blogid : 133 postid : 999

कठिन दौर में कांग्रेस

Posted On: 22 Nov, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कांग्रेसनीत संप्रग के लिए नवंबर का माह बेहद कठिन रहा। इस महीने अशोक चह्वाण को आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले में संलिप्तता के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और शर्मसार पार्टी को बदनाम हो चुके सुरेश कलमाड़ी को राजनीतिक पद से हटाने को मजबूर होना पड़ा। इससे भी बदतर यह रहा कि विपक्ष के जबरदस्त दबाव के कारण विवादित संचार मंत्री से इस्तीफा लेना पड़ा। इसके अलावा कैग द्वारा प्रधानमंत्री को मात्र मूकदर्शक बने रहने की टिप्पणी की शर्मिंदगी से भी पार्टी को गुजरना पड़ा।


काग्रेस के वफादार उम्मीद कर रहे थे कि देश के सबसे समृद्ध राज्य महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के खिलाफ त्वरित और कड़ी कार्रवाई करके तथा उनके स्थान पर पृथ्वीराज चह्वाण को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी की छवि बेदाग हो जाएगी। इसके बाद विपक्ष ने फिर से काग्रेस पर वार किया कि सोनिया गाधी ने अखिल भारतीय काग्रेस कमेटी के भाषण में भ्रष्टाचार के ज्वलंत मुद्दे को छुआ तक नहीं, किंतु असली मार पड़ी 2-जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के संबंध में कैग रिपोर्ट की कटु टिप्पणिया और राजा के भविष्य को लेकर किए गए मोलभाव से। सीबीआई द्वारा मामले की लीपापोती और सॉलिसिटर जनरल के दागी राजा को बचाने के प्रयासों से यह संकेत गया कि काग्रेस भ्रष्टाचार को दूर करने के बजाय घोटालों पर पर्दा डालना चाहती है। काग्रेस यह स्पष्ट करने में नितात असफल रही कि उसने गठबंधन धर्म का निर्वाह कैसे किया। केवल स्वार्थी राजनीतिक वर्ग को भाने वाली द्रमुक की लालची मागों के सामने वह नतमस्तक कैसे हो गई। इससे कुल मिलाकर लोगों में काग्रेस को लेकर चिढ़ बढ़ती चली गई।


पिछले साल के आम चुनाव के बाद से राजा का इस्तीफा विपक्ष के लिए सबसे बड़ी सफलता है। राजा बेशर्मी और राजनीतिक घृणा के प्रतीक हैं। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दो दिनों तक अड़े रहे थे कि राजा को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करेंगे, लेकिन द्रमुक के दबाव में आखिरकार उनको झुकना पड़ा था। उन्होंने अयोग्यता के आगे समझदारी को समर्पित कर दिया।


काग्रेस की हीलाहवाली के पीछे एक सोच यह थी कि इसका कोई विकल्प नहीं था। राजीव गाधी को गलतफहमी थी कि बोफोर्स मुद्दा तो बस उच्च वर्ग के ड्राइंग रूम तक ही असरदार है। इस बार काग्रेस ने वही गलती नहीं दोहराई। उसने चह्वाण और राजा के साथ न चिपककर विपक्ष को कभी खत्म न होने वाला राजनीतिक बारूद नहीं दिया, लेकिन साथ ही संप्रग ने यह स्वीकार नहीं किया है कि कुल 16 माह पहले चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाला विपक्ष फिर से ताकतवर हो गया है।


इस सप्ताह बिहार के चुनाव का परिणाम घोषित होना है। जैसी सुगबुगाहट है, अगर काग्रेस बेहतर प्रदर्शन नहीं करती है और नीतीश कुमार जोरदार जीत हासिल करते हैं तो इससे बहस छिड़ जाएगी कि राहुल गाधी का जादू खत्म हो गया है। बहुत से काग्रेसी नेता जिनकी ताल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ नहीं लग रही है, अपने इस ख्याल पर पुनर्विचार करने को मजबूर हो जाएंगे कि पार्टी के वारिस के कारण सत्ताविरोधी रुझान बेअसर हो जाएंगे।


