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कांग्रेस की बेजा बेचैनी

Posted On: 28 Feb, 2012 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आचार संहिता को निर्वाचन आयोग के दायरे से बाहर करने की केंद्र की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं संजय गुप्त


उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान राहुल गांधी की ओर से कानपुर में किए गए रोड शो के दौरान चुनाव अधिकारियों ने यह पाया कि यह शो निर्धारित अवधि से ज्यादा देर और साथ ही दूर तक चला। परिणाम यह रहा कि उसी दिन चुनाव आयोग ने कुछ स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के साथ-साथ राहुल गांधी के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की रिपोर्ट दर्ज करा दी। कांग्रेस को चुनाव आयोग का यह फैसला रास नहीं आया और उसने उसके निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही। आचार संहिता के इस उल्लंघन के मामले में हाईकोर्ट का निर्णय कुछ भी हो, इसके पहले सलमान खुर्शीद, बेनीप्रसाद वर्मा और श्रीप्रकाश जायसवाल को भी आचार संहिता के उल्लंघन की नोटिस मिल चुकी है। इसके अतिरिक्त छोटे स्तर के नेताओं को नोटिस मिलने की तो कोई गिनती ही नहीं है। चुनावों के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में आचार संहिता उल्लंघन के मामले सामने आते हैं। कई बार चुनाव आयोग कुछ ज्यादा सख्ती बरतता दिखता है तो कई बार छोटे-बड़े नेता उसे जानबूझकर चुनौती देने के इरादे जाहिर कर रहे होते हैं। भले ही चुनाव आयोग के कुछ फैसले उसकी अति संवेदनशीलता का उदाहरण नजर आते हों, लेकिन यदि वह आचार संहिता के पालन में सख्ती न दिखाए तो नेता मतदाताओं को रिझाने और बरगलाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखेंगे। आचार संहिता का उल्लंघन करना उनके लिए बायें हाथ का खेल बन गया है।


यह पिछले दो दशकों में चुनाव आयोग की ओर से दिखाई गई सख्ती का ही परिणाम है कि मतदाताओं को डराने-धमकाने, बूथ कैप्चरिंग करने, बेतहाशा झंडे-बैनर-पोस्टर के साथ-साथ लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करने के मामले अब बीती बात बन चुके हैं, लेकिन यही बात धन के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती। हालांकि चुनाव आयोग धन के इस्तेमाल को लेकर सख्त हुआ है और हाल के चुनावों में पंजाब और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर धन जब्त किया गया है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि नेताओं ने उसका सहारा लेना छोड़ दिया है।


ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की सख्ती से आजिज आकर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आचार संहिता को आयोग के दायरे से बाहर ले जाने का मन बनाया था। हालांकि इससे संबंधित एक प्रस्ताव के सार्वजनिक हो जाने पर संबंधित मंत्री समूह के साथ-साथ कार्मिक विभाग ने भी इसका खंडन किया कि केंद्र सरकार चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती पर विचार कर रही है, लेकिन जिस तरह कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और केंद्र सरकार के कुछ अन्य प्रतिनिधियों ने यह कहा कि यदि राजनीतिक दल चाहेंगे तो इस मुद्दे पर विचार किया जा सकता है उससे केंद्रीय सत्ता की मंशा पर सवालिया निशान लगता है। केंद्र सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं कि आखिर सही सोच वाला कोई भी राजनीतिक दल चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती क्यों चाहेगा और वह भी तब जब यह महसूस किया जा रहा है कि आचार संहिता के संदर्भ में उसके अधिकार बढ़ने चाहिए? उसकी इस सफाई का भी कोई मतलब नहीं कि इस संदर्भ में आई खबरें शरारतपूर्ण और भ्रामक हैं, क्योंकि आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने का प्रस्ताव मीडिया ने नहीं, सरकार के लोगों ने ही तैयार किया था। इस प्रस्ताव का तैयार होना केंद्र सरकार के इरादों की पोल खोलता है। वैसे भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने यह विचार व्यक्त किया कि आचार संहिता को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए।


