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सरपंचों के इस्‍तीफे का अर्थ

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Nishikant Thakurकश्मीर में सक्रिय आतंकवादी हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को सीधे चुनौती दे रहे हैं। आतंक और अराजकता का यह कारनामा लंबे अरसे से चल रहा है। दुखद यह है कि अब कुछ लोग इससे प्रभावित भी होने लग गए हैं और यह अत्यंत चिंताजनक इसलिए है कि प्रभावित वे लोग हुए हैं जो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में गहरी आस्था रखते हैं। आतंकियों के फरमानों की फिक्र न करते हुए चुनाव लड़कर सरपंच बने लोग अब उनकी धमकियों से डर कर इस्तीफे दे रहे हैं। इधर कुछ ही दिनों में 800 से ज्यादा पंच-सरपंच अपने पद छोड़ने के ऐलान कर चुके हैं। राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस मामले का गंभीरता से संज्ञान लिया है। उन्होंने आतंकवादियों को कायर बताया और उन्हें चुनौती दी है कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे मुझ पर हमला करें।


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आतंकवाद से प्रभावित जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में एक मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह का बयान दिया जाना अर्थ रखता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आतंकवादियों का पूरा रवैया और तौर-तरीका कायरों जैसा ही है, लेकिन स्वयं अपने ऊपर हमले की चुनौती देने जैसी बात इस राज्य में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने की है। राज्य के लोकतांत्रिक संस्थानों और संगठनों को डराने-धमकाने और उन्हें क्षति पहुंचाने की साजिश आतंकवादी कोई पहली बार नहीं कर रहे हैं। उन्हें जब जैसे भी मौका मिलता है, वे हमेशा यही साजिश करते हैं कि किसी भी तरह से यहां लोकतांत्रिक संस्थानों को क्षति पहुंचाई जा सके। इतना ही नहीं, उनकी साजिश यह भी होती है कि लोकतंत्र से आम जनता का भरोसा भी उठाया जा सके। जब वे यह नहीं कर पाते तो न केवल ओछी, बल्कि बेहद घिनौनी हरकतों पर उतर आते हैं। चुनाव के पहले से ही वे धमकियां देना शुरू करते हैं।


उनकी साजिश हमेशा यही होती है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं शुरू ही न होने पाएं। वे प्रत्याशियों से लेकर लोगों को धमकियां देते हैं और सभी पर चुनाव का बहिष्कार करने के लिए दबाव बनाते हैं। इसके बावजूद लोग भारी संख्या में चुनाव की पूरी प्रक्रिया में हिस्सेदारी करते हैं और अपनी जान पर खेल कर लोकतंत्र में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। यह तमाचा पिछली बार भी विधानसभा से लेकर पंचायत चुनावों तक में आतंकवादियों के मुंह पर लगा था। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद वे अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाते हैं। यह बात सभी जानते हैं कि कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की जड़ में ही पाकिस्तान की हार है। जब वे दोनों ही मोर्चो यानी तर्क और आमने-सामने की लड़ाई में हर तरह से हार गए तो उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वे छिप कर वार करते। आम तौर पर कायरों का यही तरीका हर जगह और हमेशा होता है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर यह जो कायराना हमला हो रहा है, उसके मूल में भी यही बात है। असल में जब आतंकी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहे कि भारतीय लोकतंत्र में कश्मीर की जनता की आस्था नहीं है तो उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं बचा कि वे उसे धमकियां देकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर करें। उनकी धमकियों के बावजूद लोगों ने बहुत बड़ी संख्या में न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी की, बल्कि सक्रिय भूमिका भी निभाई।


उनके लिए यह एक शर्मनाक स्थिति थी। अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक न तो वे सामने आकर लड़ सकते थे और न ही चुप बैठे रह सकते थे। उन्हें अपनी इस शर्मनाक खिसियाहट का बदला तो लेना ही था और इसी के तहत उन्होंने सरपंचों को धमकियां देनी शुरू कीं। धमकियों का भी जब सरपंचों पर असर नहीं हुआ तो उन्होंने दूर-दराज के गांवों में उन्होंने निजी तौर पर धमकाने की कोशिशें शुरू कीं। ऐसी जगहों पर जहां आसानी से पुलिस-प्रशासन की पहुंच थोड़े समय की सूचना पर नहीं हो सकती है, वहां वे छिप-छिपा कर घिनौनी वारदातों को अंजाम देने में अकसर सफल हो जाते हैं। इसे ही वे अपनी बहुत बड़ी सफलता मानते हैं। जाहिर है, जो लोग सामाजिक-राजनीतिक दायित्वों से बंधे हैं और उन क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियां बढ़-चढ़ कर निभा रहे हैं, वे अपने पारिवारिक दायित्वों से भी बंधे हुए हैं और उससे मुंह मोड़ नहीं सकते हैं। आतंकवादियों की धमकियों और उनकी ओछी कारगुजारियों से वे प्रभावित हुए और उन्होंने दबाव में आकर इस्तीफे देने शुरू कर दिए। फिर जल्द ही इसकी लहर सी चल पड़ी और एक-एक करके कई सरपंचों ने इस्तीफे दे डाले। अब तो इनकी संख्या 800 तक पहुंच चुकी है, जो कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत गंभीर बात है। शासन और प्रशासन को इन बातों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। असल में आतंकवादी इस तरह वे यह साबित करने की साजिश में लगे हुए हैं, जो सच नहीं है। वे संभवत: यह साबित करना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में कश्मीर की जनता की आस्था नहीं है।


जबकि सच्चाई यह है कि लोकतंत्र में पूरे भारत की जनता की गहरी आस्था है और कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है। कश्मीर के लोगों की भी भारतीय लोकतंत्र में उतनी ही गहरी आस्था है, जितनी कि देश के अन्य प्रांतों के लोगों की। आतंकवादी और उनके आका भी यह जानते हैं कि जो सच नहीं है, उसे साबित करने के लिए चाहे कितनी भी साजिशें क्यों न कर ली जाएं, उसे कभी साबित नहीं किया जा सकता। आम कश्मीरियों ने यह बात सैकड़ों बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी सक्रिय साझेदारी से साबित कर दी है। इसके लिए उन्हें किसी अन्य देश के इशारों पर अपघात करने वाले कायर आतंकवादियों से किसी सनद की आवश्यकता नहीं है। इसके बावजूद वे यह सब करके अपनी साजिश में किसी हद तक सफल होते दिख रहे हैं। भले यह केवल भ्रम हो, लेकिन सरकार की यह जिम्मेदारी है कि इस भ्रम को और अधिक फैलने से तुरंत रोके। आम जनता के मन में यह बात पैठने से रोके कि वे आतंकवादियों के सामने मजबूर हैं। सच तो यह है कि अगर सरकार एक बार मन बना ले तो आतंकवादियों में यह दम नहीं है कि वे कश्मीर या पूरे देश में कहीं भी ठहर पाने की बात सोच सकें। उमर अब्दुल्ला को यह चाहिए कि जो चुनौती उन्होंने अपने संदर्भ में आतंकवादियों को दी है, अपने राज्य के हर सरपंच को इतना सुरक्षित महसूस कराएं कि वह ऐसी ही चुनौती दे सके।


वह हथियारों के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर न हो, बल्कि हथियारों के दम पर देश तोड़ने की साजिश में लगे अराजक तत्वों को जनमत के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर सके। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसके लिए सरकार को अपना ढुलमुल रवैया छोड़कर सख्त रवैया अपनाना होगा।


लेखक निशिकांत ठाकुर  दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं


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