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शिक्षा में अराजक तत्व

Posted On: 24 Aug, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Nishikant Thakurहमारी शिक्षा व्यवस्था लगातार गिरावट की शिकार हो रही है, यह बात बार-बार कही जाती है। आमतौर पर इसके लिए संपूर्णता में व्यवस्था को जिम्मेदार माना जाता है और उसे ही दोष दिया जाता है। यह एक सामान्य प्रवृत्ति बन गई है कि हम हर बात के लिए सरकार या व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। यह सोचे बगैर कि अब सरकार या व्यवस्था हमारे ऊपर कहीं से थोपी गई नहीं, बल्कि हमारी चुनी हुई है और यह सुचारु रूप से काम करे, इसके लिए हमारा अपना योगदान बहुत जरूरी है। हम जिस किसी भी स्तर पर हैं, वहां अगर अपना काम पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ करना शुरू कर दें तो बहुत सारी गड़बडि़यां अपने आप सुधर जाएंगी। शिक्षा व्यवस्था के मामले में भी यह बात उतनी ही सही बैठती है। इसमें गिरावट के लिए सरकार कुछ हद तक जिम्मेदार तो है, लेकिन सिर्फ वही जिम्मेदार नहीं है। इसमें घुस आए कुछ अराजक तत्व भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। हाल ही में पंजाब के जालंधर जिले में हुई एक घटना इसका ताजा उदाहरण है। वहां एक सरकारी एलीमेंटरी स्कूल के एक अध्यापक को छात्राओं को अश्लीलता का पाठ पढ़ाते पकड़ा गया। इस अध्यापक पर यह आरोप था कि वह छात्राओं को अलग से अपने कमरे में बुलाकर शारीरिक ज्ञान के बहाने उनके अंगों को छूता था और उनके साथ अश्लील हरकतें करता था। इसकी खबर कान में पड़ते ही अभिभावकों ने गांव की पंचायत के साथ मिलकर थाने में शिकायत दर्ज करवाई और शिक्षक को गिरफ्तार करवा दिया। इसके पहले फिरोजपुर जिले के फाजिल्का में एक कॉलेज के प्रिंसिपल ने नशे में चूर होकर नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ की। ये लड़कियां वहां प्रदेश स्तरीय फुटबाल मुकाबले की रिहर्सल के लिए आई थीं। उन्हें रात में कॉलेज में ही रुकना था।


नशे में धुत होकर जब प्रिंसिपल लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगा तो चौकीदार ने इसकी सूचना गांव के पूर्व सरपंच को दी और पूर्व सरपंच ने गांव के लोगों के साथ पहुंचकर लड़कियों को बचाया। पूर्व सरपंच ने लड़कियों को गांव में ठहराने की व्यवस्था बनाई और प्रिंसिपल को पुलिस के सिपुर्द कर दिया। इन दोनों ही मामलों में लड़कियों को खतरा खुद शिक्षकों से हुआ और उन्हें बचाया या तो अभिभावकों या फिर अन्य लोगों ने। जाहिर है, शिक्षा के मंदिरों की पवित्रता ऐसी कुत्सित मानसिकता वाले लोगों के चलते बाधित हुई है। ये घटनाएं अकेली नहीं हैं। ऐसी तमाम घटनाएं देश भर में आए दिन होती रहती हैं। कई बार पीडि़त पक्ष अपनी आवाज बुलंद करता है और कई बार वह चुपचाप अत्याचार बर्दाश्त कर लेता है। अत्याचार बर्दाश्त करने की भी कई वजहें होती हैं। कभी लोग केवल लालच के कारण अत्याचार बर्दाश्त कर लेते हैं तो कई बार बदनामी के भयवश। ऐसे अत्याचार बर्दाश्त करने वालों में सिर्फ लड़कियां ही नहीं होती हैं, लड़के भी होते हैं। कई बार वे आवाज उठाते भी हैं तो उनकी बात को वह महत्व नहीं मिल पाता है। कई बार व्यवस्था के दूसरे अंग उन्हें डांट-फटकार कर चुप करा देते हैं और कई बार तो घरों में ही उन्हें मान-सम्मान का हवाला देकर चुप करा दिया जाता है। यह अलग बात है कि इसके लिए खुद भुक्तभोगियों की जिम्मेदारी नगण्य होती है, लेकिन समाज की पिछड़ेपन की मानसिकता के कारण वे स्वयं को ही दोषी मानने लगते हैं।


