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अयोध्या फिर एक बार

Posted On: 30 Sep, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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देश की निगाहें पिछले कई दिनों से अयोध्या प्रकरण की ओर लगी हुई हैं. सभी के मन में बस यही उत्कंठा है कि देखते हैं फैसले में क्या होता है. पहले चौबीस सितंबर की तिथि घोषित हुई फिर उच्चतम न्यायालय ने एक हफ्ते के लिए मामले को लटका दिया. और फिर आज यानी 30 सितंबर को फैसले की घड़ी आ ही गयी.


चारो ओर भय और संदेह से ज्यादा कौतुहल का माहौल व्याप्त है लेकिन इसकी व्याख्या अलग-अलग ढंग से की जा रही है. युवा पीढ़ी हैरत में है कि भई क्या बात है चारो ओर अयोध्या-अयोध्या की रट लगी हुई है. जैसे आज कोई भूचाल आने वाला है. एक विप्लव जो सब कुछ जला के राख कर देने वाला है. इस मसले को बिलकुल भी ना जानने वाले ये कहते दिख रहे हैं कि कर्फ्यू लग सकता है इसलिए बाहर निकलना खतरनाक है.


और इस माहौल का जिम्मेदार कौन है. इतनी गहमा-गहमी के लिए क्या हमारे बुद्धिजीवी और बाजारवाद की शिकार मीडिया जिम्मेदार नहीं हैं?


कीनन ये माहौल बनाया गया है बिकने के लिए, ज्यादा से ज्यादा चर्चित होने और नाम कमाने के लिए. बाजार से पैसा तभी उगाहा जा सकता है जबकि माहौल गरम हो, लोग डर रहे हों. डर एक रोमांच देता है और कई तरह के कौतुहल भी पैदा करता है. फिर इनकी नीति सार्थक रंग दिखाती है और पैसा आने लगता है.


बुद्धिजीवियों को पता है कि किस मुद्दे पे जनता को बरगलाया जा सकता है. चाहे हिंदू हो या मुस्लिम आस्था का प्रश्न बना के किसी विवाद को कैसे भुनाया जा सकता है? मीडिया के सलाहकारों को बस यही चिंता सताती है कि फलां मुद्दे में कितना  दम है और उसका कैसे आर्थिक रूप से अधिकाधिक लाभ  लिया जा सकता है.


तमाम तरह के चिंतक एक नई चिंता में घुले चले जा रहे हैं और बिन मांगी सलाह दे रहे हैं. शांति बनाए रखने की अपीलें जारी हो रही हैं. धैर्य बनाए रखें, किसी बहकावे में ना आएं  ऐसे रटे-रटाए वाक्य कई दिनों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं.


देश का जनमत हमेशा शांति का पक्षधर रहा है . उसे धैर्य , क्षमा, संयम की शिक्षा देने की जरूरत नहीं क्योंकि ये उसे हजारो वर्षों की परंपरा से प्राप्त हैं. भारत भूमि पर निवास करने वाला प्रत्येक नागरिक ये बात भली-भांति जानता है कि उसे किन परिस्थितियों में क्या करना है  अतः  उसे ये बताने की जरूरत नहीं बल्कि जरूरत अपनी पिपाशाओं और महात्वाकांक्षाओं पे लगाम लगाने की है बाकी तो भारत की जनता खुद ही तय कर लेगी.


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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
October 1, 2010

मान्यवर महोदय,आपका विश्वास (भारत की जनता ) में प्रशंसनीय है.परन्तु कुछ ऐसे समाजविरोधी तत्व “सदा ही रहें हैं,सदा ही रहेंगें” जिनका एकमात्र उद्देश्य “न जियेंगे न जीने देंगें होता है.उनके कृत्यों का फल सबको भुगतना पड़ता है. फैसला आ गया है,प्रभु राम की कृपा,जनता की सद्बुद्धि से यहाँ सब शान्ति शान्ति है.

ms200 के द्वारा
September 30, 2010

आज हाई कोर्ट इलाहाबाद का फैसला भारत की सभी जनता को तहे दिल से स्वीकार करना चाहिए और इस मुद्दे को यही समाप्त कर भारत की भोली भाली जनता को हिंदुस्तान के चालक नेताओ को यह सबक सिखाना चहिये की हम हिन्दू और मुस्लिम एक है धर्म के नाम पर अपनी रोजी रोटी चलाने वालो को मुह तोड़ जवाब येही है

sachin kumar के द्वारा
September 30, 2010

बाब्ररी मस्जीद का फैसला आने वाला है हो सकता है इस फेसले से कुछ विवाद हो विभिन्न धार्मिक परति आपको उक्सये मंदिर और मस्जिद की बात करे तब एक बात याद रखना की दंगों में मरने वाला ना हिंदू होता है ना मुस्लिम होता है वो सिर्फ किसी का भाई, बटा बाप या किसी घर का चिराग होता है क्युंकि वो सिर्फ और सिर्फ इनसान होता है कोई हिंदू या मुस्लिम नही होता है

