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भ्रष्टाचार से जमीनी संघर्ष

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अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं व विद्वजनों के साथ अन्ना हजारे भी एक दिसंबर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लोकपाल बिल लाने की गुहार लगा रहे थे, किंतु प्रधानमंत्री ने एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया। थक-हार कर जब अन्ना हजारे ने आमरण अनशन की घोषणा की तब जाकर प्रधानमंत्री ने उन्हें बातचीत के लिए बुलाया। दोनों के बीच 7 मार्च को बैठक हुई। अन्ना के साथ आंदोलनरत दस और लोग थे। भारत के प्रसिद्ध कानूनविद शांतिभूषण ने प्रधानमंत्री से कहा-मैं वकील होने के साथ-साथ कानून मंत्री भी रह चुका हूं। मैंने जन लोकपाल विधेयक का अध्ययन किया है। यह अब तक का सबसे बेहतरीन कानूनी दस्तावेज है। अगर यह कानून लागू कर दिया जाता है तो पांच से दस साल के भीतर भ्रष्टाचार में काफी कमी आ जाएगी। प्रधानमंत्री को यह भी बताया गया कि जन लोकपाल बिल का प्रारूप देश के सबसे योग्य कानूनविदों, प्रशासकों और जांचकर्ताओं ने तैयार किया है। इंटरनेट पर लोगों से मिले सुझावों तथा सार्वजनिक चर्चाओं के आधार पर इस बिल के प्रस्ताव को दसियों बार संशोधित किया जा चुका है। अब कहा जा सकता है कि बिल का मसौदा असल में भारत के लोगों द्वारा तैयार किया गया है।


अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री से कहा कि जब बकौल राजीव गांधी देश के कुल सरकारी खर्च का 85 प्रतिशत हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है तो ऐसे में बजट का क्या मतलब रह जाता है। इस पर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया कि 13 मई तक उनके पास इस बिल को देखने का समय नहीं है। पहले तो वह बजट सत्र में व्यस्त रहे और इसके बाद चुनावों में। कितने आश्चर्य की बात है कि एक ऐसे समय जब पूरा देश भ्रष्टाचार को लेकर आक्रोशित है, फिर भी प्रधानमंत्री के पास भ्रष्टाचार से निपटने का समय ही नहीं है। ऐसे में वह लोगों के पास जाकर उनसे वोट मांगने की सोच भी कैसे सकते है! काफी जोर देने पर प्रधानमंत्री सहमत हुए कि मानसून सत्र में लोकपाल विधेयक पेश किया जाएगा। अगला सवाल था-कौन सा लोकपाल बिल पेश किया जाएगा? प्रधानमंत्री को बताया गया था कि लोकपाल बिल का सरकारी प्रारूप बहुत खराब है। इस बिल को तैयार करने वाले मंत्रियों के समूह में कुछ मंत्रियों की भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि को देखते हुए बिल से कुछ उम्मीद की भी नहीं जा सकती।


बैठक में वीरप्पा मोइली भी शामिल थे। उन्होंने सुझाव दिया कि मंत्रियों की एक उप समिति बना दी जाए, जो इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों के साथ दो बार वार्ता करेगी, उनसे सुझाव लेगी और यह तय करेगी कि इन सुझावों में से किन सुझावों को बिल में शामिल किया जाए। इसके बाद उप समिति मंत्रियों के समूह के समक्ष अपनी रिपोर्ट रखेगी। मंत्रियों का समूह लोकपाल बिल का अंतिम मसौदा तैयार करेगा और इसे मानसून सत्र में पेश किया जाएगा। अन्ना ने मांग रखी कि एक संयुक्त समिति गठित की जाए और वही लोकपाल बिल का प्रारूप तैयार करे। इसके आधे सदस्य नागरिक समाज से होने चाहिए। यह समिति जन लोकपाल बिल को कार्यकारी प्रारूप मानते हुए काम करे। पहले भी संयुक्त समितियों का गठन होता रहा है। महाराष्ट्र में कम से कम सात कानून इसी तरह से बनाए गए है। कुछ साल पहले जब 25,000 आदिवासी दिल्ली आए थे तो सरकार ने उसी दिन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में संयुक्त समिति गठित कर दी थी। यद्यपि प्रधानमंत्री ने आज तक इस समिति की एक भी बैठक नहीं बुलाई है। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सरकार को इस प्रकार की संयुक्त समिति गठित करने से रोके, लेकिन प्रधानमंत्री ने संयुक्त समिति गठित करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने जोर दिया कि मंत्रियों की उप समिति और मंत्रिसमूह ही लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करेगा।


लोकपाल बिल 1968 से संसद में लंबित है। इसे संसद में कई बार पेश किया गया है, किंतु अभी तक पारित नहीं हो पाया है। अब तक संसद में पेश सभी लोकपाल बिल बेहद कमजोर थे। उन्हे भी हमारे माननीय सांसदों ने पारित नहीं होने दिया। इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ तंत्र विकसित करने में राजनेता ही सबसे बड़ी बाधा है। उन्हे डर है कि ऐसा बिल पारित होने पर उनके तमाम काले कारनामे एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के दायरे में आ जाएंगे।


