों की कथनी और करनी का भेद स्वत: इससे स्पष्ट हो जाता है कि वे इस बुराई को सबसे बड़ा अभिशाप तो मानते हैं, लेकिन उस पर अंकुश लगाने के मामले में या तो हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं या मंथर गति से आगे बढ़ रहे हैं। लोकपाल व्यवस्था के निर्माण में देरी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। लोकपाल के दायरे से राजनीतिक दलों को बाहर रखने का निर्णय कुल मिलाकर आम जनता के साथ राजनीतिक वर्ग की एक और बेईमानी के रूप में देखा जाएगा। बेहतर हो कि संशोधित मसौदे पर संसद में बहस के दौरान इस बिंदु पर गहन विचार-विमर्श हो। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के संदर्भ में अपनी गंभीरता और साफ नीयत का परिचय देने के लिए राजनीतिक दलों के लिए यह आवश्यक है कि वे न केवल इसके मूल कारणों की तह में जाएं, बल्कि निगरानी की नई व्यवस्था के दायरे में आने के लिए स्वत: आगे आएं।



यदि ऐसा नहीं किया जाता तो भले ही लोकपाल संस्था शीघ्र ही अस्तित्व में आ जाए, लेकिन यह सारी कवायद एक तरह से आम जनता को भ्रमित करने वाली साबित होगी। जनता यही मानेगी कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने दशकों की देरी के बाद लोकपाल व्यवस्था के निर्माण की खानापूरी करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली ताकि चुनाव में यह दावा किया जा सके कि उसने एक बड़ा काम कर दिया। फिलहाल यह कहना कठिन है कि जिस मसौदे को कैबिनेट ने मंजूरी दी है उसके आधार पर बनाई गई लोकपाल संस्था भ्रष्टाचार पर वास्तव में नकेल लगा सकेगी।



इस आलेख के लेखक संजय गुप्त है .


Tag: लोकपाल विधेयक,भ्रष्टाचार ,राजनीति, कैबिनेट , राजनीतिक दल,lokpal bill, politics, political party



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