blogid : 133 postid : 1167

आरएसएस का बुनियादी संकट

Posted On: 19 Jan, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

तात्कालिक लाभ के घटिया मानकों से संचालित राजनीति के दौर में यह समझ में आता है कि कांग्रेस स्वामी असीमानंद की गवाही को खूब प्रचारित रही है। असीमानंद कथित तौर पर उग्रवादी हिंदू कार्यकर्ता है। वह संदिग्ध आतंकी के रूप में हिरासत में हैं। विवादित इटालियन ओत्रेवियो क्वात्रोची के साथ कांग्रेस आलाकमान के संबंधों और भ्रष्टाचार को लेकर विपक्ष के हमले झेल रही कांग्रेस बदले के मौके की ताक में थी। एक मजिस्ट्रेट के समक्ष असीमानंद की गवाही के मीडिया में उछलते ही पार्टी को इस संबंध में अधकचरी बातें फैलाने का मौका मिल गया। यद्यपि ऐसा नहीं लगता कि इससे भ्रष्टाचार और आर्थिक कुप्रबंधन से ध्यान हटाने में वह कामयाब हो जाएगी।


कांग्रेस ने इस बेहूदा आकलन पर ‘हिंदू आतंक’ को मुद्दा बनाने का फैसला लिया है कि इससे मुस्लिम समुदाय को भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से विमुख करने में सफल हो जाएगी। वह भूल रही है कि मुसलमान भी महंगाई का उतना ही दंश झेल रहे है जितना कि हिंदू। निश्चित तौर पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह मुसलमानों के भयादोहन का पुरजोर प्रयास कर रहे है। उदाहरण के लिए 26/11 पर प्रकाशित एक किताब का दिग्विजय सिंह प्रचार कर रहे है, जिसमें मुंबई आतंकी हमले के लिए यहूदी षड्यंत्र को जिम्मेदार ठहराने जैसे अविश्वसनीय और बेहूदे आरोप लगाए गए है। इस आग्रह को विश्वसनीय बताते हुए और अयोध्या फैसले पर ठंडी प्रतिक्रिया के आधार पर वह मान बैठे है कि हिंदू की पहचान के मुद्दे पर मतदाताओं की लामबंदी की कोई संभावना नहीं है।


हिंदू आतंक का हौव्वा खड़ा करने के गंभीर निहितार्थ है। शुरुआत के तौर पर असीमानंद की इस स्वीकारोक्ति को फर्जी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता कि हैदराबाद की मक्का मस्जिद में विस्फोट मामले में एक मुस्लिम लड़के को गलत तरीके से फंसाने से वह द्रवित हो गए थे। हिंसा के रास्ते पर चलने वाली बहुत सी पंथिक विभूतियों की तरह असीमानंद भी आंख के बदले आंख की नीति को नैतिक वैधानिकता प्रदान करने में यकीन रखते थे। वृहत्तर षड्यंत्र में भागीदारी की घोषणा करने के गंभीर कानूनी परिणामों से वह भलीभांति परिचित थे। फिर भी उन्होंने आंखों देखी सच्चाई बयान करने का फैसला लिया। यद्यपि असीमानंद की स्वीकारोक्ति को मीडिया में उछालने पर सवाल खड़े होते है, फिर भी उनके द्वारा बयान किए गए घटनाक्रम को फर्जी नहीं बताया जा सकता है। असीमानंद की गवाही उग्रवादी हिंदू राष्ट्रवादियों की सोच को उजागर करती है, जो यह मानते है कि मुसलमानों को कष्ट पहुंचाकर वे राष्ट्र की सेवा कर रहे है। यह प्रतीत होता है कि दो अलग-अलग षड्यंत्र रचे जा रहे थे। पहला अभिनव भारत गुट द्वारा, जिसकी शुरुआत तो खुफिया जानकारी इकट्ठा करने से हुई थी, लेकिन अंत एक कुत्सित अभियान से हुआ। दूसरा षड्यंत्र सुनील जोशी गुट रच रहा था, जिसमें कथित तौर पर आरएसएस से जुड़े लोग मौजूद थे। अभिनव भारत का मालेगांव धमाकों में हाथ था और मक्का मस्जिद व अजमेर शरीफ दरगाह धमाकों में जोशी का हाथ होने का अंदेशा है।


असीमानंद दोनों गुटों को जानते थे और वैचारिक प्रेरणा के समान बिंदु नजर आते है, किंतु इस संपर्क के अलावा दोनों समूहों में कटुता और शत्रुता थी। दोनों में आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार जरूर एक साझा सूत्र थे। लगता है पुरोहित और उनके सहयोगी इंद्रेश कुमार को आइएसआइ एजेंट मानते थे और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की हत्या के विचार से असहमत नहीं थे। असीमानंद की गवाही से संकेत मिलता है कि इंद्रेश कुमार का जोशी गिरोह के साथ गहरा नाता था और वह उनकी गतिविधियों को चलाने में सहयोग देते थे।


पिछले दिनों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने सूरत में बयान दिया था कि उग्रवादी तत्वों ने या तो खुद ही आरएसएस से किनारा कर लिया या फिर वे संगठन से निकाल दिए गए। कट्टरपंथी तत्वों के लिए आरएसएस में कोई स्थान नहीं है। अभिनव भारत के रिकॉर्ड को देखते हुए भागवत का दावा विश्वसनीय लगता है। इस गिरोह के सदस्य अब भी आक्रामक हिंदू राष्ट्रीयता की वकालत कर रहे है। हालांकि इंद्रेश के मामले में आरएसएस में महत्वपूर्ण पद पर विराजमान होने के कारण राजनीतिक बदले की भागवत की बात गलत लगती है। विभिन्न गवाहियों से यह बात साबित हो जाती है कि इंद्रेश के उन लोगों के साथ गहरे ताल्लुकात है, जो आतंक को इस्तेमाल करने में संकोच नहीं करते।


