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राजनीति के दुष्चक्र में टीम अन्ना

Posted On: 18 Oct, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Rajeev Sachanभ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनरत अन्ना और उनके साथियों को राजनीति के पचड़े में फंसते देख रहे है राजीव सचान


इन दिनों टीम अन्ना की दशा-दिशा ऐसी है कि दूर से ही उसकी दुर्दशा का बोध होता है। उसकी हालत कुछ वैसी ही दिख रही है जैसी टीम इंडिया की इंग्लैंड दौरे के समय थी। खुद को गैर राजनीतिक बताने वाली टीम अन्ना राजनीति के पचड़े में बुरी तरह फंसती जा रही है। इसके लिए एक हद तक वह खुद ही जिम्मेदार है। उसने जिस तरह हिसार लोकसभा चुनाव में हस्तक्षेप किया उससे उसके आलोचकों को यह कहने का अवसर मिला कि वह न केवल गैर कांग्रेसी दलों के पाले में खड़ी हो गई, बल्कि उन्हें अनावश्यक लाभ प्रदान करने की स्थिति में भी पहुंच गई। हिसार लोकसभा चुनाव का नतीजा अनुमान के अनुरूप ही है, लेकिन यह तय कर पाना मुश्किल है कि कांग्रेस प्रत्याशी की हार में टीम अन्ना का कितना योगदान रहा? टीम अन्ना की ओर से हिसार में कांग्रेस को हराने की अपील करने में कोई बुराई नहीं। कोई भी संगठन इस तरह की अपील कर सकता है, लेकिन ऐसा करने के बाद वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसके लिए सारे दल एक जैसे हैं अथवा उसे सत्तापक्ष-विपक्ष से कोई मतलब नहीं। जब यह माना जा रहा था कि टीम अन्ना अब अपनी अगली रणनीति संसद का शीतकालीन सत्र बीत जाने के बाद तय करेगी तब खुद अन्ना के मुख से यह सुनने को मिला कि यदि इस सत्र में एक अच्छा लोकपाल बिल आ जाता है तो वह कांग्रेस का साथ देंगे। यदि मौनव्रत तोड़ने के बाद अन्ना इस संदर्भ में कोई स्पष्टीकरण नहीं देते तो आम लोगों के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि पक्ष-विपक्ष से मतलब न रखने वाले अन्ना लोकपाल विधेयक पेश-पारित होने की स्थिति में भी कांग्रेस के पाले में कैसे खड़े हो सकते हैं?


पता नहीं अन्ना का मौन कब टूटेगा, लेकिन उनके गांव के सरपंच राहुल गांधी से मुलाकात करने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि शीघ्र ही अन्ना और राहुल के बीच भी मुलाकात हो सकती है। इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन अन्ना को यह अच्छी तरह पता होना चाहिए कि राहुल के सबसे करीबी दिग्विजय सिंह किस तरह उन पर कीचड़ उछाल रहे हैं? क्या वह यह काम राहुल की मर्जी के बगैर कर सकते हैं? दिग्विजय सिंह का ताजा बयान है कि अन्ना ने मौन इसलिए धारण किया ताकि उन्हें येद्दयुरप्पा के बारे में कुछ बोलना न पड़े। हालांकि तथ्य यह है कि अन्ना ने येद्दयुरप्पा की गिरफ्तारी के पहले ही मौन धारण करने का फैसला कर लिया था और तब तक ऐसे कोई आसार भी नहीं थे कि येद्दयुरप्पा गिरफ्तार हो सकते हैं, लेकिन दिग्विजय किसी के खिलाफ कुछ भी कह सकते हैं। वह यह भी कह सकते हैं कि अन्ना को पहले से पता था कि येद्दयुरप्पा गिरफ्तार होने वाले हैं। उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम अन्ना को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का करीबी साबित करना और इसी बहाने उनकी विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाना है। यह खोज केवल वही कर सकते थे कि टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण को कथित संघ समर्थक लोगों ने इसलिए पीटा, क्योंकि वे संघ से दूरी बनाने की अन्ना की कोशिश से खफा थे। दिग्विजय सिंह अन्ना को बदनाम करने के लिए किस तरह हर संभव कोशिश कर रहे हैं, यह उनके इस बयान से भी साबित होता है कि अन्ना को सांप्रदायिक हिंसा निषेध बिल का समर्थन करना चाहिए। हालांकि इस मूर्खतापूर्ण बिल का विरोध संघ-भाजपा के साथ-साथ अन्य दल भी कर रहे हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह का इरादा तो यह साबित करना है कि जो भी इस बिल से सहमत न हो उसे संघ की कूची लेकर भगवा रंग से पोत दिया जाए।


