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तंत्र में गण की अनदेखी

Posted On: 25 Jan, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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हिंदुओं के विरुद्ध चरित्र हनन की राजनीति करने वाले मुस्लिम वोट बैंक कितना रिझा पाएंगे, यह तो कहना कठिन है, लेकिन वे आज स्वयं बोफोर्स दलाली के दबे दस्तावेजों के रहस्योद्घाटनों से अपनी विदेश-निष्ठा ही साबित करते दिख रहे हैं। जिनकी जड़ें भारत में न हों वे भारत के हो नहीं सकते। यहां का आम आदमी उनके लिए केवल ‘उपयोग और उपभोग’ की चुनावी सामग्री होता है। वरना क्या कारण है कि सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोग लाखों करोड़ रुपये के घोटालों की जांच में शेष देश के साथ खड़े होने के बजाय उन पर आघात कर रहे हैं जो घोटालों के विरुद्ध जांच चाहते हैं।


कपिल सिब्बल द्वारा सीएजी रपट का मजाक उड़ाना इसी विडंबना को दर्शाता है। ये लोग कभी स्विस बैंकों में भारतीय नेताओं और काला बाजारियों के तीस लाख हजार करोड़ से ज्यादा वापस लाने के लिए बेताब नहीं दिखते। इनके द्वारा कभी क्वात्रोची के लंदन स्थित खाते से 25 करोड़ वापस अवैध तरीके से लौटाने पर दु:ख व्यक्त नहीं होता। राष्ट्रीय संपदा की जितनी लूट वर्तमान संप्रग शासन में हुई है, क्या वह राजनीतिक चुनाव या केवल आरोपों की अखाड़ेबाजी का विषय होना चाहिए? देश लुटता रहे और राजनेता आपस में उसे एक-दूसरे पर आरोपों को गुलेल के रूप में इस्तेमाल कर सत्ता की सेज सजाते रहें? कश्मीर अलगाववादियों की चपेट में है जहां तिरंगा लहराने के लिए भी ऐसे मुहिम चलानी पड़ती है, मानो हम गिलगित फतह करने जा रहे हों और वहां के मुख्यमत्री सलाह देते हैं कि देश के नौजवानों को यहा तिरंगा लहराने नहीं आना चाहिए।


ऐसी परिस्थिति में उन भारतीयों की आवाज सुनने की किसे फुर्सत है जो केवल दो वक्त की रोटी के लिए संघर्षरत हैं? यह भारतीय गणतंत्र धीरे-धीरे केवल उनका होकर रह गया है जो धनी, प्रभावी एव राजनीतिक सत्ता के हिस्से हैं। उनके माध्यम से फैसले होते हैं, कारखानों तथा उद्योगों को मजूरियां मिलती हैं, योजना का पैसा भी इन्हीं माध्यमों से बंटता है। नतीजा यह निकला है कि भ्रष्ट राजनेता और चापलूस तथा अकर्मण्य अफसरशाही की मिलीभगत से ग्रामीण, जनजातीय भारत ज्यादा पिछड़ा है और पहले से धनी और ज्यादा धनी हुए हैं। ग्रामीण तथा शहरी भारत के बीच खाई बढ़ी है। आप कल्पना करके देखें, प्रतिदिन मात्र 20 रुपये रोज मे गुजारा करने वाले भारतीय 40 प्रतिशत यानी 40 करोड़ से ज्यादा हैं। उन पर वे राज करते हैं जो संसद में विशेष सब्सिडी में 20 रुपये में चिकन मटन की थाली खाते हैं और किसी महंगे रेस्त्रां में चार सौ रुपये की एक कटोरी दाल खा जाते हैं। यही धनी राजनेता हैं जो बड़े-बड़े मिल मालिकों से करोड़ों रुपये चंदे में लेते हैं और फिर जनजातीय-ग्रामीण क्षेत्रों में स्टील प्लाट, लौह अयस्क की खदानों के बड़े-बड़े पट्टे उन्हें दे देते हैं।


देश के कुल आठ करोड़ जनजातियों में 80 लाख ग्रामीण जनजातीय नए बांधों, कारखानों एव खदानों को दी जमीन के कारण विस्थापित हैं-जिनका कोई ठौर नहीं। उनका विस्थापन तो हो गया, लेकिन अभी तक उन्हें बसाया नहीं जा सका है। एक बार जमीन उजड़ गई तो उसके बदले मिलने वाला नकद मुआवजा कभी भी परिवार नहीं बसा पाता। मुआवजे में हर स्तर पर बाबू और नेता का कमीशन बधा होता है और जमीन का मालिक बाद में जेब में कागज लिए बर्बाद हो जाता है-जमीन गई तो जीवन गया।


इससे अधिक विचित्र और क्या होगा कि दिल्ली के नेता और मीडिया का एक हिस्सा श्वेता तिवारी के बिग बॉस विजेता होने या जेसिका लाल की हत्या पर बनी फिल्मों के मुद्दों पर वक्त बिताना ज्यादा सार्थक मानता है। ये शहरी-चतुर वर्ग वह है जो गंगा गंदी करता है, यमुना सड़ा देता है, फिर उनकी सफाई के अभियान में भी करोड़ों का घपला करता है। ग्रामीण जनजातीय भारत की कोई नदी कभी प्रदूषित नहीं मिलेगी। यही वह सच्चा गणतंत्र-स्वामी है जो जमीन से जुड़ा है, जंगल का रखवाला है, जल प्रदूषित नहीं करता, अपनी जुबान, अपनी भाषा पर गर्व करता है, अपनी जड़ों से द्रोह नहीं करता, लेकिन शहर के संस्कृतिहीन, अपनी भाषा-भूषा के प्रति तिरस्कार रखने वाले शासक उन्हें जल, जंगल, जमीन से उजाड़कर गणतंत्र का उत्सव मनाते हैं।


दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि ये ग्रामीण जनजातीय वर्तमान दौर में सर्वाधिक आतंकवाद भी झेल रहे हैं। तथ्य यह है कि देश में व्याप्त 95 प्रतिशत से ज्यादा आतंकवाद केवल जनजातीय क्षेत्रों में है जहां पहले से ही भूख, गरीबी, शोषण एव भ्रष्टाचार व्याप्त है। उनके नेता भी राजनीतिक भंवर में कुछ विशेष नहीं कर पाए और दिक्कत यह है कि अप्रशिक्षित एव भ्रष्ट पुलिस तंत्र ग्रामीण क्षेत्रों में निर्दोष ग्रामीणों को ही सताता है। नक्सली क्षेत्रों में जहां एक ओर साधारण ग्रामीण नक्सली आतंक का शिकार बनता है वहीं पुलिस नक्सलियों के बारे में खबर देने के लिए ग्रामीणों को सताती है। एक उदाहरण ऐसा भी है जिसमें रात में नक्सलियों ने एक घर मे जबरन भोजन किया तो सुबह पुलिस उन ग्रामीणों को पकड़ ले गई-इस आरोप में कि उन्होंने भोजन क्यों कराया? गणतंत्र की इस अवस्था पर सर्वदलीय चिंतन और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन आज ऐसा लगता है कि तंत्र सिर्फ धन कमाने का साधन है और गण गरीबी के अतल में धंसा कसमसा रहा है।


[तरुण विजय: लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

Source: Jagran Nazariya

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Gopalji के द्वारा
January 27, 2011

जब तक हम कायर हैं ऐसा ही होता रहेगा, हम कायर क्यों हैं यह हम अपने गरेबां में झांक के देख सकते हैं हम खुद नैतिक पतन की चादरें लेटें हैं ओढ़ कर सहमे डरे से सोये है घुटनों को मोढ़कर खुद सत्य की राहों को हमने छोड़ दिया है गर्तों में जा रहे हैं अपना देश तोढ़कर जिस दिन हम अपने को सुधार लेंगे सत्य पर चलने लगेंगे हममे भी गांघी, सुभाष और भगत सिंह जैसी शक्ति होगी. क्योंकि वे हुंकारते थे हम मिमियाते है. और हुंकारने की ताक़त सिर्फ सत्य में होती और ज़ब सत्य एकजुट हो तो बड़ा से बड़ा लुटेरा मिमियाता है गोपालजी

anilarya के द्वारा
January 26, 2011

जब तक स्वशासन सुशासन में नहीं बदलेगा तब तक गणतंत्र अधूरा ही रहेगा…

anoop pandey के द्वारा
January 26, 2011

तरुण जी आप के लेख में बहुत सारी समस्याओ को एक साथ लिया गया है….कुल मिला कर बात सिर्फ इतनी है की भारत समस्याओ का देश है किन्तु करे तो क्या करे? बहुत कुछ गलत हो रहा है ये हम सभी जानते है और कहते भी है. आप जैसे सुधी लेखक अपने लेखो के द्वारा काफी कृत्यों का खुलासा भी कर देते है और समाज को सोचने की दिशा भी दे देते है पर मूल प्रश्न अभी भी ज्यो का त्यों खड़ा अहि की करे तो क्या? मतदान का अधिकार ५ सालो में एक बार आता है पर वो भी सटीक नहीं है क्यों की हमें नीम और करेले में एक का चुनाव करने को कहा जाता है……..सूचना का अधिकार आया तो बड़े जोर शोर से था पर अब उसमे भी संशोधन की बात हो रही है जो की अधिकार के उपयोग को ख़तम ही कर देगी. तो फिर अब और रास्ता क्या बचा? सच मानिये तो निराशा का अन्धकार अपना दायरा बड़ा करता जा रहा है. अब तो लोग भी कहने लगे है की इस देश का कुछ नहीं हो सकता. किन्तु इस सब के बाद भी एक बात कहनी है हमें. भारत बहुत अजब देश है. यहाँ मुट्ठी भर विदेशी इसे सदियों गुलाम बना सकते है और फिर मुट्ठी भर क्रांतिकारी इस देश का स्वरुप बदल सकते है. सिर्फ एक शंकराचार्य वैदिक धर्म को पुनर्जीवित कर सकते है और एक अकेले चाणक्य सामान्य सैनिक को सम्राट बना सकते है. बात सिर्फ इतनी है की निराशा में भी आशा की एक किरण अवश्य है और वो बस इस देश की जनता से है. भ्रस्टाचार से कराहती जनता जिस दिन उठ खडी हुई तो वो विदेशियों का अनाचार हो या अपनों की थोपी गयी इमरजेंसी; कुछ भी टिक नहीं पाती.


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