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बिना नेतृत्व वाला देश

Posted On: 16 Jan, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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rajeev sachanदिल्ली की घटना के बाद हर स्तर पर यह आवाज उठी कि व्यवस्था यानी पुलिस, कानून आदि में सुधार के साथ ही समाज की सोच और उसके नजरिये में बदलाव की जरूरत है, लेकिन फिलहाल ऐसे कहीं कोई संकेत उपलब्ध नहीं हैं कि उद्वेलित, विचलित और आंदोलित समाज में बदलाव आना शुरू हो गया है। वैसे भी सामाजिक बदलाव एक सतत प्रक्रिया है और ऐसे बदलाव रातों-रात नहीं हो सकते। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया तब सुगम और प्रभावी साबित होती है जब समाज को नेतृत्व देने वाले सामने आ जाते हैं। स्वतंत्रता के पहले और बाद में समाज में सुधार-बदलाव लाने का काम अनेक लोगों ने किया और उन्होंने अपनी छाप भी छोड़ी। इनमें राजनेता, संत और शिक्षाविद भी शामिल थे। धीरे-धीरे समाज सुधार की प्रक्रिया ठप सी पड़ गई और आज ऐसे किसी राजनेता, संत, शिक्षाविद्आदि का उल्लेख करना मुश्किल है जिसे समाज सुधारक की संज्ञा दी जा सके और जिसका देश पर व्यापक प्रभाव नजर आता हो।


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समाज की सोच बदलने और दिशा दिखाने का काम हो तो रहा है, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में और एक सीमित दायरे में। कठिनाई यह है कि समाज को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली राजनीति में ऐसा कोई चेहरा तलाश करना दुर्लभ है, जो समाज के लिए अनुकरणीय हो और जो यह दावा कर सकने में सक्षम हो उसका लक्ष्य समाज को दिशा दिखाना, उसे समरस और मित्रवत बनाना हो। अब राजनीति का लक्ष्य समाजसेवा नहीं रह गया है। सच्चाई यह है कि वे अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए समाज को बरगलाने, बहकाने का काम कर रहे हैं। यही कारण है कि राजनीति में ऐसे लोग मुश्किल से प्रवेश कर पा रहे हैं जिन्हें साफ-सुथरी छवि वाला कहा जा सके। इस मान्यता से सभी परिचित हैं और गीता में भी यह कहा गया है कि जैसा आचरण समाज के श्रेष्ठजन करते हैं वैसा ही समाज के अन्य लोग भी करते हैं। अब जरा देखिए कि क्या राजनीति में कोई ऐसा श्रेष्ठजन है जिसका आचरण समाज के लिए अनुकरणीय हो? क्या मनमोहन सिंह या सोनिया गांधी फिर मूल्यों-मर्यादाओंकी बात करने वाली पार्टी भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष नितिन गडकरी का आचरण ऐसा है जिससे समाज कोई सीख ले सके? मनमोहन सिंह राष्ट्र को नेतृत्व देना तो दूर रहा, उससे नजरें तक नहीं मिलाते-ऐसे समय खास तौर पर जब देश उनकी ओर टकटकी लगाए देख रहा होता है।



दिल्ली की शर्मनाक घटना के बाद उन्हें राष्ट्र को संबोधित करने में एक सप्ताह लग गया। नियंत्रण रेखा पर दो भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या, खासकर उनके शव क्षत-विक्षत किए जाने की पाकिस्तान की कायरता पूर्ण कार्रवाई से क्षुब्ध देश खुद को अपमानित महसूस कर रहा है, लेकिन कोई देशवासियों को भरोसा-दिलासा देने के लिए आगे नहीं आ रहा। लगता है, प्रधानमंत्री यह तय नहीं कर पा रहे कि वह देशवासियों से क्या कहें? यह भी हो सकता है कि वह इसकी जरूरत ही महसूस न कर रहे हों। उनके मंत्रियों के बयानों को कोई मतलब नहीं। वैसे भी रक्षा मंत्री कुछ कह रहे हैं तो विदेश मंत्री कुछ और। केंद्र सरकार इसके लिए कहीं अधिक कोशिश करती दिख रही है कि पाकिस्तान के खिलाफ सख्ती दिखाए बगैर देश की जनता यह मान ले कि उसने बहुत तीखे तेवर अपना रखे हैं। इस समय भारत सरकार का व्यवहार पाकिस्तान सरीखा है और जैसा रक्षात्मक रवैया पाकिस्तान को अपनाना चाहिए वैसा भारत अपनाए हुए है।



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राष्ट्र के मान-सम्मान और उसके लोगों की भावनाओं की परवाह न करने वाला नेतृत्व न तो कभी आदर का पात्र बन सकता है और न ही कोई आदर्श स्थापित कर सकता है। वह अनुकरणीय तो कभी हो ही नहीं सकता। हालांकि राष्ट्रीय दलों के मुकाबले क्षेत्रीय दल अपनी बढ़त कायम करते जा रहे हैं, लेकिन ऐसे दलों में भी ऐसा कोई नेता नजर नहीं आता जिसका आचरण अनुकरणीय कहा जा सके। इनमें से ज्यादातर जातिवादी हैं या सांप्रदायिक। इनमें से कई वे हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। यह स्थिति उस देश में है जहां महात्मा गांधी एक राजनेता के रूप में सबसे बड़े समाज सुधारक के तौर पर विश्व प्रसिद्ध हुए और उन्हें संत का दर्जा मिला। हाल के समय में जिस राजनेता ने अपने आचरण से समाज को प्रभावित किया उनमें लालबहादुर शास्त्री प्रमुख हैं। जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था तो उन्होंने आ ान किया कि लोग एक समय ही भोजन करें।



शास्त्री जी का नैतिक पक्ष इतना प्रबल था कि बहुत से लोगों ने उनकी सलाह पर अमल किया। ये लोग जानते थे कि शास्त्री जी खुद भी ऐसा ही कर रहे होंगे। कल्पना कीजिए कि अगर आज कोई नेता ऐसी ही कुछ सलाह दे तो क्या समाज पर उसका कोई असर पड़ेगा? ऐसा बिलकुल भी नहीं होगा, क्योंकि हर कोई जान रहा होगा कि यह तो निरा पाखंड है। नि:संदेह यह नहीं कहा जा सकता कि राजनीति में सक्रिय सभी नेता नैतिकता और ईमानदारी से कोसों दूर हैं। तमाम नेता नैतिकता आधारित राजनीति के पक्षधर हैं, लेकिन उनकी हालत उन अच्छे सिक्कों की तरह है जिन्हें खोटे सिक्कों ने चलन से बाहर कर दिया है। यही कारण है कि संसद और विधानसभाओं का आचरण भी कोई उम्मीद नहीं जगाता। समस्या केवल यह नहीं है कि राजनीति में ही ऐसे चेहरों का अकाल है जिनका आचरण अनुकरणीय हों। ऐसी ही स्थिति धर्म की भी है। इलाहाबाद में कुंभ के अवसर पर जुटे अनेक धर्माचार्यो की ओर से जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार कोई पर्याप्त जगह न मिलने से नाराज है तो कोई अन्य किसी कारण से। यदि गनीमत है तो यही कि राजनीति और धर्म सरीखी स्थिति अन्य क्षेत्रों में नहीं।


लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं


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Tag:rape , rape in delhi , sarkar , police , society , women in society , National , रेप , दिल्ली में रेप  , सरकार , पुलिस , समाज , समाज में नारी की  स्थिती



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