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गलत दिशा में राजनीति

Posted On: 26 Nov, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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sanyay jiiiiiiमुंबई हमले में पकड़े गए आतंकी अजमल आमिर कसाब को अप्रत्याशित तरीके से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने के ठीक एक दिन पहले फांसी पर लटकाने के केंद्र सरकार के फैसले ने देश की राजनीति को एक नई दिशा में मोड़ दिया है। इस एक फैसले ने पिछले साल-डेढ़ साल से बुरी तरह घिरी संप्रग सरकार को एक नई धार सी दे दी है। वैसे तो न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद कसाब को फांसी पर लटकाने के फैसले पर अमल महज एक औपचारिकता भर था, लेकिन उसे पुणे की यरवदा जेल में फांसी देने का समाचार जैसे ही सार्वजनिक हुआ वैसे ही देश ने सुखद आश्चर्य महसूस किया। भाजपा फांसी की सजा पाए आतंकियों को दंडित करने में हो रही देरी को राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए थी, लेकिन जब कसाब को फांसी दे दी गई तो उसने अन्य आतंकियों, विशेषकर संसद पर हमले के दोषी अफजल का मुद्दा उठाकर केंद्र को घेरने की कोशिश की। अफजल का जो भी हो, कसाब की सजा पर अमल करने वाली केंद्र सरकार फिलहाल अपने राजनीतिक विरोधियों के सामने नई ऊर्जा से भरी नजर आ रही है।


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राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर में आया बदलाव इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि भ्रष्टाचार के मसले पर एक समय केंद्र सरकार से जवाब देते नहीं बन रहा था। जब अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में उतरते ही घोटालों के खुलासे की शुरुआत की तो यह माना जा रहा था कि उनके निशाने पर कांग्रेसी ही होंगे, लेकिन जैसे ही उन्होंने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की कथित व्यावसायिक गड़बडि़यों को उजागर किया वैसे ही कांग्रेस को भाजपा पर पलटवार करने का मौका मिल गया। गडकरी का मामला भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गया है। एक तो उसके भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की हवा निकल गई है और दूसरे, खुद उसके अंदर की कलह बाहर आ गई है। गडकरी से त्यागपत्र मांगने वाले भाजपा नेताओं की संख्या बढ़ती जा रही है। सबसे दिलचस्प यह है कि पार्टी के भीतर एक-दूसरे के भ्रष्टाचार को उजागर करने की होड़ सी दिख रही है। गडकरी को पाक-साफ सिद्ध होने तक पद से हटने की सलाह देने वाले यशवंत सिन्हा का मामला इसका उदाहरण है। भाजपा की कोशिश केंद्र सरकार को नए सिरे से दबाव में लेने की है, लेकिन सत्तापक्ष भी अपने नए-नए पैंतरों से विपक्ष के दबाव का सामना करने को तैयार है। कैग के एक पूर्व अधिकारी आरपी सिंह के दावों ने कांग्रेस को एक मौका दे दिया है।


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आरपी सिंह की मानें तो 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये की राजस्व हानि के कैग के आकलन से वह सहमत नहीं थे और उनसे अंतिम रपट में दबाव डालकर हस्ताक्षर कराए गए। कांग्रेस इसलिए आरपी सिंह के दावों को महत्व दे रही है, क्योंकि रद्द किए गए 2जी स्पेक्ट्रम की पिछले दिनों हुई नीलामी में उम्मीद से बहुत कम राशि प्राप्त हुई। इससे कांग्रेस को यह कहने का अवसर मिला कि राजस्व हानि का कैग का आकलन सिरे से गलत था। कांग्रेस का यह कहना एक हद तक सही भी है कि 1.76 लाख करोड़ रुपये के राजस्व हानि की बात अतिशयोक्ति थी। इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का नया सिलसिला कायम हो गया है। विचित्र यह है कि दोनों ही पक्ष इस बुनियादी बात पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया पर सवाल इसलिए उठे, क्योंकि स्पेक्ट्रम आवंटन मनमाने तरीके से किया गया। यही कारण रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम के सभी लाइसेंस रद्द कर दिए। स्पेक्ट्रम आवंटन पर राजस्व हानि संबंधी कैग के आकलन के गलत होने का यह मतलब नहीं कि ए. राजा ने कोई घोटाला नहीं किया।


