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एक तमाशा जांच का

Posted On: 10 Jul, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Rajeev Sachanदीन-दुनिया से बेखबर शख्स ही ऐसा होगा जिसे यह पता न हो कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व केंद्रीय मंत्री जार्ज फर्र्नाडीस की सेहत इसकी इजाजत नहीं देती कि वे चलना-फिरना तो दूर रहा, अपने मित्रों-परिचितों से मेल-मुलाकात भी कर सकें। ये दोनों नेता बीमार ही नहीं हैं, बल्कि उनकी स्मरणशक्ति भी उनका साथ नहीं दे रही है। उन्हें अपने निकटस्थ लोगों को पहचानने में भी परेशानी होती है। आमतौर पर सभी राजनेता और विशेष रूप से दिल्ली में प्रवास करने वाले इससे परिचित हैं, लेकिन बावजूद इसके 2जी घोटाले की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की ओर से एक ऐसी सूची बाहर आती है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नाडीस का भी नाम होता है। इस सूची का विरोध होता है और कथित तौर पर उसे वापस ले लिया जाता है। यह घटनाक्रम 3 जुलाई का है। अब 10 जुलाई को उक्त सूची के नामों का निर्धारण होगा। यदि वास्तव में ऐसा होता है तो यह पता चलेगा कि संयुक्त संसदीय समिति अपनी जांच पूरी करने के क्रम में किन नेताओं से पूछताछ करने वाली है। इस सूची में चाहे जिनके नाम हों, यह समझना कठिन है कि कथित तौर पर वापस ली गई सूची में अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नाडीस के नाम क्यों दर्ज किए गए? क्या संवेदनहीनता और गैर-जिम्मेदारी का इससे बड़ा प्रमाण और कोई हो सकता है कि पूछताछ करने वालों की सूची में उनके भी नाम शामिल कर लिए जाएं जिनसे चाह कर भी पूछताछ संभव नहीं है? यह गनीमत रही कि किसी ने गवाहों की सूची में अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नाडीस के नाम शामिल किए जाने का विरोध किया और इसके चलते सूची ही वापस ले ली गई, लेकिन क्या यदि विरोध नहीं किया जाता तो ये दोनों नाम शामिल बने रहते और उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया भी जाता? इस सवाल का जवाब वही लोग दे सकते हैं जिन्होंने इसके लिए जोर दिया होगा।


चूंकि यह सूची वापस हो चुकी है इसलिए शायद ही यह पता चल सके कि संसदीय समिति के वे कौन लोग थे जो यह चाह रहे थे कि अटल और जार्ज से 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में उनकी कथित भूमिका के लिए पूछताछ की जाए, लेकिन इतना तो जाहिर हो ही जाता है कि इस समिति में कुछ लोग हैं जिनकी इसमें तनिक भी दिलचस्पी नहीं कि 2जी घोटाले की सच्चाई सामने आए। अपने ऐसे कुछ लोगों और उनके कारण गवाहों की ऐसी सूची तैयार होने से संसदीय समिति की निष्ठा पर भी सवाल खड़े होते हैं जिसे वापस लेना पड़ा। संयुक्त संसदीय समिति कोई टीवी सीरियल नहीं जिसका उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करना या फिर कहानी में ऐसा मोड़ लाना हो कि लोग चौंक जाएं। क्या कोई बताएगा कि वे कौन सी परिस्थितियां थीं जिनके चलते गवाहों की सूची में वे दो नाम दर्ज हुए जिनसे पूछताछ संभव नहीं। यह सबसे बड़े घोटाले की जांच हो रही है या देश से मजाक किया जा रहा है? क्या इस कृत्य के बाद देश यह उम्मीद करे कि संयुक्त संसदीय समिति वास्तव में इस घोटाले की तह तक पहुंच सकेगी? फिलहाल तो इसके आसार धूमिल नजर आते हैं।


