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महानायक का पतन

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बिहार में जद (यू)-भाजपा गठबधन को जिस तरह 80 प्रतिशत से अधिक सीटों पर जीत मिली, उसकी तुलना केवल 1977 की जनता पार्टी एव 1984 की काग्रेस लहर से ही की जा सकती है। मत सर्वेक्षण एवं एक्जिट पोल के सत्ता पक्ष में सकारात्मक संकेत के बावजूद यह मानने वाले भी काफी लोग थे कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और त्रिशंकु सरकार बनेगी। सबसे पहले इस पर विचार करना होगा कि 1990 के दशक में अपराजेय माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव इतने अस्वीकार्य कैसे हो गए कि राबड़ी देवी दो-दो क्षेत्रों से पराजित हो गईं। उपमुख्यमत्री पद के घोषित लोजपा प्रत्याशी और रामविलास पासवान के अनुज पशुपति कुमार पारस को भी हार का मुंह देखना पड़ा। परिणाम आते ही राष्ट्रीय जनता दल में बगावत शुरू हो गई और बहुत से नेता कहने लगे कि अब ससद या विधानसभा पहुंचाने की लालू की ताकत खत्म हो चुकी है। उनके नेतृत्व को खुलेआम चुनौती दी जा रही है। बीस साल पहले लालू यादव को प्रचड जन समर्थन मिला था, लेकिन वह सत्ता के मद में चूर हो गए और जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित राजनीति की धार को और तेज करने लगे।


लालू प्रसाद को राज्य के मुखिया का पद तब मिला जब सामाजिक न्याय का मुद्दा उबल रहा था। इसका पूरा लाभ उठाते हुए उन्होंने सामाजिक न्याय की शक्तियों को अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत किया। लालू ने सपना तो जगाया, किंतु विकास को गैरजरूरी समझा और इसलिए यह हकीकत में नहीं बदल सका। विकास के अभाव में राज्य पटरी से उतर गया और अपहरण उद्योग बेलौस फैलने लगा, जिसे लालू ने सामाजिक सतुलन बताया।


किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि लालू कभी इतने अस्वीकार्य हो जाएंगे। लेकिन जब व्यक्ति अपने को देवता समान मानने लगता है तो उसका यही हश्र होता है। उनकी उपस्थिति में विधानसभा में 1993 में ‘लालू भगवान की जय’ के नारे लगते थे और वह मुग्धभाव में सुनते रहते थे। यही नहीं, उन्होंने खुद को राजा तक कहना शुरू कर दिया था। गत वर्ष लोकसभा चुनाव में भी जनता दल -भाजपा गठबंधन को शानदार सफलता मिली थी और 243 में से 175 विधानसभा क्षेत्रों में उसके प्रत्याशी आगे रहे थे। यह सख्या इस बार और बढ़कर 206 हो गई। यह नीतीश कुमार के इस दावे को पुष्ट करता है कि यह सुशासन का दौर है और जनता जंगल राज की वापसी किसी कीमत पर होने नहीं देगी।


नीतीश कुमार के आलोचक कहते हैं कि उनके पास अपनी उपलब्धिया गिनाने के लिए कुछ खास नहीं है, इसलिए वह लालू का हौव्वा खड़ा कर जनता को डराते हैं। किंतु ऐसा नहीं है। गत पांच वषरें में बिहार में कई सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं। बड़ी बात यह है कि बिहार की छवि बदली है। बिहार को पहले जितनी परेशानी अपने पिछड़ेपन से थी, उससे ज्यादा अपनी छवि से थी। विधि-व्यवस्था में उत्साहव‌र्द्धक फर्क आया है और सड़कों का निर्माण हुआ है।


