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सरकार के लिए मुश्किल घड़ी

Posted On: 24 Jul, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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तृणमूल कांग्रेस के बाद राकांपा की नाराजगी के चलते केंद्र सरकार के लिए हालात मुश्किल होते देख रहे हैं संजय गुप्त


राष्ट्रपति चुनाव में आखिरकार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अपने साथ लाकर कांग्रेस संप्रग को एकजुट प्रदर्शित करने में अवश्य सफल रही, लेकिन प्रधानमंत्री के बाद नंबर दो के मुद्दे पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार की नाराजगी की खबरों ने इस एकजुटता पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं। नाराजगी के चलते पवार और राकांपा के एक अन्य केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल कैबिनेट की दो बैठकों में शामिल नहीं हुए। माना जा रहा है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए पवार और पटेल त्यागपत्र देने और सरकार से बाहर होने को तैयार हैं। प्रफुल्ल पटेल की मानें तो नाराजगी की वजह नंबर दो की भूमिका नहीं, बल्कि सरकार और संप्रग के कामकाज से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण पहलू हैं। राकांपा की यह नाराजगी केंद्र सरकार के प्रबंधकों के लिए एक नया सिरदर्द है, जो पहले ही कभी तृणमूल कांग्रेस और कभी द्रमुक के दबाव का सामना करते रहे हैं। सच्चाई यह है कि कांग्रेस की कमजोरी के कारण संप्रग के लगभग सभी घटक दल उससे सौदेबाजी करने में लगे हैं। प्रणब मुखर्जी की सरकार से विदाई के बाद कांग्रेस ने रक्षा मंत्री एके एंटनी को प्रधानमंत्री के बाद नंबर दो के दर्जे पर रखा, जबकि पवार को लगता है कि राजनीतिक अनुभव की दृष्टि से उन्हें यह भूमिका मिलनी चाहिए। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि संप्रग में शामिल क्षेत्रीय दल अपने जनाधार वाले राज्यों के राजनीतिक समीकरणों के आधार पर कांग्रेस पर दबाव बनाने में लगे हैं। गठबंधन राजनीति का यह दौर क्षेत्रीय दलों के मोल-तोल के कारण राजनीति ही नहीं, देश पर भारी पड़ रहा है। राकांपा ने अपनी नाराजगी के बहाने जिस तरह सरकार के कामकाज का मुद्दा उठाया और तेजी से फैसले लेने की मांग की उससे कांग्रेस और केंद्र सरकार की नेतृत्व क्षमता पर ही सवालिया निशान लग गया है।


संप्रग के पहले कार्यकाल में यह व्यवस्था की गई थी कि प्रधानमंत्री सरकार के कामकाज पर निगाह रखेंगे और सोनिया गांधी गठबंधन की एकजुटता का ध्यान रखेंगी, लेकिन यह प्रयोग दूसरे कार्यकाल में पूरी तरह लड़खड़ा गया है। न तो प्रधानमंत्री सरकार के कामकाज की सही तरह निगरानी कर पा रहे हैं और न ही सोनिया गांधी गठबंधन एकजुट रख पा रही हैं। जब पिछले आम चुनाव में संप्रग पहले की तुलना में अधिक ताकतवर होकर उभरा तो यह अपेक्षा की गई थी कि प्रधानमंत्री उन आर्थिक सुधारों को गति देंगे जो वामपंथी दलों की अड़ंगेबाजी के कारण ठंडे बस्ते में चले गए थे, लेकिन गठबंधन राजनीति की विसंगतियों और भ्रष्टाचार ने प्रधानमंत्री को अपने ही खोल में सिमट जाने के लिए मजबूर कर दिया। रही-सही कसर राहुल गांधी को सरकार में मुख्य भूमिका में लाने की मांगों ने पूरी कर दी। राहुल गांधी के पक्ष में कांग्रेस और सरकार में जिस तरह आवाजें तेज होती जा रही हैं उससे प्रधानमंत्री के कामकाज पर असर पड़ना स्वाभाविक है। आखिर कोई प्रधानमंत्री तब प्रभावशाली ढंग से कैसे काम कर सकता है जब उसके संदर्भ में यह मान्यता बना दी गई हो कि उसे एक न एक दिन कुर्सी छोड़नी है और वह भी एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो गांधी परिवार से जुड़ा होने के कारण इस पद के सर्वथा योग्य माना जा रहा है। चूंकि मनमोहन सिंह इस धारणा के चलते धीरे-धीरे हाशिये पर जाते रहे इसलिए प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कद बढ़ता गया, लेकिन कांग्रेस आलाकमान उन्हें प्रधानमंत्री पद नहीं देना चाहता था।