असल में, काग्रेस के पास चिंता के कारण हैं। बिहार में जनता दल -भाजपा गठबंधन की संभावित ताजपोशी ही एकमात्र संकेतक नहीं है। कर्नाटक, छत्तीसगढ़, दिल्ली और गुजरात में विधानसभा उपचुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि भाजपा में राजनीतिक विभ्रम ने जमीनी स्तर पर उसका समर्थन कम नहीं किया है, क्योंकि काग्रेस के सुधार और भाजपा की घटत में हमेशा सीधा अंतरसंबंध रहता है, इसलिए इस नाजुक सुझाव पर प्रश्नचिह्न लगना चाहिए कि काग्रेस एक वर्चस्व वाले दल के रूप में उभर रही है।


काग्रेस के लापरवाह भुलावे से भाजपा कितना फायदा उठा पाती है, यह इस पर निर्भर करेगा कि बिहार चुनाव और घोटालों से उसने क्या सबक सीखे हैं? इस संबंध में संकेत बहुत उलझे हुए हैं। अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद भाजपा ने अनुकरणीय बड़प्पन का परिचय दिया। गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह और मुसलमानों पर हमलों के आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों की गिरफ्तारी पर संसद में वह काग्रेस के उकसावे के जाल में नहीं फंसी। इसने अपनी विशिष्टता के विपरीत अनेक बार बहुत सी कटु बातों को निगला और विपक्ष की एकता को तोड़ने के काग्रेस के प्रयास को विफल कर दिया। वास्तव में, जम्मू-कश्मीर, माओवादी खतरा और परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक ने विपक्ष की एकजुटता को मजबूती से बाध दिया। दुर्भाग्य से, भाजपा ने दो लाभों को प्रत्यक्ष कमियों की वजह से गंवा दिया है। पहला है भाजपा की भ्रष्टाचार विरोधी साख पर कर्नाटक के कुछ मंत्रियों के आचरण से बट्टा लगना। नैतिक आचरण में काग्रेसियों के साथ समानता करने वालों के खिलाफ निर्णायक कदम न उठाया जाना भाजपा की सबसे बड़ी विफलता है। देर-सबेर काग्रेस इसका लाभ अवश्य उठाएगी।


दूसरे, भाजपा आरएसएस द्वारा राजनीतिक उठापटक से लगातार भयभीत है, जो न तो राजनीति में पूरी तरह उतर रहा है और न ही पूरी तरह बाहर ही है। उदाहरण के लिए आरएसएस के इस फैसले के कारण पार्टी को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी कि इंद्रेश कुमार की आतंकी तत्वों के साथ मिलीभगत के आरोप को भाजपा एक मुद्दा बनाए। आरएसएस के पूर्व प्रमुख केएस सुदर्शन के सोनिया गाधी के बारे में बेहूदा बयान से भी भाजपा की फजीहत हुई है।


निश्चित रूप से भाजपा का भविष्य राजग के पुनर्गठन और विस्तार पर निर्भर करता है। इसके दायरे में पूर्वी और दक्षिणी भारत भी लाया जाना चाहिए। यह तभी संभव है जब यह अपनी राज्य सरकारों की तर्ज पर उदारवादी और गैर अलगाववादी रुख अपनाती है। भारत एक समर्थ विपक्ष और भविष्य की सरकार के इंतजार में है। भाजपा यह स्थान भर सकती है, बशर्ते यह समावेशी नीति पर समझदारी से चले और विघटनकारी सोच को तिलाजलि दे। काग्रेस का एक सार्थक विकल्प तभी हुआ जा सकता है जब भाजपा अपनी प्रतिबद्धताओं में उदारता और साम‌र्थ्य, दोनों को शामिल करे। ये गुण अब तक भाजपा के नेतृत्व में देखने को नहीं मिल रहे हैं। ऐसा करने के लिए भाजपा को अपनी छवि संबंधी गंभीर समस्या से निपटना होगा। उसके अनेक नेता जनाधार से दूर नजर आते हैं और राष्ट्रीय राजनीति में होने के बावजूद उनमें इसके लिए जरूरी गहराई नजर नहीं आती।


[राष्ट्रीय राजनीति में नए संकेतों के बीच विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा के लिए महत्वपूर्ण अवसर देख रहे हैं स्वप्न दासगुप्ता]

Source: Jagran Yahoo

| NEXT



Tags:                         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (3 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

