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सही दिशा में सिर्फ एक कदम

Posted On: 29 Aug, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Sanjay Guptयह सचमुच ऐतिहासिक है कि संसद में आम जनता की आकांक्षा और विशेष रूप से अन्ना हजारे के आग्रह पर लोकपाल के कुछ अहम बिंदुओं पर चर्चा हुई और उन पर सत्तापक्ष और विपक्ष ने करीब-करीब सहमति जताई। इस सहमति के अनुरूप प्रस्ताव पारित होने के बाद यह सर्वथा उचित है कि उन्होंने अनशन तोड़ने की घोषणा कर दी। संसद के दोनों सदनों में हुई चर्चा के बाद देश को यह भरोसा हुआ है कि अंतत: लोकपाल का निर्माण होगा और जैसा कि सभी मान रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर कुछ न कुछ तो लगाम लगेगी ही। इस संदर्भ में राहुल गांधी ने यह सही कहा कि केवल लोकपाल से भ्रष्टाचार रुकने वाला नहीं है और इस संस्था को संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए। यह समय बताएगा कि किस तरह की लोकपाल व्यवस्था का निर्माण होगा और उससे भ्रष्टाचार पर किस हद तक अंकुश लगेगा, लेकिन लोकपाल विधेयक के प्रमुख बिंदुओं पर बहस के दौरान संसद के दोनों सदनों में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के जिन अन्य अनेक उपायों पर चर्चा हुई वे केवल चर्चा तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि राजनीतिक दल भ्रष्टाचार पर वास्तव में अंकुश लगाना चाहते हैं तो उन्हें उसके मूल कारणों की तह तक जाकर उनका निदान करना होगा।


राजनीतिक दलों को भ्रष्टाचार के मूल कारणों का संज्ञान अच्छी तरह होना चाहिए, क्योंकि राजनीति के तौर-तरीकों ने ही भ्रष्टाचार को व्यापक बनाने और उस पर अंकुश न लगने देने का काम किया है। दरअसल यह राजनीति है जो भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत और साथ ही संरक्षक बन गई है। राजनीति के तौर-तरीकों और विशेष रूप से चुनावी राजनीति ने भ्रष्टाचार को व्यापक रूप प्रदान किया है। जिस तरह संसद ने यह महसूस किया कि आम जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए लोकपाल व्यवस्था का निर्माण करना जरूरी हो गया है उसी तरह उसे यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि राजनीतिक और चुनावी सुधारों का भी समय आ चुका है। यह ठीक नहीं कि न केवल राजनीतिक सुधार अटके पड़े हुए हैं, बल्कि चुनावी सुधारों की भी अनदेखी की जा रही है। चुनाव तंत्र में धनबल की भूमिका इतनी बढ़ गई है कि लोकतंत्र के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। आज सभी नेता यह भली-भांति जानते हैं कि चुनाव चाहे वह लोकसभा का हो या विधानसभा का या अन्य किसी निकाय का, वह धनबल के बिना जीतना लगभग नामुमकिन है। चुनावों में धन का इस्तेमाल बेरोकटोक बढ़ता जा रहा है। हाल में तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के दौरान सारे देश ने जाना कि किस तरह बोरियों में रुपये ले जाए जा रहे थे। चुनाव आयोग धनबल की भूमिका से परिचित है और वह उस पर रोक लगाने की कोशिश भी करता है, लेकिन मौजूदा स्थितियों में वह एक सीमा तक ही कार्रवाई करने में सक्षम है। चुनाव आयोग यह अच्छी तरह जान रहा है कि प्रत्याशी चुनाव खर्च सीमा से अधिक धन खर्च करते हैं और गलत शपथ पत्र भी देते हैं, लेकिन वह ऐसे लोगों का चुनाव रद्द करने में समर्थ नहीं। नियमानुसार तय सीमा से अधिक खर्च करने वालों का चुनाव रद्द होना चाहिए। यदि ऐसा होने लगे तो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को चलाना मुश्किल होगा। स्पष्ट है कि चुनावी भ्रष्टाचार लोकतंत्र को चुनौती दे रहा है।


