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आंदोलन के बाद की आशंकाएं

Posted On: 11 Apr, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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चार दिनों से दिल्ली के जंतर मंतर पर जारी बुजुर्ग समाजसेवी अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल को लेकर जारी आमरण अनशन खत्म हो गया। अन्ना के अनशन और देशभर में उसे मिल रहे अपार जनसमर्थन को देखकर सरकार के हाथ-पांव फूल गए। भारत सरकार के कर्ता-धर्ता और वरिष्ठ मंत्रियों के बीच कई दौर की बातचीत के बाद अन्ना की सभी मांगें मान ली गई। चार दिन तक चले एक व्यक्ति के आंदोलन ने भारत सरकार को जनता की भावनाओं को समझने और अन्ना की मांग मानने के लिए मजबूर कर दिया। दो दिन पहले जिस सरकार की एक वरिष्ठ मंत्री अंबिका सोनी दहाड़ते हुए बयान दे रही थीं कि चंद मुट्ठीभर लोगों के दबाव में सरकार झुकने वाली नहीं है, उन्हीं चंद मुट्ठीभर लोगों ने सरकार से अपनी सभी मांगे मनवा ली। अन्ना के आह्वान पर देशभर में जिस तरह से हर वर्ग के लोग स्वत:स्फूर्त घर से बाहर आंदोलन के लिए निकले, वह इस अनशन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


वैश्वीकरण के इस दौर में कई विद्वानों की राय थी कि जिस तरह से देश का नया मध्यवर्ग बाजार के प्रभाव में है, उसमें वह सिर्फ अपने बारे में सोचता है और उसके सामाजिक सरोकार खत्म हो गए हैं। आम जनता से जनआंदोलन की अपेक्षा करने की तो वह सोच भी नहीं सकते थे। नतीजा यह हुआ कि देश के नेताओं के मन में जनादेश को लेकर जो आदर होना चाहिए था, वह खत्म होने लगा था। जनता का डर कम होने के इस भाव से नेताओं के मन में यह बैठ गया कि वह कुछ भी करके बेदाग निकल सकते हैं। जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों-करोड़ों रुपये डकार कर भी वह मजे में रह सकते हैं। उनके मन से जनता का डर और आमजन के प्रति आदर का भाव खत्म होने लगा था, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत था।


लेकिन अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि अगर कोई विश्वसनीय व्यक्ति जनता से जुड़े मुद्दे को लेकर खड़ा होता है तो देश की जनता का न केवल उसे समर्थन मिलता है, बल्कि देश के हर तबके का आदमी उसकी एक आवाज पर घर से निकल कर उसके कदम से कदम मिलाकर सरकार से लोहा लेने तो भी तैयार हो जाते हैं। अन्ना के अनशन ने एक बार फिर से देश के नेताओं में जनता के लिए आदर और जनता का डर कायम कर दिया। अन्ना का अनशन खत्म हो गया। देशभर में अभी जीत का जश्न मनाया जा रहा है। लोगों को लग रहा है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जंग जीत ली है। दरअसल, पूरा भारतीय मानस जो है, वह बेहद इमोशनल है। एक छोटी-सी उपलब्धि में भी वह मानस जश्न में डूब जाता है, लेकिन जीत के इस जश्न के बीच कई सवाल भी मुंह बाए खड़े हो गए हैं। सबसे पहला और बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अन्ना के इस अनशन से हासिल क्या हुआ। अगर हम ऊपरी तौर पर देखें तो लगता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता को बड़ी जीत और कामयाबी हासिल हुई है। देश में इस तरह का एक वातावरण बन गया है, जिसमें आम जनता को लगने लगा है कि लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा हथियार बनने जा रहा है, जिससे भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का वध संभव हो सकेगा। लेकिन क्या सचमुच ऐसा संभव हो पाएगा।