5 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

preetam thakur के द्वारा
November 23, 2010

महोदय जी ! ये सही है के Congress कठिन दौर से गुज़र रही है | बीजेपी की तो मूल विचारधारा और चरित्तर ही ऐसा है के बेवक़ूफ़ बनाकर अपना उल्लू सीधा करो, समाज को अंध विश्वाशों के जाल में लपेट कर रखो ताकि वो अपने विवेक का तो इस्तेमाल न करें | एक कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसकी विचारधारा देश के हर घटक को जोड़ने की क़ाबलियत रखती है | सोनिया जी की असली शक्ति है उनका इस देश के किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि सारे देश की नेता होना और फिर भी PM के पद को इनकार करना | भारत के लोगों को उनके इस जज्बे को सलाम करना ही चाहिए , तभी सोनिया जी को कड़े कदम उठाने का हौसला मिलेगा | ऐसा न हुआ तो देश के सामने कठिन समय आ सकता है |

    Amit के द्वारा
    November 24, 2010

    आजकल चापलूस लोग भी ब्लॉग मे रूचि ले रहे है..यह देश के लिए अच्छी बात है…..धीरे धीरे ज्ञान आ ही जायेगा…..और समझ पाएंगे सही बात को………

shuklaom के द्वारा
November 23, 2010

स्वप्न दस जी अपने बिलकुल सही लिखा है, जनता विकल्प तलाश रही है क्योकि उसे राहुल की नौटंकी भी नहीं भा रही है क्योकि वे बिना कुछ किये और देश की समस्यों पैर खामोसी अख्तियार कर जनता को मुर्ख बनाना चाहते है जो इनके बाप दादों ने किया अज देश को गिरोहबंदी कर जबर्दुस्त तरीके से लूटा जा रहा है और सोनिया गाँधी या तो हिस्सा प् रही है या अपने बेटे को प्रधानमंत्री बावने की चाह में अपने विदेशी होने पर मुहर लगवा रही है क्योकि एक राष्ट्रिय सोच का आदमी सिर्फ और सिर्फ अपने बेटे के लिए लाखो करोड़ उस देश का लुटावा रही है जहा आदमी कुपोषण और भूख से मर रहा है.पूरी दुनिया के किसी लोकतान्त्रिक देश में अपने व्यतिगत स्वार्थ के लिए ऐसा अंधेर सिर्फ यही संभव है.क्योकि यहाँ के कांग्रेसी एक नंबर के चापलूस,दरबारी,दलाल और लुटेरे हो९ चुके है जो कुर्सी के लिए अपने देश का ही नहीं अपने बहन—बेटी का भी ———–

Doctor Jyot के द्वारा
November 23, 2010

Congress and BJP will now have to clean corruption in their governance. Whoever does first will rule in long term. Manmohan Singh and Soniya have chance to show their real stength by punishing fast the culprits, if they want GOODWILL in the eyes of Indian Citizens.

Amit के द्वारा
November 23, 2010

There is a story perfactly fit on BJP…… परेशान थी चिंटू की wife Non-happening थी जो उसकी life चिंटू को न मिलता था आराम Office मैं करता काम ही काम चिंटू के boss भी थे बड़े cool Promotion को हर बार जाते थे भूल पर भूलते नहीं थे वो deadline काम तो करवाते थे रोज़ till nine चिंटू भी बनना चाहता था best इसलिए तो वो नहीं करता था rest दिन रात करता वो boss की गुलामी Position की उम्मीद मैं देता सलामी दिन गुज़रे और गुज़रे फिर साल बुरा होता गया चिंटू का हाल चिंटू को अब कुछ याद न रहता था गलती से बीवी को बेहेंजी कहता था आखिर एक दिन चिंटू को समझ आया और छोड़ दी उसने position की मोह माया बॉस से बोला , “तुम क्यों सताते हो ?” “Position के लड्डू से बुद्दू बनाते हो ” “Promotion दो वरना चला जाऊंगा ” “Position देने पर भी वापिस न आऊंगा ” Boss हँस के बोला “नहीं कोई बात ” “अभी और भी चिंटू है मेरे पास ” “यह दुनिया चिन्तुओं से भरी है ” “सबको बस आगे बढ़ने की पड़ी है ” “तुम न करोगे तो किसी और से करूँगा ” “तुम्हारी तरह एक और चिंटू बनाऊंगा ” If BJP really wants to root out congress, they have to clean themselves first.


topic of the week



latest from jagran