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बलि के बकरे तलाशती कांग्रेस

Posted On: 30 Nov, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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ईमानदार होने का राग अलाप रही और ईमानदारी का प्रमाण-पत्र बांट रही कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार अपने आचरण से जो कुछ प्रदर्शित कर रही है उससे सिर्फ और सिर्फ यह साबित हो रहा है कि वह स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच कराने के लिए तैयार नहीं। इस घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति न गठित करने के लिए वह हर दिन एक नया कुतर्क देती है। चूंकि उसे नित नए बहाने गढ़ने पड़ रहे हैं इसलिए यह स्वत: साबित हो जाता है कि वह संयुक्त संसदीय समिति से भयभीत है। चूंकि सरकार संयुक्त संसदीय समिति गठित न करने पर आमादा है इसलिए इस पर यकीन करने का सवाल ही नहीं उठता कि वह स्पेक्ट्रम घोटाले की नीर-क्षीर ढंग से जांच कराएगी। सच तो यह है कि इसके प्रमाण भी सामने आने लगे हैं। पहला प्रमाण सुप्रीम कोर्ट का सीबीआई से यह सवाल है कि उसने राणा से पूछताछ क्यों नहीं की? दूसरा प्रमाण जनता का ध्यान बटाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय का कॉरपोरेट लॉबिइस्ट नीरा राडिया के पीछे पड़ना है।


नीरा राडिया की विभिन्न लोगों से टेलीफोन बातचीत यह तो साबित करती है कि उनकी दिलचस्पी इसमें भी थी कि द्रमुक के नेताओं को महत्वपूर्ण मंत्रालय मिलें, लेकिन आखिर इसके लिए लॉबीइंग करना अपराध कैसे हो गया? यदि अपराध है तो फिर केवल नीरा से ही पूछताछ क्यों?


सवाल यह भी है कि क्या 2009 में मंत्रियों और मंत्रालयों का निर्धारण लॉबीइंग के जरिए हुआ? यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो फिर सरकार के लोगों से पूछताछ क्यों नहीं होनी चाहिए। यदि किसी सरकार में मंत्रियों का चयन और उनके मंत्रालयों का बंटवारा कारपोरेट घरानों की पैरोकारी से होता है तो फिर लॉबीइंग करने वाले तो सक्रियता दिखाएंगे ही। सच तो यह है कि यदि कल को प्रधानमंत्री के चयन भी कारपोरेट घरानों और गठबंधन विशेष के घटक दलों के दबाव में होने लगे तो लाबिइस्ट इसके लिए भी प्रयास करेंगे। उनका तो काम ही है अपने ग्राहकों के हितों की रक्षा करना। यदि सरकारी काम पैरवी और पैरोकारों के बल पर ही होने लगे है तो फिर कठघरे में भी उसे होना चाहिए। अगर किसी सरकार के कार्यकाल में लॉबीइंग करने वाले सफल हैं तो इसका एक मतलब यह है कि वह सरकार सत्ता के दलालों से घिरी है।


यदि नीरा राडिया ने किन्हीं नियम-कानूनों का उल्लंघन नहीं किया है तो फिर उन्हें तंग क्यों किया जाना चाहिए-और यदि उनसे सात घंटे पूछताछ जरूरी थी तो फिर उन लोगों से सात मिनट भी पूछताछ क्यों नहीं की गई जो अपना काम-धंधा छोड़कर उनके सहायक की भूमिका में आ गए थे अथवा उनके हरकारे या फिर मददगार बने हुए थे?


फिलहाल तो यही लगता है कि नीरा राडिया को बलि का बकरा बनाया जा रहा है? खिसियाई केंद्र सरकार उनके पीछे उसी तरह पड़ी है जिस तरह एक समय ललित मोदी के पीछे पड़ गई थी, क्योंकि शशि थरूर को इस्तीफा देना पड़ा था। राष्ट्रमंडल घोटाले में भी सरकार बलि के बकरों के रूप में सुरेश कलमाड़ी के सहायकों को घेरने में लगी हुई है। आश्चर्य नहीं कि आदर्श सोसायटी घोटाले में भी ऐसा ही हो, क्योंकि केवल अशोक चज्जाण का त्यागपत्र लेकर यह ढोल पीटा जा रहा है आवश्यक कार्रवाई कर दी गई?


यह एक पहेली है कि स्पेक्ट्रम आवंटन में न तो मनमानी करने वाले राजा का कुछ बिगड़ता नजर आ रहा है और न ही उन कंपनियों का जिन पर राजा ने विशेष कृपा दिखाई और जिसके चलते उन्होंनेअपनी झोलियां भर लीं। यह शर्मनाक है कि प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से हजारों करोड़ रुपये के वारे-न्यारे करने वाले किसी भी तरह की कार्रवाई से बचे हुए हैं और फिर भी संसद से लेकर सड़क तक यह कर्णभेदी शोर मचाया जा रहा है कि हम ईमानदारी की मिसाल कायम कर रहे हैं। कुछ कांग्रेसी नेता यह कुतर्क पेश करने में जुट गए हैं कि राजा ने स्पेक्ट्रम आवंटन उसी नीति के तहत किया जिसके तहत राजग शासन में किए गए थे। देश जानना चाहेगा कि भाजपा की नीतियां कांग्रेस के लिए कब से अनुकरणीय हो गईं? काग्रेस यह कहकर भी खुद को पाक-साफ बताने की कोशिश कर रही है कि हमने तो अशोक चज्जाण को हटा दिया, लेकिन भाजपा ने येद्दयुरप्पा को बख्श दिया। नि:संदेह भाजपा ने येद्दयुरप्पा के समक्ष घुटने टेक दिए हैं, लेकिन क्या कांग्रेस केवल भाजपा के प्रति जवाबदेह है या फिर उसने नीतिगत स्तर पर यह तय कर लिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में जैसा भाजपा करेगी वैसा ही वह भी करेगी? यदि एक क्षण के लिए यह मान लिया जाए कि किसी विपक्षी दल के नेता चोरी करते थे तो क्या इस आधार पर सत्तापक्ष के नेताओं को डाका डालने का अधिकार मिल जाना चाहिए?