प्रणब मुखर्जी ने भी संभवत: यह महसूस किया कि राष्ट्रपति भवन पहुंचकर वह राजनीति के दैनिक पचड़ों से मुक्त हो सकते हैं। प्रणब की विदाई के बाद एक बार यह लगा कि मनमोहन सिंह अब अपनी पुरानी क्षमताओं के अनुसार काम करेंगे, लेकिन पिछले कुछ समय में एक के बाद एक दो अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों ने जिस तरह उनकी क्षमता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा किया उससे यह बहस नए सिरे से शुरू हो गई है कि क्या वह वाकई आने वाले समय में अपनी सरकार का उद्धार कर पाएंगे? इसके पहले कि प्रधानमंत्री आर्थिक और प्रशासनिक मुद्दों पर अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करते, सरकार और पार्टी में बड़ी भूमिका निभाने की मांग स्वीकार कर राहुल गांधी ने एक बार फिर से प्रधानमंत्री को हाशिये पर बने रहने को विवश कर दिया है। अब यह साफ नजर आ रहा है कि कांग्रेस के साथ-साथ संप्रग के नेताओं को इस समय प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर विश्वास नहीं रह गया है और इसीलिए उनका राहुल राग जारी है। वैसे प्रधानमंत्री की कार्यक्षमता पर जो सवाल उठे हैं उस पर सभी सहमत नहीं। प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने इस पर आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि हमें 1991 के आर्थिक सुधार कार्यक्रमों पर सवाल नहीं उठाने चाहिए। उनकी मान्यता है कि प्रधानमंत्री में देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की पूरी क्षमता है और उन्होंने शानदार व्यक्तिगत ईमादारी तथा गरिमा के साथ देश को नेतृत्व दिया है। उनके अनुसार इस महत्वपूर्ण समय में मनमोहन सिंह को लोगों का समर्थन मिलना चाहिए। रतन टाटा एक हद तक सही हैं, लेकिन कोई भी प्रधानमंत्री राजनीतिक समर्थन के बिना चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता। सरकार के कामकाज पर उठ रहे सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन यदि संप्रग में दरारें नजर आ रही हैं तो इसके लिए प्रधानमंत्री को दोष नहीं दिया जा सकता।


तृणमूल कांग्रेस अथवा राकांपा या फिर द्रमुक की ब्लैकमेलिंग वाली राजनीति के पीछे संकीर्ण राजनीतिक हितों को पूरा करने की चाहत तो है ही, संप्रग के राजनीतिक प्रबंधकों की कमजोरी भी है। समन्वय के अभाव का आलम यह है कि विभिन्न मंत्रालय अलग-अलग राह पर चल रहे हैं। जो मंत्रालय कांग्रेस के सहयोगी दलों के पास हैं उन पर प्रधानमंत्री का कोई जोर नहीं चल पा रहा है। कुल मिलाकर यह स्पष्ट नजर आ रहा है कि संप्रग और अधिक बिखराव की ओर अग्रसर है। यह महत्वपूर्ण है कि राहुल गांधी ने इस स्थिति में सरकार में बड़ी भूमिका लेना स्वीकार किया है। कांग्रेस के लोगों के लिए यह उत्साहजनक घटनाक्रम है, लेकिन खुद राहुल गांधी के लिए शायद सरकार में इस समय कोई बड़ा राजनीतिक पद ग्रहण करना उपयुक्त नहीं होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि आने वाले आम चुनाव में किसी राजनीतिक चमत्कार से अथवा विपक्ष के अत्यंत कमजोर होने से ही संप्रग को तीसरी बार सरकार गठित करने का मौका मिल सकता है। अभी तक माना यह जा रहा था कि राहुल शायद ही एक डूबती नैया के नाविक बनना पसंद करें, लेकिन अब वह आगे आने को तैयार हैं। इससे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका को लेकर कुछ सवाल उभरना स्वाभाविक हैं। संप्रग के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि जहां एक तरफ गठबंधन दलों के दबाव के चलते उसकी एकजुटता खतरे में पड़ गई है वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के दायित्व और गांधी परिवार की नेतृत्व क्षमता में समन्वय कायम न रहने के आसार उत्पन्न हो गए हैं। यदि राहुल कांग्रेस के साथ सरकार को गति देने के लिए तैयार हो रहे हैं तो फिर इस बारे में सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता कि वे प्रधानमंत्री के नजरिये के साथ ही आगे बढ़ेंगे अथवा उसे प्राथमिकता प्रदान करेंगे।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Chandra Bhan Singh के द्वारा
August 23, 2012

भ्रस्तचार के खिलाफ अधिक से अधिक ब्लॉग लिखना चाहिए जिससे अधिक लोग प्रभावित हों जो भ्रस्ताचार को रोकने में मदद करे ।


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