    Indian के द्वारा
    September 30, 2010

    फैसला आ चूका है, और एक बार फिर कोर्ट ने फैसला सुनाया तुम दंगे करो और कराओ हम साथ हैं . इसी लिए जो लोग ऐसे दंगे कराते हैं उनकी कोर्ट और मीडिया पूजा करती है. छह दिसंबर 1992: विवादित मस्जिद को विहिप, शिवसेना और भाजपा के समर्थन में हिंदू स्वयंसेवकों ने ढहाया। इसके चलते देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिनमें 2000 से अधिक लोगों की जान गई। जिन लोगो ने ये किया उनका क्या? कोर्ट के फैसले से ये साफ़ हो गया है की वो ऐसे काम और ऐसे काम करने वालो का समर्थन करती है.

    Munish के द्वारा
    October 1, 2010

    जनाब, कोर्ट ने जो भी कहा, उससे पहले, १८५८ में तथा बाद में भी अंग्रेजों के समय में कोर्ट ये कह चुका है इस तथ्य को आप क्यों नहीं मानते की विवादित स्थल पर मंदिर को तोड़कर ही मस्जिद बनायीं गयी थी, यदि पूर्व में हुए कोर्ट के निर्णयों को मान लिया गया होता तो शायद १९९२ की घटना भी न हुई होती, कोर्ट ने ये नहीं कहा की टॉम दंगे करो और कराओ हुम तुम्हारे साथ हैं, कोर्ट ने कहा है झूठ को सच – सच कहते रहने से सच नहीं हो जाता.

    Indian के द्वारा
    October 1, 2010

    इस बात के कोई सबूत नहीं हैं की मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनायीं गयी, कोर्ट ने भी एक्सेप्ट किया, और वो अगर राम जन्म भूमि होती तो १५२८ में ही वहा मस्जिद नहीं बनती और अगर बनती तो उसे कोई मुस्लिम एक्सेप्ट नहीं करता. दूसरी बात भारत हमेशा से ऋषि मुनियों का देश रहा है, जिन्हें आज से ज्यादा प्यार था राम से, अगर मंदिर तोडा जाता तो वो ऐसी अनहोनी होने नहीं देते. १९४९ मुर्तिया राखी गयी, और एक झूठ को सच बनाने का नाटक शुरू हुआ और अब कोर्ट ने उस झूठ पर सच की मुहर लगाने की कोशिश की है. और कुछ लोगो ने अपना राजनितिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए उस झूट का सहारा लिया जिसका कोई सबूत नहीं है. अगर किसी शशक ने ऐसा कोई काम किया होता तो इतिहास इसका गवाह होता. कोर्ट का ये सेकंड decision है jsine ये साबित किया की dange karane walo का वो समर्थन karti है. तुम उस सच की baat कर rahe हो jise tumhara कोर्ट भी nahi मानता. tum jin अंग्रेजो की bat kar rahe ho उनका तो siddhant yahi tha logo धर्म ke naam par ladao aur शाशन करो.

    Indian के द्वारा
    October 1, 2010

    “मस्जिद के निर्माण के लिए बाबर द्वारा या उसके आदेशानुसार किसी मंदिर को नहीं तोड़ा गया था। इसका निर्माण मंदिर के अवशेषों पर किया गया था, जो मस्जिद निर्माण से पहले लंबे समय तक खंडहर था, और इसकी कुछ सामग्री का निर्माण मस्जिद निर्माण के लिए किया गया था.” —— कोर्ट एक खंडहर को मंदिर का रूप देना झूठ या सच?

    Indian के द्वारा
    October 1, 2010

    1949 से कुछ दशक पहले से हिंदुओं ने मस्जिद के बीच वाले गुंबद के नीचे के [जहा वर्तमान में अस्थाई मंदिर है] स्थल को भगवान राम का सही जन्मस्थान मानना शुरू कर दिया —- —— कोर्ट -बीच वाले गुंबद के नीचे पहली बार मूर्ति 23 दिसंबर 1949 को तड़के रखी गई —— कोर्ट “जन्मस्थान मानना शुरू कर दिया” jis स्थान को जन्मस्थान मानना शुरू कर दिया uska bhi koi pramad nahi.

    Indian के द्वारा
    October 4, 2010

    मुझे किसी कृष्ण जन्म भूमि के दर्शन की आवश्यकता नहीं, उसकी अधिक आवश्यकता tumhe hai. wo मस्जिद भी गिरा दो यार , रोका किसने है , कोर्ट तो तुम्हारे साथ है ही, फैसला भी तुम्हारे पक्छ में होना है ये भी तुम्हे पता है. इंतज़ार किस बात का है?


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