सरकार और विपक्ष के लिए उचित यही होगा कि गड़े मुर्दे उखाड़ने के बजाय ऐसी कोई पहल की जाए जिससे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की प्रक्रिया में गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे। सरकार को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे वह संवैधानिक संस्था कैग पर हमला करती दिखे। संसद के शीतकालीन सत्र में भाजपा के पास सरकार को घेरने के अनेक अवसर हैं, लेकिन वह अपना सारा ध्यान खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश पर लगाए हुए है। एफडीआइ का मामला इसलिए और विवाद का विषय बन गया है, क्योंकि सरकार ने पहले यह कहा था कि वह आम सहमति के बाद ही कोई फैसला लेगी, लेकिन उसने अचानक फैसला ले लिया। हालांकि भाजपा समेत करीब-करीब सभी विपक्षी दल रिटेल एफडीआइ के खिलाफ हैं, लेकिन रिटेल कारोबार में विदेशी कंपनियों को अनुमति देने से तत्काल छोटे कारोबारियों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। भाजपा का जोर इस मसले पर सदन में वोटिंग वाले नियम पर बहस कराने पर है। सपा और बसपा अपने-अपने मुद्दों के बहाने संसद नहीं चलने दे रही हैं। पता नहीं क्यों विपक्षी दलों को यह लगता है कि संसद न चलने से वे आम जनता को यह संदेश देने में सफल हैं कि केंद्र सरकार बहुत कमजोर है? पिछले कई सत्रों से संसद के सुचारु रूप से न चल पाने की एक बड़ी वजह यह है कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच संवाद टूट गया है। अभी तक संसद के न चलने का राजनीतिक लाभ विपक्ष को मिल रहा था, लेकिन अब जब सरकार मजबूती से खड़ी नजर आ रही है तब विपक्ष अपनी कमजोरी छिपाने के लिए संसद में शोरशराबा कर रहा है।


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भाजपा की कोशिश आम जनता को यह दिखाने की है कि सरकार मनमानी कर रही है और उसे एफडीआइ जैसे मुद्दे पर संसद का समर्थन नहीं हासिल है। यह आवश्यक नहीं है कि विपक्षी दल सरकार के हर फैसले का समर्थन करें, लेकिन एफडीआइ के मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सत्ता में रहते समय भाजपा भी इसकी पक्षधर थी। चूंकि रिटेल कारोबार में विदेशी निवेश आने भर से देश के आर्थिक परिदृश्य में कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं आने वाला इसलिए पक्ष-विपक्ष के लिए यह आवश्यक है कि वे अन्य आर्थिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करें। देश की जनता, विशेषकर निर्धन वर्ग की इसमें कोई रुचि नहीं कि रिटेल एफडीआइ पर किस नियम के तहत चर्चा होती है? जो लोग रिटेल एफडीआइ से प्रभावित हो सकते हैं वे तो बस यह जानना चाहते हैं कि सरकार उनके हितों की रक्षा किस तरह करेगी? विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा को संसद में उस भूमिका का निर्वाह करना चाहिए जिसकी वह हमेशा दुहाई देती रही है। सत्तापक्ष को भी चाहिए कि वह जनता को प्रभावित करने वाले फैसले राजनीतिक सहमति से ही ले। सरकार और विपक्ष के बीच अहं की जो लड़ाई चल रही है वह किसी के हित में नहीं। राजनीतिक दलों को समझना होगा कि देश के सामने जो चुनौतियां हैं उन पर संसद में जब तक गहन चर्चा नहीं होगी तब तक समाधान के रास्ते नहीं निकलेंगे। अगर राजनीतिक दल यह सोच रहे हैं कि उनके आचरण से आम जनता को उनकी शक्ति का अहसास हो रहा है तो यह सही नहीं।



इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं



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