पिछले अनुभवों को देखते हुए हम संबंधित मंत्रिसमूह से कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वह भ्रष्टाचार रोधी कानून बनने से अपने आप पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष और विपरीत प्रभाव के लिए तैयार हो जाएगा और पूरी सत्यता व ईमानदारी से प्रभावी लोकपाल कानून का प्रारूप तैयार करेगा। अभी मंत्रिसमूह ने लोकपाल बिल का जो प्रारूप तैयार किया है यदि उसे लागू किया जाता है तो यह भ्रष्ट लोगों को दंडित करने की बजाय उन्हें संरक्षण ही अधिक देगा। इसलिए हर किसी को संदेह है कि क्या गठित मंत्रिसमूह कभी भी मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून का सुझाव दे सकेगी। यह बहुत दुखद है कि सरकार शांतिभूषण, प्रशांतभूषण, जस्टिस संतोष हेगड़े, जेएम लिंगदोह जैसे ख्यातिलब्ध लोगों की नि:शुल्क सेवा लेने से इनकार कर रही है। स्वाभाविक है कि सलाह लेना सिर्फ एक औपचारिकता भर है। लोकपाल बिल पर पिछले 42 वर्ष का अनुभव यही बताता है कि भ्रष्ट पृष्ठभूमि वाले हमारे कुछ तथाकथित ईमानदार मंत्रिगण जो अंतिम प्रारूप लाएंगे वह जन लोकपाल बिल से काफी कमजोर होगा। यह हमारा जीवन है जो दांव पर है। यह हमारा धन है जो लूटा जा रहा है। सब जानते है कि राजनेता और नौकरशाह भ्रष्ट उद्योगपतियों के साथ मिलकर इस लूट को अंजाम दे रहे हैं। ये लोग कभी भी मजबूत भ्रष्टाचाररोधी कानून खुद से नहीं पारित करने वाले।


आज देश भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मजबूत कार्रवाई की अपेक्षा कर रहा है, न कि समिति के ऊपर नई समितियों के गठन का अनवरत सिलसिला। सरकार से इस बात को मनवाने के लिए अन्ना हजारे पांच अप्रैल से अनशन करने जा रहे हैं। उन्होंने पूरे देश से अपील की है कि सभी लोग कम से कम एक दिन अनशन रखें। उन्होंने प्रधानमंत्री, सोनिया गांधी समेत दूसरे तमाम राजनेताओं को इस दिन अनशन करने और भ्रष्टाचारमुक्त भारत के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित किया है। 73 वर्ष की उम्र में अन्ना खुद अपने लिए जीवन का दांव नहीं लगा रहे हैं। वह हमारे-आपके लिए और भविष्य के हमारे बच्चों के लिए अनशन कर रहे हैं। जब वह अनशन पर बैठे होंगे तो क्या आप अपने घरों में बैठना पसंद करेंगे? मैं उनके साथ जंतर-मंतर पर उपस्थित रहूंगा। मेरी आप सबसे यही प्रार्थना है कि अपने काम से कुछ समय निकालकर हमारे साथ जंतर-मंतर पर शामिल हों।


[अरविंद केजरीवाल: लेखक मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता हैं]

साभार: जागरण नज़रिया

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pramodchaubey के द्वारा
April 1, 2011

आदरणीय अरविंद केजरीवाल जी,  सादर प्रणाम भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे का आमरण अनशन स्तुत्य है, वन्दनीय है। पूज्यनीय गांधी बाबा के बेहतर  हथियार का इस्तेमाल करने जा रहे अन्ना जी को सूर्य  और चन्द्रमा की उम्र पहले ही मिल चुकी है। भविष्य में  शारीरिक तौर पर हमारे बीच न होते हुए भी वे सदैव हम  सबके बीच रहेंगे। शऱीर तो सभी को त्यागना है, उसकी बातें हम नहीं करते और न ही राष्ट्र हित में अन्ना जी को  शरीर से कोई मतलब होगा पर हमारी(देशवासियों की) बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। देश के प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय में आरक्षण सुधार के सवाल पर देश के सैकड़ों युवाओं ने आत्मदाह(अहिंसात्मक आंदोलन का चरमोत्कर्ष) तक किया। इसके बाद के आन्दोलनों में बड़े पैमाने पर आत्मदाह जैसी घटनाएं नहीं हुई। इसे हमारे जैसा व्यकि्त अच्छा मानता है पर क्या आन्दोलन थम गये…. नहीं व्यवस्था के खिलाफ अब भी आन्दोलन हो रहे हैं पर इस व्यवस्था पर भरोसा  छोड कर…. अरब देशों की क्रांतियां और देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना जी की भूख हड़ताल में साम्यता की संभावनाओं (आजादी के पूर्व चौरा चौरी काण्ड जैसे परिवेश) से इंकार नहीं किया जा सकता है…वहीं संभव है कि अन्ना जी के  आमरण अनशन से युवाओं में फिर से भूख  हड़ताल से व्यवस्था में बदलाव के विश्वास जगे।  कुछ सवाल हैं- (1)भ्रष्टाचार में डूबी हुकूमत भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ निणार्यक कदम बढ़ा सकेगी. (2) क्या आदरणीय अन्ना जी का जीवन यूपीए के जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है. भूख हड़ताल के फैसले पर कुछ नहीं कहना है,  क्योंकि फैसला अन्ना जी ने ले लिया है।  नई सुबह की उम्मीद में….. मेरी बातें पूज्यनीय  अन्ना जी तक अवशय पहुंचाने की कृपा करें। भ्रष्टाचार के खिलाफ पूज्यनीय अन्ना जी को  मेरा युगों-युगों तक  समर्थन. प्रमोद कुमार चौबे ओबरा सोनभद्र मो.09415362474


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