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शासन तंत्र की ईमानदारी

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देश का नागरिक आज पशोपेश में है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिह की व्यक्तिगत ईमानदारी निर्विवादित है, परंतु उनके नेतृत्व में चल रही संप्रग सरकार में भ्रष्टाचार का शीर्ष पर होना भी उतना ही निर्विवादित है। इस अंतर्विरोध को कैसे समझा जाए? विषय ईमानदारी को पारिभाषित करने का है। सामान्य तौर पर ईमानदारी को व्यक्तिगत सच्चाई के तौर पर समझा जाता है। जैसे कोई व्यक्ति कहे कि मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा और वह रुपये दे दे अर्थात यदि व्यक्ति अपने कथन के अनुरूप आचरण करे तो उसे ईमानदार कहा जाता है, परंतु चोर यदि कहे कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो उसे ईमानदार नहीं कहा जाता है यद्यपि वह अपने कथन के अनुरूप आचरण कर रहा है। दरअसल, ईमानदारी के दो पहलू होते हैं-व्यक्तिगत एव सामाजिक। ईमानदार उसी को कहा जाना चाहिए जो अपने विचारों के प्रति सच्चा होने के साथ-साथ समाज के प्रति भी सच्चा हो।


स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित दर्शनशास्त्र के विश्वकोष में इस संदर्भ में रोचक उदाहरण दिए गए हैं। यदि व्यक्ति कहे कि वह विलासिता के सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करता है तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? अथवा व्यक्ति कहे कि धन संचय करने के लिए वह न्याय, मित्रता अथवा सत्य को बाधा नहीं बनने देता है तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? या फिर नाजी समर्थक यदि ईमानदारी से यहूदियों का सफाया करे तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? तात्पर्य यह कि ईमानदार कहलाने के लिए सामाजिक ईमानदारी जरूरी है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री की ईमानदारी कैबिनेट की ईमानदारी में दिखनी चाहिए।


ईमानदार व्यक्ति के आचरण का परिणाम भी ईमानदार होना चाहिए। जैसे चोर ईमानदारी से चोरी करे तो उसका सामाजिक परिणाम झूठा हो जाता है इसलिए चोर को ईमानदार नहीं कहा जाता है। ईमानदार व्यक्ति की समाज के प्रति जवाबदेही भी होती है। जैसे ईमानदार व्यक्ति को बताना होगा कि उसके पास संचित धन का श्चोत क्या था? इसी प्रकार कैबिनेट के मुखिया प्रधानमंत्री को कैबिनेट मंत्रियों द्वारा संचित धन के श्चोतों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।


समस्या तब विकट हो जाती है जब नेता दो में से केवल एक मानदंड पर खरा उतरता है। तब हमें चयन करना पड़ता है कि व्यक्तिगत ईमानदारी को ज्यादा महत्व दिया जाए अथवा नीतिगत ईमानदारी को? मुझे मनमोहन सिह की नीतिया ईमानदार नहीं लगती हैं। उनकी सरकार ने सर्वत्र बड़ी-बड़ी कंपनियों को छूट दे रखी है। ये कंपनिया आम आदमी को मनमोहन सिह की छतरी तले कुचल रही हैं और मनमोहन सिह के कानों पर जूं भी नहीं रेंग रही है। पॉस्को स्टील प्लाट एव जैतापुर परमाणु सयत्र को जनता के घोर विरोध के बावजूद स्वीकृति दे दी गई है। देश के हितों को किनारे करते हुए अमेरिकी दबाव में ईरान से तेल की पाइपलाइन की योजना को ढीला छोड़ दिया गया है। प्रधानमंत्री के लिए देश हित से ज्यादा महत्वपूर्ण गांधी परिवार है। जनता को राहत पहुंचाने के नाम पर प्रधानमंत्री सरकारी कर्मचारियों की भ्रष्ट एव स्वार्थी फौज खड़ी कर रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत जनता में ठाले बैठे रहकर आय अर्जित करने की प्रवृत्ति घर कर रही है। खाद्यान्न के घरेलू दाम ऊंचे होने पर इसका आयात करके किसान को लाभ कमाने से वचित किया जा रहा है। गरीब द्वारा खरीदे गए पंखे और अमीर द्वारा खरीदे गए एयर कंडीशनर पर एक ही दर से टैक्स लगाया जा रहा है। संपूर्ण पहाड़ी गगा पर बाध बनाकर मृतकों की अस्थियों को सड़े हुए पानी में विसर्जित करने को बाध्य करने की योजना है। देश के आदिवासी क्षेत्रों में वनकर्मियों एव ठेकेदारों के माफिया से त्रस्त जनता को राहत देने के स्थान पर सेना से कुचलवाने की मुहिम चलाई जा रही है। हमारे ईमानदार प्रधानमत्री द्वारा ऐसी नीतिया लागू की जा रही हैं जो देश के ऊपरी और मध्यम वर्ग-मुख्यत: सरकारी कर्मियों-के लिए लाभप्रद हैं, जबकि आम आदमी के लिए हानिप्रद।


