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संदेह के बीच उम्मीद की किरण - चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा

Posted On: 15 Dec, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अमेरिका और फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों की सफल भारत यात्रा के बाद चीन के प्रधानमंत्री वे चियापाओ (चीनी भाषा में ज और ब का उच्चारण च और प होता है) बुधवार से दो दिवसीय भारत यात्रा पर आ रहे हैं। यह भारत-चीन कूटनीतिक सबधों की स्थापना का साठवां वर्ष भी है, जिसके उत्सव में इस वर्ष मई में भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल बीजिंग गई थीं। पिछले महीने ही हनोई में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वेन से मुलाकात भी हुई थी।


इस परिप्रेक्ष्य का अर्थ यह है कि अनेक बिंदुओं पर गहरे मतभेद और अविश्वास के बावजूद भारत और चीन आपसी सबध सुधारने और वार्ताओं के दौर जारी रखने के सकारात्मक रास्ते पर चलने के लिए सहमत हैं। चीन के साथ भारत की 4000 किमी लंबी सीमा है और पाकिस्तान की तरह चीन के साथ भी भारत के गहरे सीमा विवाद हैं। 1988 में तत्कालीन प्रधानमत्री राजीव गांधी तथा 2003 में प्रधानमत्री अटल बिहारी बाजपेयी की चीन यात्राओं ने दोनों देशों के मध्य सबधों को असाधारण और नूतन आयाम दिए तथा यह तय हुआ कि सीमा विवाद दोनों देशों के लिए स्थापित सीमा आयोग की वार्ताओं के माध्यम से ही तय किए जाएंगे।


वास्तव में प्रधानमंत्री वाजपेयी को भारत-चीन संबंधों के शांतिपूर्ण दौर को स्थायित्व देने एव नए आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग के शिखर स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। आज की स्थिति यह है कि भारत-चीन आर्थिक व्यापार 60 अरब डालर से भी अधिक बढ़ने की ओर अग्रसर है अर्थात कुछ ही समय में भारत का चीन से व्यापार अमेरिका से भी अधिक हो जाएगा। सस्कृति तथा पर्यटन के क्षेत्र में भारत से चीन जाने वाले यात्रियों की सख्या में प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो रही है, जबकि चीन से भारत आने वाले यात्री 35 से 40 प्रतिशत तक की वृद्धि दर भी दिखाते हैं। चीन में जब से बौद्ध मत के प्रति शासकीय एव सामान्य जनता के स्तर पर असाधारण रुझान बढ़ा है तब से भारत के बौद्ध तीर्थ स्थलों की ओर चीन के यात्रियों की सख्या भी बढ़ी है। चीन ने कैलास-मानसरोवर क्षेत्र में भी नई योजनाएं प्रारंभ की हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य मूलत: भारत से अधिक सख्या में तीर्थयात्रियों को आकृष्ट करना है। इनमें मानसरोवर क्षेत्र में हवाई अड्डे का निर्माण, होटल तथा भारत के अनेक सतों को धर्म आश्रमों के निर्माण की अनुमति शामिल है। कुछ वर्ष पहले स्वामी चिदानंद सरस्वती को मानसरोवर के तट पर आश्रम निर्माण की अनुमति देकर अभूतपूर्व कदम उठाया था। चीन के लगभग हर नगर में योग केंद्र खुल रहे हैं। कुछ समय पहले श्री श्री रविशकर बीजिंग के पास एक विशाल योग केंद्र का उद्घाटन करके आए थे, जिसमें हजारों की सख्या में चीनी नागरिक शामिल हुए।


