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व्यवस्था पर असर

Posted On: 8 Jan, 2013 में

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cgm jiiसामूहिक दुष्कर्म और हैवानियत की शिकार लड़की पूरी ताकत लगाकर भी आखिरकार जिंदगी की जंग हार गई। यह बात अब तक हर जुबान पर है कि हैवानियत इस हद तक हो सकती है, ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता था। यह हैवानियत की सारी हदें पार कर जाने का ही नतीजा था जो देश भर के लोग इस घटना को लेकर आगबबूले हो गए और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश फूट पड़ा। कई दिनों तक धरना-प्रदर्शन चलता रहा। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हुआ है जब जनभावनाओं के स्वत: स्फूर्त उबाल को रोकने के लिए नई दिल्ली क्षेत्र में धारा 144 लागू करने और कई मेट्रो स्टेशन बंद करने तक की नौबत आ गई। एक दिन पूरा भारत बंद भी रहा। इस पूरी कवायद का जिम्मेदार लोगों पर कोई असर पड़ा हो, ऐसा कहीं दिखाई नहीं देता। न तो पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली सुधरी है और न शासन ने व्यवस्था पर ध्यान देने की कोई जरूरत समझी है। यह देखा जाना चाहिए कि आम जनता के इस गुस्से और उसकी अभिव्यक्ति का हमारी व्यवस्था और सोच पर क्या वास्तव में कोई फर्क पड़ा है? अगर नहीं तो यह सब करने का फायदा क्या रहा? बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं।


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इस वीभत्स घटना का केंद्र दिल्ली है। घटना के खिलाफ धरने-प्रदर्शन भी सबसे अधिक यहीं हुए। सबसे ज्यादा आक्रोश यहीं दिखा और शासन-प्रशासन ने सारे आश्वासन भी यहीं दिए। सबसे ज्यादा आलोचना भी दिल्ली की कानून-व्यवस्था और खासकर यहां की ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था को लेकर हुई। अब भुक्तभोगी और एकमात्र चश्मदीद लड़के का इंटरव्यू प्रसारित-प्रकाशित होने के बाद पीसीआर भी आलोचना के घेरे में आ गई है। पुलिस की पूरी कार्यप्रणाली ही सवालों के घेरे में आ गई है। इतनी आलोचना के बाद यह तो गौर किया ही जाना चाहिए कि आखिर इससे दिल्ली की कानून-व्यवस्था और ट्रैफिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ा है। क्या अब ऑटो या टैक्सी वाले मीटर से चलने लगे हैं और वे एक बार कहने पर किसी भी उचित गंतव्य पर जाने लगे हैं या पहले की ही तरह मनमाने किराये और किसी भी जगह जाने को लेकर बहानेबाजी वाली झिकझिक की अपसंस्कृति जारी है? क्या बसें पर्याप्त संख्या में चलने लगी हैं? क्या काले शीशों वाली गाडि़यां सड़कों पर चलनी बंद हो गई हैं? क्या पुलिस संदिग्ध ढंग से चल रहे वाहनों या लोगों की जांच करने लगी है? क्या जनता की इस पूरी कवायद का शोहदों और अपराधियों पर कोई असर पड़ा है? स्थितियों पर नजर डालें तो बेहद शर्मनाक सच उभरकर सामने आता है। इस दरिंदगी और इसके खिलाफ हुए जनता के रोष प्रदर्शन के बाद भी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही सामूहिक दुष्कर्म की कई घिनौनी घटनाएं घटी हैं। दिल्ली में अपराधी कितने निर्भय हो गए हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि घरों में घुसकर भी अकेली महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म जैसी घिनौनी घटनाएं इस बीच ही हुई हैं। इसी बीच नोएडा में भी एक लड़की की हत्या कर दी गई और इसके बाद फिर स्थानीय स्तर पर धरना-प्रदर्शन और घेराव जैसी घटनाएं हुईं।


