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शुतुरमुर्ग सरीखी सरकार

Posted On: 26 Dec, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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rajeev jiiiक्या निष्कि्रयता और संवेदनहीनता की इससे बड़ी कोई और मिसाल हो सकती है कि जब दिल्ली के साथ शेष देश आक्रोश से उबल रहा हो तब प्रधानमंत्री को सिर्फ एक ट्वीट करने में तीन दिन लग जाएं? महज एक ट्वीट करने में इतनी देरी से समझा जा सकता है कि सरकार के शीर्ष पर बैठे लोग देश के माहौल से कितने अपरिचित, अनजान और अप्रभावित थे? क्या इस ट्वीट के समय किसी को यह ख्याल नहीं आया कि यह विलंब से उठाया जा रहा बहुत मामूली कदम है? दरअसल यह कोई कदम था ही नहीं। क्या ऐसा कुछ है कि प्रधानमंत्री के ट्वीट को भी कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है? सच जो भी हो, लेकिन प्रधानमंत्री के इस ट्वीट ने एक बार फिर केंद्रीय सत्ता की निष्कि्रयता की मिसाल ही पेश की। प्रधानमंत्री ने यह ट्वीट रविवार की शाम तब किया जब इसी दिन दिल्ली में राजपथ पर यानी उनकी नाक के नीचे जारी उग्र प्रदर्शन हिंसक हो गया और उसके चलते करीब डेढ़ सौ लोग घायल हो गए। यह विचित्र है कि वह शुक्रवार को भी मौन रहे और शनिवार को भी जबकि यह साफ जाहिर हो रहा था कि प्रदर्शनकारी इस वजह से और कुपित हो रहे हैं, क्योंकि सरकार पर उनका भरोसा कायम नहीं हो पा रहा है। आखिरकार सोमवार को प्रधानमंत्री टीवी चैनलों पर अवतरित हुए, लेकिन कोई भी समझ सकता है कि राष्ट्र के नाम उनके संदेश ने आम जनता को प्रभावित नहीं किया। इस संदेश से यही ध्वनित हुआ कि सरकार कुछ ठोस कदम उठाने के बजाय भाषणबाजी में अपना समय जाया कर रही है।


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एक तरह से देखा जाए तो प्रधानमंत्री को देश की जनता को संबोधित करने में एक सप्ताह लग गया, क्योंकि दिल्ली में सामूहिक दुष्कर्म की घटना 16 दिसंबर को हुई थी। इस वहशी-घिनौनी घटना के विरोध में संसद के दोनों सदनों में व्यक्त किए गए आक्रोश से उन्हें यह अहसास हो जाना चाहिए था कि राजधानी में अनर्थ हो गया है और उससे सारा देश उद्वेलित है। केंद्र सरकार पर भरोसा न करने के पर्याप्त और ठोस कारण हैं। वह दिल्ली में दुष्कर्म के मामलों में फास्ट ट्रैक गठित करने जा रही है, लेकिन शेष देश में क्या होगा? इस सवाल का जवाब नदारद है। वैसे तथ्य यह है कि सरकार पैसे की कमी का रोना रोकर फास्ट ट्रैक अदालतें बंद कर चुकी है। इस पर भी गौर करें कि करीब दस वर्ष पहले कानून मंत्रालय ने दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का सुझाव दिया था, लेकिन गृहमंत्रालय ने उसे ठुकरा दिया और उसके बाद किसी ने सुधि नहीं ली। केंद्र सरकार की शिथिलता के चलते महिलाओं को यौन हिंसा से बचाने और इस तरह की हिंसा में लिप्त लोगों को कठोर दंड देने संबंधी कई विधेयक संसद में अटके हुए हैं। दिल्ली की घटना के बावजूद किसी ने इन विधेयकों को पारित करने-कराने की आवश्यकता नहीं महसूस की। इन विधेयकों के अतिरिक्त पुलिस सुधार संबंधी सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश भी 2006 से लंबित हैं।


एक-दो राज्यों को छोड़कर कोई भी राज्य इन दिशा निर्देशों पर अमल करने के लिए तैयार नहीं। और तो और खुद केंद्रीय सत्ता भी इन निर्देशों के अनुरूप व्यवस्था बनाने की इच्छुक नहीं। आखिर जब पुलिस सुधार और न्यायिक सुधार सरकार के एजेंडे से बाहर हों तो फिर जनता यह कैसे मान ले कि सत्ता में बैठे लोग उसकी सुरक्षा और उसे न्याय दिलाने के प्रति तनिक भी संवेदनशील हैं? दिल्ली में उग्र आंदोलन से सहमी सरकार ने यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनों की समीक्षा करने के लिए एक समिति के गठन की घोषणा की है। इसका मतलब है कि अभी सरकार को यह समझ नहीं आया कि किसी बड़ी घटना के बाद समिति और आयोग गठित करने के घिसे-पिटे तौर-तरीके अब काम आने वाले नहीं हैं। आखिर समितियों और आयोगों के जरिये कब तक आम जनता को बहकाया जाता रहेगा? देश अच्छी तरह जानता है कि पुलिस के काम-काज में सुधार के लिए आजादी के बाद से अब तक आधा दर्जन आयोग बन चुके हैं और उन सबकी रपटें धूल खा रही हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए है, क्योंकि हमारे नेतागण पुलिस का इस्तेमाल अपने हिसाब से करते रहना चाहते हैं। पिछले वर्षो में वीआइपी सुरक्षा जितनी सघन हुई है, आम आदमी की सुरक्षा उतनी ही विरल।


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केंद्रीय गृहमंत्री ने 4 जनवरी को राज्यों के पुलिस प्रमुखों और मुख्य सचिवों की बैठक भी बुला ली है। इससे शायद ही कुछ हासिल हो, क्योंकि अब तक का अनुभव यही बताता है कि ऐसी बैठकों से कुछ हाथ नहीं आता। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली की सड़कों पर उतरे तमाम युवा अपनी बात सही तरह से नहीं कह पा रहे हैं। वे गुस्से में हैं इसलिए वे दुष्कर्मियों को फांसी पर चढ़ाने, तुरंत फांसी देने, चौराहे पर लटका देने और खुद को सौंप देने जैसी मांग कर रहे हैं। इस तरह की मांगें उनके क्षोभ का नतीजा हैं, लेकिन इन मांगों के आधार पर उनके आक्रोश को खारिज नहीं किया जा सकता। उनकी भावनाओं को सही तरह से समझने और उन्हें शांत करने की आवश्यकता है। दरअसल वे यह कहना चाहते हैं कि कृपा करके कुछ ऐसा कीजिए जिससे उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी सुरक्षा की चिंता वास्तव में की जा रही है। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे सक्रिय अवश्य हैं, लेकिन उनकी घोषणाएं और उनके कथित ठोस कदम केंद्रीय सत्ता की शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति को ही रेखांकित करते हैं। कभी वह दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर अफसोस जताते हैं, कभी उसकी सख्ती की जांच कराने की बात कहते हैं और कभी उसके रवैये की सराहना करते हैं। वह युवाओं के आंदोलन में राजनीति भी देखने लगते हैं। यह बिलकुल शुतुरमुर्गी आचरण है। शुतुरमुर्ग जिस तरह संकट के समय इधर-उधर भागने के बाद अपना सिर छिपा लेता है, कुछ वैसा ही केंद्र सरकार भी कर रही है।



लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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Tag: प्रधानमंत्री, पुलिस,rape ,दिल्ली,delhi,राज्य,state



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