इस कारण बिहार से बाहर चले गए लोग वापस आने लगे हैं। विद्यालयों में छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ी है। ये सभी धनात्मक पक्ष हैं नीतीश सरकार के, किंतु बिहार को पूरी तरह बदलने के लिए उन्हें बहुत कुछ करना पड़ेगा। जनता ने प्रचड बहुमत देकर उन्हें अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का पूरा अवसर दिया है। बिजली के क्षेत्र में कोई प्रगति नहीं हुई। बालिकाओं को साइकिल देने की उनकी योजना बॉक्स ऑफिस पर हिट हो गई और एक क्राति चुपचाप जन्म ले रही है जो महिलाओं को शिक्षित एव सशक्त बनाएगी। किंतु शिक्षा के क्षेत्र में उन्हें कुछ और क्रातिकारी कदम उठाने पड़ेंगे। उच्च शिक्षा की गुणवता को बढ़ाने के लिए काबिल शिक्षकों को पूरे देश से लाना होगा। नालदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का प्रयास हो रहा है। अच्छे शिक्षकों से क्या फर्क पड़ता है इसके लिए एक उदाहरण काफी होगा। बिहार में पटना कॉलेज पहला महाविद्यालय है, जो 1863 में स्थापित हुआ। इसके प्राचार्य थे प्रो. मैककिंड्रल जो इतिहास के प्राध्यापक थे। उन्होंने पहली बार मेगास्थेनीज की पुस्तक ‘इंडिका’ का यूनानी से अंग्रेजी में अनुवाद करवाया, जिससे पता चला कि आज का पटना ही प्राचीन पाटलीपुत्र है। फिर उसी से देश के गौरवशाली इतिहास की जानकारी मिली। यानी भारत के इतिहास को सामने लाने में पटना कॉलेज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से आज बिहार में उच्च शिक्षा का बुरा हाल है।


भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है और एक धारणा बनी है कि अफसरशाही बढ़ने के कारण ही भ्रष्टाचार बढ़ा है। नीतीश सरकार को इस धारणा को बदलने के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है। जिस मत्रिमडल का गठन हुआ है उसमें भी कुछ दलबदलुओं एव सदिग्ध चरित्र वालों को शामिल किया गया है, जिससे गलत सदेश जाएगा। राज्य के औद्योगीकरण के लिए भी ठोस प्रयास करने होंगे। विकास दर बढ़ी है। केंद्रीय साख्यिकी सगठन के मुताबिक बिहार की विकास दर 2004 से 2009 के बीच 11.03 प्रतिशत रही है जो गुजरात के 11.05 प्रतिशत के बाद देश में दूसरे स्थान पर है।

कुछ अर्थशास्त्री इस आंकडे़ को चुनौती देते हैं। उनका तर्क है कि विधानसभा में 2008-09 के बजट पूर्व सर्वेक्षण में राज्य सरकार ने स्वय विकास दर 7.4 प्रतिशत मानी है। बाद में सरकार ने अपने आकडे़ में सशोधन कर विकास दर को अधिक बताया। खैर, आंकड़े जो भी हों, बिहार में 2005 में सत्ता परिवर्तन एक ठंडी हवा के झोंके के रूप में आया। उम्मीद की जानी चाहिए कि विकास का रथ आगे बढ़ता रहेगा।


इस आलेख के लेखक सुधांशु रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं

Source: Jagran Yahoo

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajeev dubey के द्वारा
December 5, 2010

बिहार में परिवर्तन का यह दौर आशाजनक है इसमें कोई संदेह नहीं है, परन्तु विकल्पों की बहुत कमी है . प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए नितीश को कई हाथ और विचारक चाहिए होंगे. यह दौर आगे चलकर और जोर पकडे इसकी व्यवस्था अभी से करनी होगी.

nishamittal के द्वारा
December 3, 2010

बिहार की स्तिथि का बहुत अच्छा विश्लेषण.जनता सब जानती है कुछ समय भले ही भ्रमित रह ले परन्तु जागने पर प्रलय ला देती है.लेकिन जिस पर विश्वास करती है जब उससे भ्रम टूटता है तो महानायक ही गुनाहों का देवता बना देती है.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 2, 2010

आदरणीय रंजन सर सादर प्रणाम,खुद अपने आप को भगवन मानाने वालों को नकार कर बिहार की जनता ने अपनी इच्छा को माननीय मुख्यमंत्री जी के सामने प्रकट कर दिया है की उनको सिर्फ और सिर्फ विकास और सुशाशन ही चाहिए,तो ऐसे में यही उम्मीद दिखती है की विकास का रथ आगे बढ़ता ही रहेगा,धन्यवाद!

manojbijnori के द्वारा
December 2, 2010

ek na ek din ye to hona hi tha …………….

Manoj के द्वारा
December 2, 2010

यह कहना गलत होगा कि बिहार से लालू का पत्ता साफ हो चुका है…


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