यह पहली बार नहीं है जब चुनाव आयोग की शक्तियों में कटौती करने की कोशिश की गई हो। इसके पहले जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बनाया गया। इस फैसले के पीछे इरादा मुख्य चुनाव आयुक्त को कमजोर करना ही था। केंद्र सरकार चाहे जो दावा करे, यह एक तथ्य है कि लंबित चुनाव सुधारों को आगे बढ़ाने के मामले में वह कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त यह कह चुके हैं कि केंद्र सरकार चुनाव सुधारों के प्रति सजगता नहीं दिखा रही। क्या यह असामान्य नहीं कि दो दशक से लंबित चुनाव सुधारों पर सुस्ती दिखाने वाली सरकार ने आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने के मामले में तेजी दिखाने की कोशिश की? यदि केंद्र सरकार के इरादे नेक हैं और वह चुनाव आयोग के अधिकार कम नहीं करना चाहती तो फिर आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने के साथ ही उसका क्रियान्वयन और कार्रवाई करने का अधिकार भी उसके हाथों में ही रखने पर विचार करना चाहिए। इससे ही आचार संहिता और प्रभावी हो सकती है और उसके उल्लंघन के मामलों में कमी लाई जा सकती है।


केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की तनातनी अनायास नहीं है। इस तनातनी की शुरुआत पांच राज्यों के चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होने के साथ ही हो गई थी। सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण पर बयान देकर चुनाव आयोग की नाराजगी मोल ली। इस नाराजगी के जवाब में जब उन्होंने आयोग की खिल्ली उड़ाई तो उसने उनकी शिकायत सीधे प्रधानमंत्री से की। इस मामले के शांत होने के कुछ ही दिनों बाद सलमान खुर्शीद ने फिर चुनाव आयोग को चुनौती दी। इस पर आयोग ने उनकी शिकायत राष्ट्रपति से की। राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग की चिठ्ठी प्रधानमंत्री को भेज दी। बाद में खुर्शीद ने माफी मांग ली, लेकिन इसके तुरंत बाद बेनीप्रसाद वर्मा चुनाव आयोग को चुनौती देते नजर आए। ताजा मामला श्रीप्रकाश जायसवाल का है। उन्हें चुनाव आयोग ने उनके इस बयान पर नोटिस दी है कि उत्तर प्रदेश में या तो कांग्रेस की सरकार बनेगी या फिर राष्ट्रपति शासन लगेगा।


यह संभवत: पहली बार है जब तीन केंद्रीय मंत्रियों को चुनाव आयोग की नोटिस का सामना करना पड़ा हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी कारण कांग्रेस को चुनाव आयोग के अधिकारों में कटौती की आवश्यकता महसूस हुई है? सच्चाई जो भी हो, यह आशंका बनी हुई है कि केंद्र सरकार आचार संहिता को वैधानिक दर्जा देने के नाम पर उसे चुनाव आयोग के दायरे से बाहर कर सकती है। यदि ऐसा हुआ तो चुनाव आयोग की ताकत कम होगी और आचार संहिता के उल्लंघन के मामले भी बढ़ सकते हैं, क्योंकि अदालतों में छोटे-छोटे मामलों का निपटारा होना न केवल मुश्किल होता है, बल्कि उनमें आवश्यकता से अधिक समय भी लगता है। कांग्रेस का कुछ भी कहना हो, उसने अपने आलोचकों को यह कहने का अवसर प्रदान किया है कि उसे संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती रास नहीं आती। यह ठीक नहीं कि देश का सबसे पुराना, बड़ा और व्यापक आधार वाला राजनीतिक दल चुनाव आयोग की शक्तियों में काट-छांट करने के संकेत दे रहा है। ये संकेत कांग्रेस की साख को गिराने वाले हैं।


इस आलेख के लेखक संजय गुप्त हैं


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