संयुक्त संसदीय समिति मूलत: ए. राजा की ओर से 2जी स्पेक्ट्रम की बंदरबांट के कारणों का पता लगाने के लिए गठित की गई है, लेकिन बड़ी मुश्किल से इसके लिए राजी हुए सत्तापक्ष ने राजग सरकार के समय किए गए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन की जांच करने का भी निर्णय लिया। इसमें हर्ज नहीं, क्योंकि यह सामने आ चुका है कि राजग शासन के समय जब प्रमोद महाजन दूरसंचार मंत्री थे तब भी स्पेक्ट्रम आवंटन अनुचित तरीके से हुआ था। पता नहीं सच क्या है, लेकिन यदि संसदीय समिति ए. राजा, चिदंबरम और मनमोहन सिंह से पूछताछ किए बगैर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने का निर्णय लेती है तो सच शायद ही सामने आए। लोकतंत्र में कोई भी नियम-कानूनों से परे नहीं हो सकता। यदि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में धांधली का पता लगाने के लिए पूर्व नौकरशाहों और केंद्रीय मंत्रियों से पूछताछ हो सकती है तो फिर मौजूदा मंत्रियों और प्रधानमंत्री से पूछताछ करने में हर्ज नहीं। अभी हाल में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन एक जांच समिति के सामने पेश हुए। यह समय ही बताएगा कि संयुक्त संसदीय समिति प्रधानमंत्री से पूछताछ करने की आवश्यकता महसूस करेगी या नहीं? भले ही यह दावा किया जा रहा हो कि इस तरह की समितियां दलगत हितों से ऊपर उठकर काम करती हैं, लेकिन कम से कम यह बात मौजूदा संयुक्त समिति के बारे में कहना कठिन है। फरवरी, 2011 में गठित इस समिति की अब तक 40 बैठकें हो चुकी हैं। इन बैठकों में कई बार यह नजर आया कि सदस्यों पर दलगत हित हावी हैं। एक-दूसरे पर तोहमत मढ़ने की होड़ में कई बार बैठकों में हंगामा हुआ और आम राय छिन्न-भिन्न हो गई।


संयुक्त संसदीय समिति पर किसी का जोर नहीं। वह किसी से भी पूछताछ करने के लिए स्वतंत्र और सक्षम है, लेकिन इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसके मुखिया कांग्रेस सांसद हैं। क्या कांग्रेस और विशेष रूप से सोनिया गांधी एवं मनमोहन सिंह यह सुनिश्चित करेंगे कि यह समिति दूध का दूध और पानी का पानी करे? मनमोहन सिंह की मानें तो उन्होंने व्यवस्था में उच्च स्तर की ईमानदारी का स्तर लाने की कोशिश की है। इस कथन पर यकीन करने का कोई कारण नहीं। यह निरा झूठ है और इसका प्रमाण देश-दुनिया में कायम इस आम धारणा का गहराना है वह भारत के इतिहास की सबसे भ्रष्ट और नाकाम सरकार का संचालन कर रहे हैं।


लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


सावधान ! भ्रष्टाचार प्रगति पर है




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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shailesh001 के द्वारा
July 11, 2012

चोर कितना भी सच्चा हो जाए खुद को वो कभी सजा नहीं दे सकता.. आखिर जनता किस बात का इन्तजार कर रही है. आखिर इस महाभ्रष्ट सरकार को सजा तो उसको ही देनी है..  इससरकार का जनता के मेहनत के पैे पर चल रहा यह नाटक अब बंद होना चाहिए…

Chandan rai के द्वारा
July 11, 2012

सचान साहब , मुझे तो संसदीय समिति की जांच प्राणाली और उसके सदस्यों और विभिन्न पार्टिओं के कर्तव्य निष्ठा पर कहावत याद आती है की चोर चोर मौसेरे भाई ! यह कमेटी नाम भर के लिए है और इसका उपयोग बस राजनेतिक मकसद साधने तक ही सिमित है , सुन्दर विवेचान्त्मक आलेख !


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