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लोकपाल विधेयक - सरकार की मंशा पर संदेह

Posted On: 23 Jun, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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लोकपाल कानून बनाने का प्रारूप तैयार करने के लिए गठित संयुक्त समिति की आखिरी बैठक बिना किसी नतीजे के खत्म हो गयी. सरकारी सदस्यों और सिविल सोसायटी के बीच प्रारूप के स्वरूप को लेकर सहमति नहीं बन पाई. आखिरकार दो ड्राफ्ट तैयार किए गए  जिसमें से एक में टीम अन्ना का मत शामिल है जबकि दूसरे में सरकार का. सरकार किसी भी हालत में मजबूत व सक्षम लोकपाल मशीनरी बनाने को तैयार नहीं जबकि सिविल सोसायटी इसके दायरे में प्रधानमंत्री सहित सभी सांसदों व उच्चतम न्यायपालिका को भी लाना चाहती है.


आज देश के सामने सवाल ये है कि आखिर क्यों सरकार जनहित की उपेक्षा करती नजर आ रही है. सरकार के सलाहकार मजबूत लोकपाल के विरुद्ध तर्क देते जा रहे हैं. उनका मत है कि एक मजबूत लोकपाल संवैधानिक रूप से उचित नहीं होगा और इससे संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है. यहॉ तक कि अन्ना और उनके साथियों पर लोकतंत्र को अपहृत करने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं.


संदेह होता है सरकार की नीयत पर. क्योंकर मजबूत लोकपाल जैसी भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम लगाने की मशीनरी का विरोध किया जा रहा है जबकि पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है. आज जबकि देश में हर नागरिक की यही मंशा है कि किसी भी तरह भ्रष्टाचार खत्म हो ताकि विकास के लाभ आमजन को मिल सकें,  ऐसे में कांग्रेस नीत सरकार का ये रवैया हतप्रभ करता है.


यदि सरकार को अपनी साख बचानी है और देश के बारे में कुछ बेहतर सोचना है तो उसे जनता की मांग पर ध्यान देना ही होगा, अन्यथा लोकतांत्रिक देश की जनता सरकार को सही दिशा देने में खुद ही सक्षम है.

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baijnath के द्वारा
June 30, 2011

लोकपाल बिल का जो प्रारूप हमारे विधिवेत्ताओं,समाजसेवियों तथा अन्य गणमान्य व्यक्तियों द्वारा प्रारम्भ में तैयार किया गया था वह सर्वप्रथम १९६८ में पारित होने के लिए` संसद में प्रस्तुत किया गया लोकसभा में पारित होने के पश्चात भी लोकसभा भंग हो जाने के कारण इस बिल का भविष्य खटाई में पड़ गया,तदोपरांत भी १९७१,,१९७७,१९८५,१९९६ ,१९९८,२००१,२००५ तथा २००८ में इसको आगे बढ़ाने के प्रयास हुए परन्तु कुछ तो प्रयास आधे अधूरे और कुछ खोटी नियत सत्ताधारियों की अतः इसकी यात्रा अधर में ही लटकी रही. लोकपाल बिल का स्वरूप इस प्रकार था इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा। यह संस्था चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी। किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा। भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को 2 साल के भीतर जेल भेजा जाएगा। भ्रष्टाचार की वजह से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा। अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा। लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा। सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा। लोकपाल को किसी भी भ्रष्ट जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी। सम्पूर्ण मशीनरी के आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाने के कारण कुछ विचारकों ऩे भ्रष्टाचार के विरोध में झंडा उठाया और सक्रिय हुए.वेबसाईट,समाचारपत्र तथा अन्य माध्यमों से यह मुहीम आगे बढी तथा इसका संशोधित रूप तैयार किया गया.


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