अधिकतर लड़कियां इसी मानसिकता की शिकार होकर अत्याचार सहते रहने के लिए विवश होती हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों हमारा समाज पिछड़ेपन की अपनी मानसिकता से बाहर निकल कर दोषियों को सबक सिखाने के मूड में नहीं आ पा रहा है? अगर इन दोनों घटनाओं पर गौर किया जाए तो सबसे पहली बात जो सामने आती है, वह है पीडि़त लड़कियों के पक्ष में दूसरे लोगों की कोशिशें। इनमें पहले यानी जालंधर के स्कूल वाले मामले में लड़कियों के अभिभावकों ने उन पर विश्र्वास करते हुए उनके पक्ष में पहल की। उन्होंने कोई अवैधानिक हरकत नहीं की और झूठमूठ के सामाजिक भय के भी शिकार नहीं हुए। अभिभावकों ने वही किया जो उन्हें ऐसे मामले में करना चाहिए था। इस मामले में अभिभावकों ने समझ की परिपक्वता का परिचय दिया है। दूसरे यानी फाजिल्का के कॉलेज वाले मामले में चौकीदार ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। दुराचारी प्रिंसिपल द्वारा धमकी दिए जाने के बावजूद उसने न तो अपनी नौकरी की परवाह की और न ही किसी और बात की। उसे कोई और रास्ता नहीं सूझा तो उसने गांव के पूर्व सरपंच को फोन किया। पूर्व सरपंच ने पुलिस को सूचना दी और लड़कियों के लिए रात में सोने की व्यवस्था अपने गांव में बनाई। बाद में उन्होंने लड़कियों के अभिभावकों को भी सूचित किया और अंतत: उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कराई। बुनियादी तौर पर ये दोनों ही मामले केवल अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ने और कदाचार के ही नहीं, बल्कि विश्र्वासघात के भी हैं।


कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को यह मान कर विद्यालय नहीं भेजता है कि वहां उनके मान-सम्मान के साथ छेड़छाड़ होगी या उन्हें गलत रास्तों पर चलने के लिए उकसाया जाएगा। मूल रूप से सभी अपने बच्चों को स्कूल अच्छी शिक्षा प्राप्त करने और देश का सुयोग्य नागरिक बनने के लिए भेजते हैं। लेकिन शिक्षा के मंदिरों में ऐसे अराजक तत्वों को प्रवेश मिलना इस मूलभूत उद्देश्य में बाधक बन रहा है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अचानक आ गई है। पहले भी यह सब होता रहा है, लेकिन लोग कुछ तो भविष्य की चिंता और कुछ परिवारी की बदनामी के डर से ऐसे दुराचारी तत्वों के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते थे। अभी भी कुछ आवाजें इन्हीं वजहों से दब जाती हैं। पर अब ऐसी स्थितियों में दबने की जरूरत नहीं है। लोगों को इस संबंध में जागरूक बनाया जाना चाहिए कि वे ऐसी घटनाओं के खिलाफ तुरंत उठ खड़े हों। सच तो यह है कि ऐसे अराजक तत्व व्यवस्था में खामियों का उतना लाभ नहीं उठाते हैं, जितना हमारे सामाजिक-आर्थिक भय का। अगर हम अपने भीतर से भय निकाल दें और अन्याय व दुराचार के खिलाफ तन कर खड़े होना सीख जाएं तो इनकी दाल गलनी भी बंद हो जाएगी। व्यवस्था से यह मांग जरूर की जानी चाहिए कि वह शिक्षकों की चयन प्रक्रिया में पर्याप्त सतर्कता बरते, लेकिन इस मामले में केवल व्यवस्था से ही पूरी सुरक्षा व्यवस्था की उम्मीद नहीं की जा सकती है। क्योंकि शिक्षक भी मनुष्य है और व्यवस्था सिर्फ उसकी योग्यता ही परख सकती है। किसी के चरित्र को अंतिम रूप से परखना किसी भी प्रणाली के लिए संभव नहीं है। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि अगर व्यवस्था से भूलवश कोई गलती हो गई है तो हम हमेशा उसके दुष्परिणाम भुगतते रहें। ऐसे मामलों में हमें खुद जागरूकता का परिचय देना होगा और अगर आम आदमी अराजक और दुराचारी तत्वों के खिलाफ उठ खड़ा हो तो किसी भी व्यवस्था के बस की यह बात नहीं है कि वह उन्हें बचा ले।


लेखक निशिकांत ठाकुर दैनिक जागरण हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं




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