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चुनाव और आर्थिक चुनौतियां

Posted On: 12 Nov, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Sanjay Guptपहले एफडीआइ के पक्ष में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली और फिर सूरजकुंड में संवाद बैठक में कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जो कुछ कहा गया उससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि पार्टी महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्षी दलों द्वारा बनाए जा रहे दबाव का आक्रामक ढंग से सामना करने के लिए तैयार हो रही है। इसका यह भी मतलब है कि कांग्रेस की ओर से न केवल उन फैसलों को सही ठहराया जाएगा जिन्हें विपक्षी दल महंगाई बढ़ाने वाले बता रहे हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर भविष्य में लिए जाने वाले कुछ और कठोर फैसलों के लिए भी आम जनता को तैयार करने की कोशिश की जाएगी। यह सब आसान नहीं होगा, क्योंकि तमाम कांग्रेसी नेता सरकार पर लोक लुभावन नीतियां अपनाने का दबाव डाल रहे हैं।संवाद बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जिस तरह मंत्रियों और पार्टी नेताओं को यह नसीहत दी कि वे आपस में समन्वय बेहतर करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं की भी सुनें और सरकार की नीतियों को लेकर उपजे भ्रम को समाप्त करें उससे एक तरह से इस धारणा पर मुहर ही लगती है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता आम जनता से कट गई है और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के साथ-साथ महंगाई का मुद्दा भी कांग्रेस नेतृत्व की चिंता का कारण बन रहा है।


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यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि पिछले कई माह से एक के बाद एक सामने आए भ्रष्टाचार के मामलों और विशेष रूप से इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़े अरविंद केजरीवाल के खुलासों ने कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं और नेताओं को हताश कर दिया है। कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि केजरीवाल ने रहस्योद्घाटनों की अपनी श्रृंखला में भाजपा प्रमुख नितिन गडकरी को भी अपने निशाने पर लिया है। चूंकि गडकरी के मसले पर मुख्य विपक्षी दल भाजपा दबाव में है इसलिए कांग्रेस कुछ लाभ उठा सकती है। संवाद बैठक में सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को इन खुलासों से चिंतित नहीं होना चाहिए, बल्कि आम जनता के बीच इसका प्रचार करना चाहिए कि यह सब उस सूचना अधिकार कानून की देन है जिसे संप्रग सरकार ने लागू किया था। निश्चित रूप से संप्रग सरकार को इसका श्रेय मिलना चाहिए कि उसने सूचना अधिकार कानून लागू किया, जिससे न केवल शासन के कामकाज में पारदर्शिता का स्तर कुछ बेहतर हुआ है, बल्कि अधिकारियों के साथ-साथ मंत्रियों के भ्रष्टाचार के मामले भी उजागर हुए हैं, लेकिन केवल इस आधार पर उन घपलों-घोटालों की अनदेखी नहीं की जा सकती जो पिछले तीन साल में सामने आए हैं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले दिनों इस कानून के कुछ प्रावधानों को हल्का बनाने के विचार भी व्यक्त किए गए। यह स्वागतयोग्य है कि इस कानून के साथ छेड़छाड़ न करने का फैसला किया गया और इसके लिए सोनिया और राहुल के साथ-साथ प्रधानमंत्री को भी श्रेय देना होगा कि वे इस मामले में दबाव के आगे झुके नहीं। जहां तक सरकार और पार्टी में समन्वय का प्रश्न है तो इसकी उम्मीद ही की जा सकती है कि इस मामले में सोनिया गांधी की नसीहत के बाद स्थिति बेहतर होगी। अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और पार्टी की चुनावी चिंताओं को देखते हुए यह काम कठिन नजर आने लगा है।