यह तो समझ आता है कि अन्ना हजारे प्रधानमंत्री को पत्र लिखें और उनके पत्रों का जवाब भी दें, लेकिन आखिर वह दिग्विजय सिंह से चिट्ठीबाजी क्यों कर रहे हैं? यह भी एक पहेली है कि वह अपने आंदोलन को संघ से मिले समर्थन के मामले में इतना बिदक क्यों रहे हैं? क्या उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सभी भारतीयों से समर्थन मांगते समय यह स्पष्ट किया था कि संघ से जुड़े लोग उनके पास न फटकें? अन्ना यह दावा तो कर सकते हैं कि उनके आंदोलन की रीति-नीति तय करने में संघ-भाजपा की कोई भूमिका नहीं, लेकिन वह यह नहीं कह सकते कि उन्हें इन संगठनों के सदस्यों का समर्थन नहीं मिला। सच तो यह है कि ऐसा कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि उन्हें समाज के हर तबके के लोगों ने समर्थन दिया था। यदि अन्ना और उनकी टीम को संघ और उसके लोगों से इतना ही परहेज है तो फिर बेहतर होगा कि अगली बार वह यह स्पष्ट कर दें कि 125 करोड़ भारतीयों में अमुक-अमुक लोग उनका समर्थन न करें।


अन्ना और उनकी टीम को यह समझने और स्पष्ट करने की भी जरूरत है कि उनकी प्राथमिकता क्या है? हिसार चुनाव में हस्तक्षेप कर टीम अन्ना ने यही स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ लोकपाल बिल है, लेकिन वह यह आभास कराने का कोई मौका नहीं छोड़ती कि अन्य अनेक मुद्दे भी उसके एजेंडे में हैं और वह उनके प्रति गंभीर भी है। यदि ऐसा है तो फिर यह विशेष रूप से स्पष्ट करना होगा, क्योंकि दिग्विजय सिंह की तरह कुछ अन्य लोग भी यह चाहते हैं कि टीम अन्ना भारत भूमि की समस्त समस्याओं पर न केवल अपने विचार व्यक्त करे, बल्कि उनका समाधान करने के लिए आगे भी आए। भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है कि परम भ्रष्टाचारी भी यही कहेगा कि उसका खात्मा होना चाहिए, लेकिन अन्य मुद्दे ऐसे नहीं हैं। नक्सलवाद, कश्मीर, भूमि अधिग्रहण कानून, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून सरीखे मुद्दे न केवल बेहद पेचीदा हैं, बल्कि उन पर लोगों की राय भी अलग-अलग है। यदि इन पर राय व्यक्त करते समय सतर्कता और एकजुटता नहीं बरती गई तो टीम अन्ना बिखर सकती है। अच्छा होता कि अन्ना के साथ उनकी टीम के लोग भी मौन धारण करते।


लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं




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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pramod chaubey के द्वारा
October 18, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनरत अन्ना और उनके साथियों को राजनीति के पचड़े में फंसते देख रहे है राजीव सचान…..वास्तविकता है। एक मां के कोख से  पैदा हुए लोगों के विचारों में मतभेद होता है। टीम अन्ना इससे नहीं बच सकती थी। अभी तो परेशान कांग्रेस ने कुछ ऐसा ही किया।  देश में हुकूमत यूपीए की है, राजग की नहीं। ऐसी दशा में स्पष्ट मत  से भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में बिगुल फूंकने पर यूपीए के सबसे  बड़े घटक दल कांग्रेस को पीड़ा होगी। लोकपाल और जन लोकपाल के सवाल पर कांग्रेस का मत स्पष्ट नहीं है तो अन्ना टीम के कमजोर होते ही  अन्य दल भी इससे मुंह मोड़ लें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 


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