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भारत के लिए सक्रियता का समय

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“भारत सरकार से पाकिस्तान के संदर्भ में अपनी लचर कूटनीति छोड़ने की अपेक्षा कर रहे हैं तरुण विजय”


क्या लोक लेखा समिति पर असंवैधानिक हमला करने वाले शासकों से कश्मीर की मर्यादा की रक्षा की उम्मीद की जा सकती है? कश्मीर घाटी में भारतीयता को जिस प्रकार अपमानित किया जा रहा है उसके प्रति राष्ट्र की सवेदनहीनता आसन्न सकट का ही प्रतीक कही जा सकती है। एक नवीन उदाहरण श्रीनगर से कश्मीरी हिंदू युवक सुशील रैना के आकस्मिक गायब होने का है। वह विश्वकप क्रिकेट के समय श्रीनगर में था और स्वाभाविक रूप से भारत की विजय की बात करता था, लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम जिहादी घाटी में भारत की हार के लिए सार्वजनिक दुआएं कर रहे थे और पाकिस्तान कीजीत के लिए एक घटिया देशद्रोही वातावरण बना रहे थे। उसी दौरान अचानक सुशील रैना गायब हुआ और घर नहीं लौटा। यह इस देश की आत्मघाती सेक्युलर राजनीति और नेताओं की आंखों के आगे छाए धन और चाटुकारिता के परदे का नतीजा है कि आज तक किसी ने रैना के गायब होने की जाच के लिए आवाज तक नहीं उठाई। पाच लाख हिंदू कश्मीरियों के अपमानजनक निर्वासन के बाद एक हिंदू जिंदा है या मारा गया, इसे जानने की फुर्सत दिल्ली को कहां?


कश्मीर के साथ छल हो रहा है। रही-सही कसर केंद्र के विदूषक समान वार्ताकारों ने पूरी कर दी। वार्ताकारों के प्रमुख दिलीप पडगांवकर ने श्रीनगर से एक बयान दिया कि जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। इससे पहले वह यह भी कह चुके हैं कि प्रदेश में मुख्यमत्री के लिए वजीरे आजम तथा राज्यपाल के लिए सदरे रियासत के पद नाम पुन: प्रारंभ किए जा सकते हैं। ये दोनों ही बातें शेष देश के साथ कश्मीर के जुड़ाव को बढ़ाने के बजाय अलगाववादियों का स्वर मजबूत करने वाली हैं। बजाय इसके कि ये तथाकथित वार्ताकार जम्मू-कश्मीर में देशभक्त हिंदू-मुसलमानों की आवाज मजबूत करें, वे उनका साथ दे रहे हैं जो पाकिस्तानपरस्त हैं। इसी के साथ समाचार मिला है कि जम्मू-कश्मीर सरकार अमरनाथ यात्रा की अवधि 15 दिन कम करने वाली है। इसके लिए राष्ट्रघातक तत्व पहले से ही आवाज उठाते रहे हैं। यदि यह किया गया तो पुन: इसके विरुद्ध पूरे देश में गभीर प्रतिक्रिया होगी। वास्तव में संप्रग सरकार का कश्मीर पर रवैया बहुत सतही तथा राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाला रहा है। एक विराट राष्ट्र अपनी जय-पराजय के प्रश्न को किस प्रकार 11 खिलाड़ियों की टीम से साधने का प्रयास करता है, उसका उदाहरण सप्रग सरकार की ‘क्रिकेट-कूटनीति’ के हास्यास्पद प्रयास से देखने को मिला। क्रिकेट कूटनीति और पाकिस्तान से शाति वार्ता का नया दौर कुछ समय से हो रहा है। मुंबई पर 26/11 के हमले में एक मुख्य आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा ने अमेरिकी अदालत में स्वीकार किया कि मुंबई हमले के लिए हथियार और अन्य साजोसमान पाकिस्तान सरकार तथा उसकी कुख्यात गुप्तचर एजेंसी आइएसआइ ने दिए थे, न कि लश्कर या अन्य आतकवादी सगठनों ने। इस बारे में भारत सरकार ने पाकिस्तान से हालाकि स्पष्टीकरण भी मागा है, लेकिन इसके बावजूद वह ‘अमन की बातचीत’ के लिए भी कदम बढ़ाने को उत्सुक है।


उल्लेखनीय है कि इसी सरकार ने 26/11 के हमले में पाकिस्तानी अपराधियों की पूरी सूची और उनकी हरकतों के प्रमाण के 12 दस्तावेज पाकिस्तान सरकार को भेजे हैं। इनमें से छह दस्तावेजों में उन पाकिस्तानी नागरिकों के बारे में जानकारी है जिनका 26/11 में सीधा हाथ था और बाकी छह में पाकिस्तानी जमीन पर भारत के विरुद्ध षड्यंत्रों की तैयारियों तथा प्रशिक्षण के प्रमाण दिए गए थे। विश्वकप में पाकिस्तानी प्रधानमत्री यूसुफ रजा गिलानी के आने के बावजूद वहा की सरकार ने भारत द्वारा दिए गए विवरण तथा दस्तावेज न सिर्फ ‘अपर्याप्त’ बताए, बल्कि स्पष्ट रूप से भारत की एजेंसियों को पाकिस्तान में उन अपराधियों से पूछताछ की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया, जो वह अमेरिका को निरंतर देती है। पाकिस्तान से वार्ता का जुनून इस सरकार को बार-बार क्यों चढ़ता है? जबकि मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम तथा एसएम कृष्णा पिछले एक वर्ष में समय-समय पर यह बयान दे चुके हैं कि पाकिस्तान विश्वव्यापी आतकवाद की मुख्य धुरी है। प्रधानमत्री डॉ. मनमोहन सिह ने गत वर्ष कहा था, ‘जब तक पाकिस्तान के शब्दों और कार्रवाई में भेद नहीं खत्म होता तब तक वार्ता व्यर्थ है, पर प्रधानमत्री बार-बार पाकिस्तान को आतकवाद को बढ़ावा देने वाला देश बताकर भी उससे वार्ता की पेशकश कर बैठते हैं, जो कूटनीतिक क्षेत्रों में अमेरिकी दबाव का असर बताया जाता है।


हाल ही में भारतीय सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख ले. जनरल केटी पटनायक ने जब चिता व्यक्त की कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में दस हजार से ज्यादा चीनी सैनिकों की उपस्थिति से हमारी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है तो एक बार पुन: उबाल उठा, पर वह भी चाय की प्याली तक सीमित रहा। प्रधानमत्री ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन गए तो वहा चीन के साथ रक्षा वार्ताओं के क्रम को पुन: प्रारंभ करने की घोषणा कर आए, जबकि उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ से बातचीत में गुलाम कश्मीर में चीनी उपस्थिति का जिक्र करेंगे और लेफ्टिनेंट जनरल जसवाल को वीजा देने से इनकार करने जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने देने का आश्वासन प्राप्त करेंगे। वास्तव में पाकिस्तानी कब्जे वाले गुलाम कश्मीर में चल रहे भारत विरोधी आतकी शिविर तथा चीनी मसूबे परास्त करने का एकमात्र उपाय है कि भारत को खुले तौर पर वह हिस्सा वापस लेने की माग करनी चाहिए तथा पाकिस्तान के साथ हर वार्ता में ससद द्वारा पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव का हवाला देते हुए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहिए ।


[लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं]


साभार : ज़ागरण नज़रिया


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