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इस घटना को लेकर जनता के दबाव के ही कारण पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित और एक को लाइनहाजिर किया गया। जनता को भयमुक्त शासन देने का वादा हर सरकार करती है, पर सच्चाई यह है कि भयमुक्त केवल अपराधी होते जा रहे हैं। आम जनता दिन-ब-दिन अधिक से अधिक भय के वातावरण में जीने को मजबूर होती जा रही है। क्या इसी दिन के लिए हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी? यातायात व्यवस्था कितनी सुधरी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो ऑटो और टैक्सी वाले एक दशक पहले कहने पर भी बगैर मीटर के चलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे, वे मीटर का नाम लेते ही आगे बढ़ जाते हैं। इनकी मनमानी की हालत यह है कि इनसे जहां जाने के लिए कहा जाए, बस वहीं इन्हें नहीं जाना होता है। किराया ये पहले से तय करते हैं और वह निर्धारित से चार-पांच गुना तक होता है। ऐसा तब है, जबकि पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मेट्रो और लो फ्लोर बसों के रूप में एक अधिक उन्नत यातायात व्यवस्था शुरू की जा चुकी है। यह अलग बात है कि सार्वजनिक यातायात व्यवस्था अभी भी आवश्यकता के अनुरूप सुचारु और पर्याप्त नहीं है। क्या यह माने जाने लायक बात है कि यह सब पुलिस और प्रशासन की शह के बिना ही हो रहा है? आखिर ऑटो और टैक्सी वालों में इतना दुस्साहस कहां से आ गया? कैसे वे नियम-कानूनों को धता बताने की हिम्मत कर पा रहे हैं? निश्चित रूप से यह कानून के शासन को मुंह चिढ़ाने जैसा है और इसके लिए सरकार को जिम्मेदार माना ही जाना चाहिए। इतने जबर्दस्त रोष प्रदर्शन के बाद भी शहर में काले शीशे वाली बसें, कारें, टैक्सियां आदि सभी तरह के वाहन चल रहे हैं। कितने चालकों के पास वैध लाइसेंस हैं और कितनों के पास नहीं, इसकी सघन जांच अब भी नहीं हो रही है।


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हमारी यातायात व्यवस्था के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि राष्ट्रीय राजधानी में वर्र्षो तक एक ऐसा व्यक्ति बच्चों की बस चलाता रहा जो न केवल आपराधिक प्रवृत्ति का था, बल्कि चिकित्सीय मानकों के अनुरूप वह बस चलाने के लिए अयोग्य भी था। क्या उस पर एक बार भी हमारी यातायात पुलिस की नजर नहीं पड़ी और पड़ी तो वह कैसे चलता रहा? क्या हमारी यातायात पुलिस इतने दबाव में काम कर रही है कि वह पूरी तरह अयोग्य व्यक्ति को बस चलाने से रोक नहीं सकी? या फिर वह इतनी लापरवाह है कि उसने ऐसी किसी बात पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी? इन दोनों में से एक भी बात नजरअंदाज किए जाने लायक नहीं है। यह न केवल आम जनता, बल्कि व्यवस्था के लिए भी बेहद खतरनाक है। सच तो यह है कि इतनी भयावह घटना के बाद भी पुलिस से लेकर सरकार तक सभी केवल अपने-अपने बचाव में लगे हुए हैं। आम जनता की सुरक्षा और सुविधा पर अभी भी किसी का ध्यान नहीं है। भयमुक्त समाज का नारा सिर्फ चुनावी सभाओं और सरकारी फाइलों तक ही सीमित है। जरूरत इस बात की है कि इसे सरकारी फाइलों से बाहर निकाला जाए और इसका लाभ वास्तव में आम लोगों तक पहुंचाया जाए। असल में तो इसके लिए अलग से किसी कानून की जरूरत भी नहीं है। हमारे पास पहले से जो कानून हैं, वही इन सभी स्थितियों से निपटने के लिए काफी हैं। करना सिर्फ यह है कि उन्हें गंभीरता से लागू कर दिया जाए। इस बात के लिए कड़ाई की जानी चाहिए कि हर जगह कानूनों का अनुपालन किया जाए। जो कोई भी व्यक्ति कानून का उल्लंघन करता हुआ पाया जाए, चाहे वह कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की ही जानी चाहिए और इस मामले में किसी प्रकार के दबाव की परवाह न की जाए। जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा तब तक समाज को भयमुक्त करने के नारे का कोई अर्थ नहीं हो सकेगा।



लेखक निशिकांत ठाकुर दैनिक जागरण में स्थानीय संपादक हैं


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1 प्रतिक्रिया

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chaatak के द्वारा
January 13, 2013

निशिकांत जी, सादर अभिवादन, आपने बड़े ही अच्छे ढंग से प्रश्न भी किये हैं और हमें सोचने पर भी मजबूर किया है कि बलात्कार जैसी घटनाएं सिर्फ आम आदमी के दर्द से नहीं शहीदों की कुर्बानियों से भी खिलवाड़ है| सहमत हूँ कि आज के भारत की तस्वीर अगर शहीदों को दिखा दी जाएँ तो वे एकमत यही फैसला देंगे कि हिन्दुस्तान को आज़ाद कराना उनके द्वारा की गई एक भूल थी इससे अच्छा तो हिन्दुस्तान अंग्रेजों का गुलाम ही रहता कमसे कम हमें अपनों का सम्मान और अपनों का दर्द तो समझ में आता|


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