अगर भ्रष्टाचार के इतिहास को देखा जाए तो वह आजादी के बाद ही चुनाव प्रक्रिया में घर कर गया था। पहले चुनावों में धन के अवैध इस्तेमाल की एक सीमा थी, लेकिन आज राजनीतिक दलों को चुनाव जीतने के लिए अरबों रुपये की जरूरत पड़ती है। यह धन कैसे एकत्रित होता है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। जब राजनेता चुनाव जीतने के लिए अवैध रूप से धन लेते हैं तो वे भ्रष्टाचार के सारे द्वार खोल देते हैं। आज स्थिति यह है कि चुनावी राजनीति के वही तौर-तरीके पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव में आजमाए जा रहे हैं जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव में प्रचलित हैं। कोई भी उन पर रोक लगाने में समर्थ नहीं। स्थानीय निकायों और पंचायतों की विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटित धन की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, चुनाव जीतने के लिए छल-कपट भी बढ़ता जा रहा है। संसद इस सबसे अनजान नहीं हो सकती। उसे इस पर तो आपत्ति है कि राजनीति शब्द हेय बन रहा है, लेकिन उसे उन तौर-तरीकों पर आपत्ति क्यों नहीं जिनके चलते जनता राजनीति के प्रति अविश्वास से भर उठी है?


लोकपाल के मुद्दे पर चर्चा के दौरान भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के विभिन्न तरीकों पर तो खूब चर्चा हुई, लेकिन उन मुद्दों पर सार्थक चर्चा अभी शेष है जिनके कारण देश में भ्रष्टाचार निरंकुश होता गया। इसमें दोराय नहीं कि अन्ना हजारे ने जनलोकपाल के जरिये चेतना जाग्रत की और उसके चलते पूरा देश आंदोलित हो उठा। इस आंदोलन के पीछे छिपे आक्रोश को राजनीतिक दलों ने पहचाना तो, लेकिन देर से। यह अच्छा नहीं हुआ कि अन्ना के अनशन पर बैठने और देश की जनता के सड़कों पर उतरने के बाद ही सत्तापक्ष, विपक्ष और संसद चेती। यह काम पहले ही हो जाना चाहिए था। यह भी अच्छा नहीं हुआ कि प्रारंभ में अन्ना हजारे को खारिज और लांछित करने की कोशिश की गई। इसकी भी सराहना नहीं की जा सकती कि निरर्थक आरोपों का सहारा लेकर लोकपाल के मुद्दे को कमजोर करने की कोशिश की गई। इस कोशिश से राजनीति के संवेदनहीन चरित्र की ही झलक मिली।


यदि राजनीतिक दल और संसद देश की जनता की आवाज नहीं सुनेंगे तो कौन सुनेगा? क्या कोई इस पर विचार करेगा कि संसद को जनता की आवाज सुनने में इतनी देर क्यों हुई? अन्ना हजारे के अनशन के बाद उत्पन्न हुए हालात जिस तरह यकायक उलझ गए उस पर भी सत्तापक्ष और विपक्ष को चिंतन-मनन करना होगा। यही काम अन्ना हजारे और उनके साथियों एवं समर्थकों को भी करना होगा। लोकपाल के लिए अनशन-आंदोलन में कुछ भी अनुचित नहीं। आग्रह, मांग, शर्ते आंदोलन का हिस्सा हैं, लेकिन ऐसे रवैये की पक्षधरता नहीं की जा सकती कि हमारे विचार ही सही हैं और उन्हें ही अमुक तिथि तक स्वीकार कर किसी व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए। टीम अन्ना से एक भूल यह भी हुई कि वह लोकपाल लागू कराने के आग्रह के बाद अपनी तीन शर्तो तक सीमित हो गई। परिणाम यह हुआ कि आखिर में सारी बहस इन तीन शर्तो तक केंद्रित होकर रह गई। आवश्यकता इसकी थी कि सक्षम लोकपाल व्यवस्था का निर्माण होने के साथ भ्रष्टाचार के मूल कारणों का भी निवारण हो। यह राहतकारी है कि लोकपाल के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, लेकिन यह देखना शेष है कि राजनीतिक और चुनावी भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के उपायों पर कब अमल होता है? क्या संसद यह सुनिश्चित करेगी कि इन उपायों पर अमल में उतनी देर न हो जितना लोकपाल के कुछ बिंदुओं पर आम सहमति कायम करने में हुई?


लोकपाल पर सहमति का मार्ग प्रशस्त होने के साथ चुनावी भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी पहल को जरूरी मान रहे हैं संजय गुप्त




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