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पिछले दिनों स्वयं प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने बढ़ते राजकोषीय घाटे पर चिंता जताई थी। इस स्थिति में सरकार के लिए लोकलुभावनी घोषणाओं की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है। यह विचित्र है कि जब सोनिया गांधी पार्टी और सरकार के बीच और अधिक समन्वय पर जोर दे रही थीं तब रक्षा मंत्री एके एंटनी आम आदमी और विशेष रूप से मध्यम वर्ग के हितों के नाम पर सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे थे। सूरजकुंड बैठक में सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडरों की संख्या सीमित करने के फैसले के विरोध में कई आवाजें उठीं। संभवत: सोनिया गांधी यह समझ रही हैं कि यदि इस मामले में सरकार कांग्रेस नेताओं के दबाव के आगे झुकती है तो इससे आर्थिक नीतियों का विरोधाभास ही उजागर होगा। सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या छह हो या नौ, इससे राजकोषीय घाटे पर बहुत असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यदि सरकार अपने फैसले से पीछे हटती है तो आम जनता के बीच यही संदेश जाएगा कि पार्टी सरकार पर हावी है। यह सही है कि पिछले तीन सालों से महंगाई ने आम आदमी को त्रस्त कर रखा है और सरकार अपनी नीतियों से इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है, लेकिन यह तो सरकार को ही आम जनता को समझाना होगा कि बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा परोक्ष रूप से उसकी ही जेब काट रहा है। अधिक ब्याज दरों के कारण आम उपयोग की सभी वस्तुएं महंगी हो गई हैं। ऊंची ब्याज दरों के कारण औद्योगिक उत्पादन घट रहा है और इसके चलते वस्तुओं की लागत बढ़ रही है। इस स्थिति में प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की राजकोषीय घाटे के संदर्भ में चिंता जायज नजर आती है। उचित यह होगा कि कांग्रेस इस मामले में सरकार का समर्थन करती नजर आए। अगर पार्टी महंगाई से लोगों को राहत देने के नाम पर सरकार पर अनुचित दबाव बनाएगी तो न केवल अर्थव्यवस्था की चुनौतियां बढ़ेंगी, बल्कि कुल मिलाकर इसके दुष्प्रभाव आम आदमी को ही भोगने होंगे। कांग्रेस को इसकी भी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां आर्थिक माहौल को देखते हुए भारत की रेटिंग गिराने में लगी हुई हैं।


अगर राजकोषीय घाटा काबू में नहीं आया तो कोई आश्चर्य नहीं कि अगले साल-डेढ़ साल में भारत भी आर्थिक संकट का सामना कर रहे यूरोपीय देशों की पंक्ति में खड़ा नजर आए। आज अगर देश में राजकोषीय घाटा बेकाबू नजर आ रहा है तो इसके लिए कांग्रेस की लोकलुभावनी नीतियां भी जिम्मेदार हैं। पिछले दो सालों में कांग्रेस के दबाव के कारण ही केंद्र सरकार ऐसे कदम नहीं उठा सकी जो राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण के लिए जरूरी थे। ऐसे में संवाद बैठक में पार्टी और सरकार के बीच समन्वय की बातें थोड़ी अटपटी लगती हैं। आदर्श रूप से भले ही कांग्रेस अध्यक्ष की नसीहत उचित प्रतीत होती हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से ऐसा हो पाने के आसार कम ही हैं। यह स्पष्ट है कि कांग्रेस की निगाह अगले आम चुनाव पर है। इसमें कोई हर्ज नहीं कि कांग्रेस एक बार फिर केंद्र की सत्ता में आने की तैयारी करे, लेकिन वह अर्थव्यवस्था की चुनौतियों की अनदेखी नहीं कर सकती। देखना यह है कि संवाद बैठक के बाद आयोजित होने वाली चिंतन बैठक में क्या होता है? क्या केंद्र सरकार और कांग्रेस की रीति-नीति में कुछ बुनियादी बदलाव नजर आता है? अगर कांग्रेस सरकार पर लोकलुभावन योजनाओं का दबाव बनाना जारी रखती है तो न केवल सोनिया गांधी की नसीहत खोखली सिद्ध होगी, बल्कि पार्टी चुनावी हित के लिए सरकार का इस्तेमाल करती हुई भी नजर आएगी।

लेखक- संजय गुप्त


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