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सच से डरे हुए शासक

Posted On: 23 Mar, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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विकिलीक्स ने एक बार फिर भारत के भ्रष्ट और झूठे नेताओं के चेहरे बेनकाब कर दिए हैं और सत्ता पक्ष के पास अपनी निर्लज्जता छिपाने के लिए लोकोक्ति के अनुसार सूखे पत्ते तक का सहारा नहीं बचा है। विकिलीक्स के केबल भले ही दुनिया में गलत आचरण करने वाले शासकों के महलों में खलबली मचा रहे हों, लेकिन आज तक किसी ने भी उनकी सत्यता या प्रमाणिकता पर सदेह नहीं किया। केवल भारत के प्रधानमत्री डॉ. मनमोहन सिह ने एक हास्यास्पद बयान दिया, जिसमें न केवल उन्होंने विकिलीक्स पर संदेह किया, बल्कि यह तक कह दिया कि सांसदों को रिश्वत देने के मामले की जांच के लिए गठित समिति ने यह निष्कर्ष निकाला था कि सांसदों को रिश्वत देने का कोई प्रमाण नहीं मिला है।


उन्होंने यहां तक कह दिया कि यह मामला 14वीं लोकसभा से जुड़ा था। उसके बाद इसी मुद्दे को लेकर जो दल चुनाव में उतरे वे जनादेश प्राप्त नहीं कर सके और कांग्रेस को उनसे ज्यादा सीटें मिलीं। यह एक हारे हुए तथा हताश प्रधानमंत्री का ही बयान हो सकता है क्योंकि यह तर्क कौन स्वीकार करेगा कि यदि कोई अपराधी चुनाव में जीत जाए तो उसकी जीत उसके अपराधों को खत्म कर देती है। प्रधानमंत्री ने सांसदों को रिश्वत देने के मामले की जांच के लिए बिठाई समिति की रपट का निष्कर्ष भी गलत उद्धत किया। हालांकि इस समिति के चार सदस्य वे थे जिन्होंने सदन में विश्वास मत पर सरकार का समर्थन किया था।


इसके बावजूद इस सात सदस्यीय जांच समिति के तीन सदस्यों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कुछ सासदों को रिश्वत दिए जाने का स्पष्ट मामला सिद्ध होता है। जबकि शेष चार सदस्यों के बहुमत के कारण समिति की रपट में माना गया था कि सजीव सक्सेना चाहे-अनचाहे रिश्वत देने वाले थे इसलिए वह संविधान के अनुच्छेद 105 के अंतर्गत सरक्षण पाने के पात्र नहीं हैं। इसके अलावा रेवती रमन सिह के व्यवहार पर भी समिति ने संदेह व्यक्त करने वाली स्पष्ट टीका की थी।


संसदीय जांच समिति ने कहीं भी यह नहीं कहा कि सांसदों को रिश्वत देने का मामला प्रमाणित नहीं होता है। इसके विरुद्ध उसके निष्कर्ष में लिखा गया कि रिश्वत देने वाले सक्सेना का बयान असतोषजनक और सत्य से परे है। यानी समिति ने यह स्पष्ट रूप से माना था कि सक्सेना चाहे-अनचाहे रिश्वत देने वाले तो थे ही और इस संदर्भ में पूरी छानबीन की आवश्यकता है। मनमोहन सिंह ने इन तमाम तथ्यों की अनदेखी की। उस देश का क्या होगा जहां का प्रधानमत्री सासदों को रिश्वत देकर अपनी सत्ता और सरकार बचाने की कोशिश करे! क्या ऐसा देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा कर सकता है? क्या ऐसे देश के परमाणु संयत्र सुरक्षित रह सकते हैं? क्या ऐसे देश के छात्र और युवा बलिदान देने के लिए तत्पर सैनिक या जनता के हित की रक्षा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देने वाले अफसर बनने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं?


