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नाकामी के तीन बरस

Posted On: 15 May, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Rajeev Sachanअगले मंगलवार को मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल के तीन बरस पूरे हो जाएंगे। बहुत संभव है कि उस दिन सरकार अखबारों-टीवी के जरिये अपनी उपलब्धियों का गुणगान करे। यदि वह ऐसा करती है तो ही इसका पता चलेगा कि वह अपने किन कामों को उपलब्धियां मान रही है। हालांकि उसकी उपलब्धियों का खाता पूरी तरह खाली नजर आ रहा है, लेकिन सरकारी प्रचार तंत्र बिना कुछ हासिल किए हुए बहुत कुछ हासिल कर लेने का ढिंढोरा पीटने में माहिर है। यदि केंद्र सरकार नाकामी के बावजूद अपनी कामयाबी का यशोगान करे तो उस पर आश्चर्य न करें। आश्चर्य इस पर भी न करें कि हर मोर्चे पर नाकामी की मिसाल कायम करने वाली केंद्र सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी सरकार की आलोचना करने वालों को आड़े हाथ लें। पिछले दिनों सोनिया गांधी ऐसा कर चुकी हैं। उनकी मानें तो इन दिनों सरकार की आलोचना करना एक फैशन बन गया है। उनके निशाने पर विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा थी, लेकिन संभवत: वह मीडिया, आर्थिक-राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञों, उद्योगपतियों आदि को भी खरी-खोटी सुनाना चाह रही थीं। मनमोहन सिंह यह काम पहले से करते चले आ रहे हैं। जब भी किसी ने सरकार की निर्णयहीनता पर निराशा जताई, मनमोहन सिंह और उनके मंत्रियों ने यह कहकर उसका प्रतिवाद किया कि वे निराशा का माहौल न पैदा करें। कई बार तो ऐसे लोगों को झिड़की भी दी गई। ऐसा वही कर सकता है जो हालात से वाकिफ न हो अथवा उससे जानबूझकर अनजान बना हो।


कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के लिए यह विशेष चिंता का विषय बनना चाहिए कि मनमोहन सिंह दूसरी पारी में बुरी तरह नाकाम रहने के बावजूद इसका अहसास नहीं कर पा रहे हैं। जब उन्हें यह अहसास ही नहीं कि वह नाकामियों से घिर गए हैं तो फिर उससे उबरेंगे कैसे? इससे भी चिंता की बात यह है कि वह यह कहने से गुरेज नहीं करते कि समस्याएं न हों तो जीवन का आनंद ही खत्म हो जाए। क्या देश इसकी खुशी मनाए कि उसे समस्याओं से आनंदित होने का अवसर मिल रहा है? अफसोस की बात केवल यह नहीं है कि सरकार राजनीति, विदेश, कानून-व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर नाकाम है, बल्कि यह है कि वह आर्थिक मोर्चे पर भी बुरी तरह फ्लाप है। यह तब है जब खुद प्रधानमंत्री आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं। उनके अलावा योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी आर्थिक विषयों के ज्ञाता माने जाते हैं। इसी तरह गृहमंत्री पी. चिदंबरम और प्रणब मुखर्जी भी आर्थिक मामलों के विद्वान माने जाते हैं। आखिर ये विशेषज्ञ क्या कर रहे हैं? क्या कारण है कि दुनिया भर के आर्थिक मामलों के टिप्पणीकार यह लिख रहे हैं कि भारत सरकार नीतिगत पंगुता का शिकार हो गई है और भारत के आर्थिक उत्थान का सुनहरा दौर समाप्त हो गया। इन विशेषज्ञों पर यकीन करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था के जो तमाम पहलू देशी-विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर रहे थे वे सभी अपनी चमक खो बैठे हैं अथवा सरकार की निर्णयहीनता का शिकार हो गए हैं।


विडंबना यह है कि सरकार और उसके रणनीतिकार एक तो ऐसा कुछ होने से इन्कार करते हैं और यदि कभी सच्चाई स्वीकारते भी हैं तो उसका दोष कभी यूरोप की कमजोर आर्थिक हालात पर मढ़ देते रहे हैं और कभी प्रतिकूल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का उल्लेख करने लगते हैं। किसी को इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि मनमोहन सिंह समर्थ प्रधानमंत्री नहीं हैं। यदि वह अपेक्षित फैसले नहीं ले पा रहे हैं तो इसके लिए सोनिया गांधी भी बराबर की जिम्मेदार हैं। समस्या यह है कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद विभिन्न मुद्दों पर जैसा जोर देती है वैसा कुछ सरकार के स्तर पर नहीं नजर आता। चूंकि सरकार में सुधारों को लेकर कहीं कोई छटपटाहट नहीं दिखती इसलिए सभी महत्वपूर्ण फैसले अधर में लटके हैं। इनमें ज्यादातर आर्थिक सुधारों से जुड़े हैं। यह सही है कि भारत सरीखे देश में आम सहमति के जरिये ही सुधारों की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है, लेकिन आम राय कायम करने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही है। तथ्य यह है कि कांग्रेस ज्यादातर मुद्दों पर संप्रग के अंदर ही आम राय कायम करने में असफल है। परिणाम यह है कि भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक, रिटेल में एफडीआइ, एनसीटीसी, श्रम एवं पेंशन नियमों में बदलाव जैसे मामले जहां के तहां हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति प्रत्यक्ष कर संहिता और वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम की है। इसके अलावा आंतरिक सुरक्षा का परिदृश्य भी चिंताजनक बना हुआ है।


नक्सली बार-बार सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर रहे हैं, लेकिन सरकार यह दोहराते रहने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रही है कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। भारत सरकार तमाम गर्जन-तर्जन के बावजूद मुंबई हमले के गुनहगारों को सजा दिला पाने में नाकाम है। मनमोहन सरकार न तो राजनीतिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ सकी है, न चुनावी और न्यायिक सुधारों की दिशा में। इन क्षेत्रों में सुधार के लिए जो कुछ भी किया जाना चाहिए था वह अभी तक प्राथमिकता सूची से बाहर नहीं आ सका है। तमाम घपलों-घोटालों के कारण बदनामी मोल लेने के बावजूद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के ठोस उपाय भी अभी कथित एजेंडे में ही हैं। बावजूद इसके दावा यह किया जाता है कि इस सरकार ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सबसे ज्यादा काम किया है। इस सरकार की नाकामी का एक प्रमाण उसे सुप्रीम कोर्ट से मिली फटकार भी है।


लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं


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hello के द्वारा
May 16, 2012

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