मेरी समझ से मनमोहन सिह द्वारा प्रमुख जनहितकारी कार्यो में सूचना का अधिकार लागू करना है। ऋण माफी, रोजगार गारंटी, शिक्षा का अधिकार आदि केवल दिखावटी रूप से जनहितकारी है। जिन कारणों से किसान ऋणों से दबे हैं, श्रमिक रोजगार से वचित हैं और गरीब शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे हैं उन कारणों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। हां, इतना जरूर है कि वह आर्थिक विकास दर बढ़ाने के लिए घरेलू बड़ी कंपनियों को छूट देने को आतुर हैं।


मनमोहन सिह की इस नीति का अंतिम आकलन परिणाम से किया जाना चाहिए। इस समय देश में माओवादी, आरक्षण, भूमिपुत्र आदि आंदोलन पैठ कर रहे हैं। भ्रष्टाचार एव असतोष का वातावरण बन रहा है। अत: मुझे मेरे द्वारा किया गया आकलन ठीक लगता है। फिर भी हर कोई ईमानदारी के मूल विषय पर अपने ढंग से विचार करने के लिए?स्वतंत्र है।? क्या कारण है कि व्यक्तिगत रूप से ईमानदार मनमोहन सिह के नेतृत्व में सामाजिक झूठ पनप रहा है?


व्यक्तिगत और नीतिगत ईमानदारी के भेद को एक प्रसग से समझा जा सकता है। किसी समय इंद्र और वृत्तासुर के बीच युद्ध हुआ था। इंद्र यज्ञ करते थे। यहा यज्ञ का अर्थ निवेश से लिया जाना चाहिए। इंद्र ने पहाड़ों को समतल करके खेती करने योग्य बनाया। उनके साथी मरुद् गणों ने व्यापार किया। इंद्र की नीतिया विकासोन्मुख और समाज के लिए हितकारी थीं। इसके विपरीत वृत्तासुर यज्ञ नहीं करता था यानी निवेश नहीं करता था। संभवत: वह समाज की यथास्थिति बनाए रखता था, जैसा सामंतवादी जमींदारों द्वारा किया जाता है। अत: नीतिगत स्तर पर वृत्तासुर पीछे था, परंतु व्यक्तिगत स्तर पर परिस्थिति बिल्कुल विपरीत थी। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में कहा गया है कि वृत्तासुर तीनों लोकों को आत्मीय समझ कर प्यार करता था। वह स्थिर प्रज्ञ था। लोक में उसका बड़ा आदर था। अर्थात व्यक्तिगत स्तर पर वृत्तासुर ईमानदार था। व्यक्तिगत स्तर पर इंद्र चचल थे। उन्होंने तपस्या में लीन वृत्तासुर का छल-कपट से वध किया।


वृत्तासुर व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदार और सामाजिक स्तर पर जड़ था। इंद्र व्यक्तिगत स्तर पर चचल, किंतु सामाजिक स्तर पर सकारात्मक थे। हमारी परंपरा में इंद्र को पूजा जाता है, न कि वृत्तासुर को। निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक नीतिया प्रमुख होती हैं और व्यक्तिगत ईमानदारी का दर्जा नीचे है। यही मनमोहन सिंह की समस्या है। वह नुकसानदेह सामाजिक नीतियां लागू कर रहे हैं अत: उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी का महत्व नहीं रह जाता है।


[डॉ. भरत झुनझुनवाला: लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

साभार: जागरण नज़रिया

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

VinayBhatt के द्वारा
April 6, 2011

आदरणीय भरत जी नमस्कार. ..ऐंसी सरकारों को चुनने के लिए इस देश के नागरिकों हेतु एक शेर की एक लाइन याद आ रही है कि… ” मुल्क उस बिरहमन कि तरह अपने किये पे परेशां है..”.. जंगल में एक ब्रह्मण को पिंजरे में बंधे शेर पर दया आ गयी और उसने उसे आजाद कर दिया ..लेकिन शेर उशी को खाने कि सोचने लगा..तब ब्रह्मण को समझ आया कि उसने गलती कि है..एक लोमड़ी कि चतुराई ने उस ब्रह्मण को बचाया…. इस देश कि जनता तो वोटिंग मशीन में नेकी का बटन दबा के आई थी फिर ये बड़ी उनके हाथ क्यों आ रही है..सरकार में आते ही नेता कैसे भी हो जनता को लूटने कि सोचने लगते हैं…और वोते मांगने के समय बड़े बड़े वादे किये जाते हैं ..किसी ने सही कहा है कि .. नेता रोये पांच दिन और जनता रोये पांच साल..

pramod kumar chaubey के द्वारा
April 5, 2011

आदरणीय डॉ. भरत झुनझुनवाला जी  सादर प्रणाम   ईमानदारी को हमें ईमान से जोड़कर समझने की जरूरत है।  ईमान या सत्य परिवर्तनशील नहीं हैं। समय, स्थान में बदलाव संभव है। ईमान चाहे व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक, उसमें बदलाव  नहीं होता। अगर हम बदलाव देख रहे हैं तो ईमान के बजाय और कुछ हो सकता है। माननीय मनमोहन की ईमानदारी परिवार के लिए ठीक हो सकती है पर प्रधानमंत्री मनमोहन की ईमानदारी देश के भ्रष्ट अन्य नेताओं के कारण उपयुक्त नहीं कही जा सकती है। प्रमोद कुमार चौबे ओबरा सोनभद्र 


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