पूर्व संचार मंत्री ए. राजा के विरुद्ध कार्रवाई के लिए समूचे विपक्ष और मीडिया को एकजुट लड़ना पड़ा। ए. राजा के सहयोगी सादिक बाशा की रहस्यमय मृत्यु हो गई, जबकि वह सीबीआई के सामने पेश होने की तैयारी में था। बाशा का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने इस्तीफा दे दिया। हर दिन एक नए घोटाले का खुलासा हो रहा है। ऐसी स्थिति में भारत के परमाणु सयत्र और यूरेनियम भडार माओवादी या तालिबानी आतकवादियों के हाथों में नहीं जा सकते क्या इसकी कोई गारंटी ले सकता है?


विकिलीक्स के सर्जक और संचालक जूलियन असांजे ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा कि भारत के प्रधानमत्री विकिलीक्स के मामले में जनता को गुमराह कर रहे हैं। विकिलीक्स ने जो केबल भारत के सदर्भ में उद्घाटित किए वे अमेरिकी राजनयिकों द्वारा वाशिगटन में अपने विदेश विभाग को भेजे गए थे। असाजे का कहना है कि भारत में अमेरिकी राजदूत या अन्य राजनयिकों को अपने ही विदेश मत्रालय से झूठ बोलने की क्या जरूरत हो सकती है? अगर ऐसा होता है तो यह अमेरिका में बहुत बड़ा अपराध है।


अभी कुछ समय पहले तक भारत सूचना-प्रौद्योगिकी के कीर्तिमान, भारतीय डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा विश्वव्यापी औद्योगिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गौरवशाली उद्योगपतियों के कारण पूरी दुनिया में प्रतिष्ठा और ख्याति अर्जित कर रहा था, वह आज जिंदा भ्रष्ट देश के नाते जाना जा रहा है। दुनिया के हर कोने में भारत के नेताओं के शर्मनाक भ्रष्टाचार, ससद में इन मुद्दों को लेकर चल रहे लगातार गतिरोध तथा सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष को इस प्रकार के विषय उठाए जाने की अनुमति न देने के समाचार उन सभी करोड़ों भारतीयों का सिर शर्म से झुका रहे हैं जो कल तक गौरवशाली भारतीय के नाते रह रहे थे। वे जानते हैं भारत भ्रष्ट देश नहीं है। न ही भारत कायर और ठगों का देश है। सिर्फ कुछ नेता भारत की राजनीति और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। उनकी आंखों में भारत है ही नहीं।


सत्ता में बैठे लोग एक विदेशी मूल की उस महिला के हाथों में भारत की तकदीर दे बैठे हैं जिनका भारत के चित्त, मर्म और आत्मा के साथ कोई संबंध ही नहीं रहा। इसीलिए क्वात्रोची के खाते खुलवाए, सीबीआई को कांग्रेस की घरेलू शैतानी मशीनरी का पुर्जा बना दिया गया, हिंदुओं को आतंकवाद से जोड़कर पूरे देश की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता को लाछित करने का प्रयास किया गया और अब मध्य प्रदेश से एक ही किस्म और एक ही आस्था से जुड़े मामले एनआइए को सौंपकर मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने का प्रयास किया गया है। मानो इस देश के मुसलमान हिंदुओं पर आघात से खुश होकर कांग्रेस को वोट दे देंगे।


यह गलत धारणा है। मुस्लिम समाज जिसे भी वोट देता है अपनी बुद्धि से सोच कर देता है, यह बिहार और गुजरात के मुसलमानों ने सिद्ध किया है। लेकिन समाज को जाति और मजहब के आधार पर बाटकर अंग्रेजों को भी लज्जित करने वाले भ्रष्टाचारी यदि सत्ता का सरक्षण पाने लगें तो फिर ससद की लड़ाई सड़क तक ले जाने के सिवाय और कोई विकल्प बचता नहीं।


[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं]


Source: Jagran Nazariya

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