समुचित साक्ष्यों के बिना यह मानना गलत होगा कि इंद्रेश किसी भी आतंकी समूह के मास्टरमाइंड थे या फिर वे इनके लिए सुविधाएं ही जुटा रहे थे। हालांकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि वह बेहद संदिग्ध लोगों के साथ घुले-मिले हुए थे। लगता है कि इंद्रेश लापरवाह थे। उनका साथ देने के आरएसएस के फैसले के पीछे वफादारी का आधार हो सकता है, किंतु जनता उन्हे उसी उदारता और अनुग्रह की निगाह से नहीं देखती। इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस को एक छड़ी मिल गई है, जिससे वह आरएसएस और भाजपा, दोनों की पिटाई कर सकती है। 2004 के आम चुनाव के बाद से भाजपा में आरएसएस से दूरी बनाने की आवाजें उठ रही है। दुर्भाग्य से, आरएसएस के दबाव में ये आवाजें मुखर नहीं हो पाई है। आरएसएस की इस भागीदारी से राजनीतिक विकृति पैदा हो गई है, जिसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है। खुद अपनी सलामती के लिए आरएसएस को सर्वप्रथम अपना घर ठीक करना पड़ेगा। तभी भाजपा को पिटने से बचाया जा सकता है।


[स्वप्न दासगुप्ता: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]

Source: Jagran Nazariya

| NEXT



Tags:                                                         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 3.80 out of 5)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajeev dubey के द्वारा
January 21, 2011

भाजपा के अधिकतर शीर्ष नेता यह गर्व के साथ कहते हैं की वह आर एस एस के प्रचारक रहे हैं और आर एस एस ही उनका मूल है और रहेगा ….तब आप कहना क्या चाह रहे हैं और किसकी ओर से …? लेख विसंगतियों से भरा है : १. असीमानंद कथित तौर पर उग्रवादी हिंदू कार्यकर्ता है। वह संदिग्ध आतंकी के रूप में हिरासत में हैं। २. उनके द्वारा बयान किए गए घटनाक्रम को फर्जी नहीं बताया जा सकता है। (तात्पर्य कि आप इसे तथ्य मानते हैं ) ३. 2004 के आम चुनाव के बाद से भाजपा में आरएसएस से दूरी बनाने की आवाजें उठ रही है। दुर्भाग्य से, आरएसएस के दबाव में ये आवाजें मुखर नहीं हो पाई है। (आपकी मानें तो भाजपा आर एस एस से पीछा छुडाना चाहती है ) अब देखिये: सरकारी संस्थाएं पहले मुस्लिम युवकों को पकड़ती हैं और उन्हें जेल में यन्त्रणा देती हैं – कांग्रेस सरकार जब कई राज्यों में विधान सभा चुनाव नज़दीक आये तो यह लोग एक हिन्दू को पकड़ते हैं और अब मुस्लिम युवक को छोडने लगते हैं – कांग्रेस सरकार प्रश्न है कि क्या इस सरकार के लिए नियम क़ानून का कोई मतलब है कि नहीं ? क्या हिन्दू, क्या मुसलमान – धर्म से कोई आतंकी बनता है क्या ? सामान्य जनता के कोई मौलिक अधिकार हैं कि नहीं ? कांग्रेस सरकार किस आधार पर मुस्लिम युवकों को पकड़ कर जेल में डाले रखती है ? उनका पूरा जीवन कलंकित करने का इन्हें क्या अधिकार है? इस घटनाक्रम से यह सिद्ध हो गया है कि सरकार बिना पक्के सबूत के मुस्लिम युवकों को जेल में सड़ा रही थी. यदि असीमानंद की गिरफ्तारी नहीं होती तो क्या होता ? बेचारे निर्दोष लोग यूं ही जेल में पड़े रहते ! इन लोगों की कौन सी बात सत्य है … पहले गलत थे और अब भी चाल नहीं चल रहे हैं यह कौन जानता है ? लगता है कि कांग्रेस दोनों ही समुदायों के साथ खेल रही है – भेद की राजनीति . भावुक लोग एक दूसरे के विरुद्ध होकर लड़ बैठते हैं. फिर वोट बंटते हैं और कांग्रेस का कुशासन चलता है .

Bibhaw के द्वारा
January 20, 2011

अकाट्य सत्य ! धन्यवाद

rahulpriyadarshi के द्वारा
January 19, 2011

इस आलेख का मंतव्य क्या है? लेखक भले ही वरिष्ठ स्तंभकार होंगे,लेकिन यह लेख उस गरिमा के लायक नहीं लगा.

z shih के द्वारा
January 19, 2011

यही तो प्रोब्लेम है| कोई हिन्दु फ़स्ता है तो आप का सुर अलग हो जाता है| बह घटना पेर्सोनल हो जाता है| लेकिन इसी तरह के घटना मे मुसलमान फ़स्ता है तो मुस्लिम आतंक / इस्लाम आतंकबाद जाता है| किसी ‘एक समान’ घटना को दो च्श्मे से देखना यह आर आर स बालो को खुब आती है| दिग्विजय सिंह जी के सच को पर्चार आप को लगता हो हमे तो सच लगता है। मुद्दे को फेरने से काम नही चलेगा । महगाई का मुद्दा अलग है आतंकबाद का अलग ।


topic of the week



latest from jagran