अगर कुछ देर के लिए यह मान लिया जाए कि जन-दबाव में प्रधानमंत्री, मंत्री और देश के आला अफसर लोकपाल के दायरे में आ जाते हैं और लोकपाल को किसी को मुजरिम करार देकर सजा देने का अधिकार भी दे दिया जाता है तो क्या इससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा? अगर यह मान भी लिया जाए कि माथापच्ची के बाद बिल को कानूनी जामा पहनाकर लागू कर दिया जाता है तो क्या सिर्फ कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा, लेकिन सिर्फ कानून बना देने भर से जुर्म कम नहीं होता। जरूरत होती है कानून को सही तरीके से लागू करने की और ऐसा वातावरण तैयार करने की, जिसमें मुजरिमों के मन में कानून का भय पैदा हो जाए। भ्रष्टाचार से निबटने के लिए हमारे देश में पहले से प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट है। उसमें भी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कई सख्त प्रावधान हैं तो कई खामियां भी हैं।


जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए एक नया कानून बनाने के बजाए वर्तमान में लागू कानून की कमियों को दूर किया जाए। जैसे अफसरों या मंत्रियों को आरोपी बनाने के पहले जो इजाजत लेने का प्रावधान है, उसे खत्म किया जाना चाहिए। वर्तमान कानून में स्पेशल जज से सुनवाई का प्रावधान है, लेकिन बहुधा ऐसा हो नहीं पाता है। जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को तेज किया जाए और दोषी को जल्द से जल्द सजा दिलवाई जाए। एक और अहम सवाल उठता है कि क्या इतनी आसानी से लोकपाल को इतने तरह के अधिकार दिए जा सकते हैं? देश के मौजूदा कानून और संवैधानिक संस्थाओं को संविधान से मिले अधिकारों के मद्देनजर यह इतना आसान नहीं है। इसमें कई संवैधानिक अड़चनें आएंगी।


ड्राफ्ट कमेटी का गठन जितनी आसानी से नोटिफाई हो गया है, प्रस्तावित बिल का मसौदा बनाने में उतनी ही दिक्कते आएंगी। लोकपाल बिल के कानून बनने के बाद भी हर आरोपी के पास राइट टू अपील तो होगा ही। किसी भी तरह के कानून से अपील के इस अधिकार को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही ऐसा किया जाना चाहिए, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक बात होगा। राइट टू अपील आरोपी के हाथ एक ऐसा अधिकार है, जिसका इस्तेमाल करके वह लंबे समय तक खुला घूम सकता है। संसद और विधानसभा का सदस्य बन सकता है। देश का कोई भी कानून आरोपी को चुनाव लड़ने से नहीं रोकता है। एक अजीब विडंबना और भी है कि अगर कोई संसद सदस्य या मंत्री या विधानसभा का सदस्य किसी जुर्म में दोषी भी करार दे दिया जाता है तो उसकी सदस्यता खत्म नहीं होती है और सिर्फ आरोपी है तो वह ठाठ से लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर का सम्मानित सदस्य बना रह सकता है। जरूरत इस बात की है कि इस तरह के कानूनों में संशोधन किया जाए। अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी है तो न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने और मुकदमों के जल्द से जल्द निबटारे की आवश्यकता है, जिसकी ओर अन्ना को ध्यान देना चाहिए था। इस मामले में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बेहद अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। वहां के अपराधियों के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द मुकदमे का निबटारा करवाया और मुजरिमों को सजा मिली। नतीजा यह हुआ कि सूबे में लोगों के मन में कानून के प्रति एक विश्वास जगा और अपराधियों के मन में कानून का भय।


अंत में एक बात और कि अन्ना को इस अनशन के दौरान कई उत्साही लोगों ने छोटे गांधी कह डाला, लेकिन गांधी और अन्ना में बुनियादी अंतर है। गांधी हमेशा व्यक्ति में बदलाव की बात करते थे और अन्ना संस्थागत बदलाव की बात करते हैं। गांधी हमेशा आदर्श स्थिति और रामराज्य की कल्पना करते थे। उनका मानना था कि लोगों का मन इतना साफ हो कि वे भ्रष्टाचारी बनें ही नहीं। जबकि अन्ना हजारे कानून बनाकर उसे रोकने की बात करते हैं। गांधी का लक्ष्य और आदर्श दोनों बेहद बडे़ थे। इसलिए गांधी से अन्ना की तुलना बेमानी है, लेकिन उत्साह में बहुधा तुलना में गलती हो जाती है।


अनंत विजय: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं


साभार: दैनिक जागरण ई पेपर

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