ये तमाम संबंध उन खतरों को ओझल नहीं कर सकते जो चीन के महत्वाकांक्षी सैन्य बल तथा आर्थिक प्रभुत्व की कामना से पैदा हो रहे हैं। चीन पहले से ही अकसाई चिन क्षेत्र में 38,000 वर्ग किमी. से अधिक भूमि पर कब्जा किए हुए है और वह अरुणाचल के 90,000 वर्ग किमी पर अपना दावा जताता है। हाल ही में उसने सुरक्षा परिषद में वीटो का इस्तेमाल कर भारत के दो शत्रुओं को प्रतिबधित करने के कदम को रोक दिया था। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के पीछे चीन के ही तकनीकी सहयोग का हाथ है और पाकिस्तान के अवैध कब्जे में स्थित गुलाम कश्मीर में चीन के सैनिकों की निर्माण एव सहायता कार्य के बहाने बड़ी सख्या में उपस्थिति दर्ज हुई है। चीन ने कश्मीर के सदर्भ में अपनी नीति बदलकर उसे विवादग्रस्त एव भारत से बाहर माना है। कश्मीर के नागरिकों को चीन की यात्रा हेतु वीजा अलग से कागज पर मुहर लगाकर पासपोर्ट से नत्थी किया जाता है और उस प्रकार पासपोर्ट पर मुहर लगाकर नहीं दिया जाता जैसे शेष भारतीयों को मिलता है।


हाल ही में चीन ने उत्तरी कमान के सेनाध्यक्षों जनरल जसवाल को वीज़ा देने से इंकार कर भारत का अपमान किया था। इसके विरोध में भारत ने चीन के साथ अपने सभी सयुक्त सैन्य अभ्यास रद कर दिए हैं। चीन ने पिछले एक वर्ष में 142 से अधिक बार भारतीय सीमा के भीतर घुसपैठ की घटनाओं से भी भारतीय मानस में आशकाएं घनीभूत की हैं। इसी के साथ भारत चीन तथा पाकिस्तान्न के बीच अभी भी नागरिक सहयोग के नाम पर चल रहे परमाणु तकनीक सहयोग से चितित है। चीन द्वारा तिब्बत में किया जा रहा मानवाधिकार उल्लंघन तो भारत के हितों के सदर्भ में भी चिता करने का विषय है। चीन द्वारा भारत की चारों ओर से की जा रही घेरेबदी उसकी नीयत में खोट दर्शाता है तो नेपाल में चीन द्वारा माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से सीधे राजनीतिक दखल दक्षिण एशिया में शक्ति सतुलन को भारत के विरुद्ध झुकाने के साथ-साथ हमारी सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती है।


दु:ख इस बात का है कि एक कमज़ोर तथा भ्रष्टाचार के आरोपों में लड़खड़ाती सत्ता चीन की इन चुनौतियों का आत्मसम्मान एव दृढ़ता से सामना करने में असमर्थ है। चीन हो या अमेरिका, वे केवल शक्तिशाली देश की इज्जत करते हैं, उसकी नहीं जो राष्ट्रीयता की भावना पर सेक्युलर हमले करते हुए न अभी तक कोई स्पष्ट चीन नीति बना पाया हो और न ही पाकिस्तान नीति। आशा की जानी चाहिए कि चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान भारत का पक्ष और विपक्ष एकमत होकर चीन से दृढ़तापूर्वक अपने हितों की रक्षा हेतु वार्ता कर पाएगा तथा हमारे कश्मीर और पाकिस्तान के सदर्भ में चीन के भारत हित विरोधी रुख को बदलने पर विवश करेगा। भारत के हितों पर चोट करते देखते हुए भी चीन के साथ उसी के पक्ष में असंतुलित व्यापार एवं ज्ञानदान के उपक्रम आत्मघाती ही होंगे।


[तरुण विजय : लेखक राज्यसभा सदस्य हैं]

Source: Jagran Yahoo

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
December 16, 2010

तरुण जी,सादर सप्रेम अभिवादन ,आप सदृश विद्वतजन के लेख पर प्रतिक्रिया देने की योग्यता तो नहीं है परन्तु इतना अवश्य कहना चाहूंगी कि सर्वसाधन संपन्न होते हुए भी अपनी दोषपूर्ण नीतियों के कारण हम आज तक विश्वपटल पर यथेष्ट सम्मान नहीं प्राप्त कर सके तो अपनी बात सम्मानपूर्ण तरीके से कैसे मनवा सकते हैं.आज आवश्यकता है अपने साधनों के बल पर आत्मनिर्भर बनने की न कि छोटी छोटी आवश्यकताओं के लिए परमुखापेक्षी बनने की.,जिस दिन इतने सामर्थ्यवान हम बन जायेंगे तो………………..


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