ए. राजा ने जो कुछ किया है वह सरकारी खजाने पर डाका डालने जैसा है और फिर भी देश को यह घुट्टी पिलाने की कोशिश हो रही है कि केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार सहन नहीं। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री की ईमानदार छवि की भी आड़ ली जा रही है, जबकि सवाल प्रधानमंत्री की ईमानदारी का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सक्रियता का है। चूंकि खुद सुप्रीम कोर्ट उनकी निष्क्रियता पर सवाल उठा चुका है इसलिए कांग्रेस की सफाई का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। यदि सुप्रीम कोर्ट स्पेक्ट्रम घोटाले पर प्रधानमंत्री की निष्क्रियता को परेशान करने वाली नहीं करार देता तो भी यह साबित होने वाला नहीं था कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ सचेत और सक्रिय हैं। आखिर यह तथ्य है कि राष्ट्रमंडल घोटाला उनकी नाक के नीचे हुआ। इसके अतिरिक्त यह भी साफ है कि बोफोर्स दलाल क्वात्रोची के बैंक खातों पर लगी रोक उनके ही शासनकाल में हटी। अब किसी को यह कहने की जरूरत नहीं कि प्रधानमंत्री कमजोर हैं, क्योंकि खुद उन्होंने अपनी कमजोरी पर मुहर लगा दी है।


इस आलेख के लेखक राजीव सचान दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं

Source: Jagran Yahoo

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashutoshda के द्वारा
December 2, 2010

राजीव जी बहुत ही अच्छे सवाल उठाए है आपने जिनका जवाब शायद ही कोई दे पाए लेकिन इतना तो तय है की वर्तमान केंद्र सरकार काम करते करते थक चुकी है इसके भ्रस्ट्र नेताओं पर सिवा लीपापोती के अलावा सरकार कुछ करने में असमर्थ है इनका दोबारा सत्ता में आने को कोई मोह नहीं जनता पछता रही है की क्यों हमने वर्तमान केंद्र सरकार को दोबारा मौका दिया लेकिन अब सिवाय देखने के कुछ नहीं हो सकता विपक्ष तो लगता है जैसे है ही नहीं जो कुछ आवाज़ उठाई जाये ! आशुतोष दा

डा.. एस शंकर सिंह के द्वारा
December 1, 2010

प्रधान मंत्री दलालों द्वारा नियंत्रित होते हैं. मंत्रिमंडल में इसको क्या मंत्रालय मिलेगा यह लाबीइस्ट और मीडिया में सत्ता के दलाल तय करते हैं राजा को टेलीकाम मंत्री बनाने का मतलब है प्रजा के 1,76 ,000 करोड़ की लूट पूर्वनियोजित थी. यह सब प्रधानमंत्री की जानकारी में और सहमति से हुआ. मीडिया और नेता प्रतिपक्ष के विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री ने दागदार थामस को मुख्य सतर्कता आयुक्त नियुक्त किया जब कि नियमानुसार इस पद पर नियुक्ति नेता प्रतिपक्ष की सहमति से की जाती है. इसके लिए तो स्वयं प्रधानमंत्री उत्तरदायी हैं. प्रश्न उठता है की नियमों का उल्लंघन कर मुख्य सतर्कता आयुक्त जैसे पद पर एक दागदार व्यक्ति की नियुक्ति क्यों की गयी. आशंका होती है कि यह सब 2 G Spectrum घोटाले को दबाने के लिए किया गया. मुख्य सतर्कता आयुक्त की देख रेख में 2 G स्पेक्ट्रम घोटाले की सी बी आई द्वारा जांच की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट लगातार सवाल उठा रहा है. स्वयं प्रधानमंत्री का आचरण संदेह के घेरे में है. फिर भी कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बड़े ही इमानदार व्यक्ति हैं.

Amit के द्वारा
December 1, 2010

कांग्रेस भ्रष्ट्राचारियो की गंगा

rajeev dubey के द्वारा
November 30, 2010

काँग्रेस ने स्वतंत्रता के पहले की हमारी भावनाओं को भुना भुना कर गलत आचरणों पर एक लंबे समय से पर्दा डाला है । पर अब बात हद से बाहर जा चुकी है। जनता अब इन्हें जरूर सबक सिखाएगी ।

D.R. DARSHAN के द्वारा
November 30, 2010

सरदार-चोरोँ का सरदार(प्रधानमंत्री  ) सरदार-बेइमानोँ का सरदार मनमोहनःमन के दोहन सिँह- शेर की खाल वाली भेड़

आर. एन. शाही के द्वारा
November 30, 2010

कांग्रेस अब पूरी तरह बेशर्मी पर उतर आई है । घोटाले दर घोटाले उजागर होने और उनमें कांग्रेस के नुमाइंदों के बेपर्द होते चेहरों के कारण आज सत्ताधारी दल अपने को कुछ वैसी ही स्थिति में महसूस कर रहा है, जैसे कोई सफ़ेदपोश कालगर्ल एक से अधिक बार छापे में पकड़ ली जाय । नटिनी जब बांस पर चढ़ ही गई, तो फ़िर घूंघट उतार कर अपनी गर्दन किसी भी तरह रस्सी की फ़ांस से छुड़ाने की यह बेशर्म क़वायद शायद अब कांग्रेस को हमेशा के लिये ही महंगी पड़ जाय । साधुवाद ।


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