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सावधान! कश्मीर खतरे में है

Posted On: 19 Sep, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अगर एक झूठ हजार बार दोहराया जाए तो वही सत्य लगने लगता है. कुछ ऐसी ही स्थिति कश्मीर के साथ भी है. तथाकथित उदारवादियों, निहित स्वार्थों से युक्त अलगावादियों, मीडिया के एक विशेष वर्ग और छद्म मानवाधिकारवादियों तथा विभिन्न कूटनीतिक कारणों से युक्त अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा कश्मीर की स्थिति पर ऐसी रिपोर्टें, खबरें पेश की जाती हैं, जिससे यह साबित हो कि वहां कि जनता का भारत द्वारा दमन होता रहा है और जनमत भारत विरोधी रुख अख्तियार करता जा रहा है. यकीनन यह सब कुछ एक खास उद्देश्य से परिचालित होता है तो फिर मंतव्य स्पष्ट है कि करना क्या है.


कभी स्वर्ग का दूसरा रुप कहे जाने वाले कश्मीर की हालत आज नरक के दूसरे रुप की तरह हो चुकी है. घाटी में शांति बहाली के कोई आसार नजर आते नहीं दिख रहे. अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें भी कोई उचित परिणाम नजर नहीं आया. अब तो यह लगने लगा है कि कश्मीर की आवाम का एक हिस्सा अलगावादियों जैसा बर्ताव करने लगी है.


एक बहुत पुरानी कहावत है कि अगर लकड़ियों को आप अलग-अलग तोड़ेंगे तो वह जल्दी टूट जाएँगी और अगर उन्हीं लकड़ियों को आप एक साथ गठ्ठे के रुप में तोड़ेंगे तो नामुमकिन होगा. कश्मीर में भी यही हो रहा है जिस राज्य को हमारी सरकार ने पहले ही गठ्ठे से अलग कर दिया था आज वह टूटने की ओर अग्रसर है.


कश्मीर में किसी चीज की कमी नहीं है. केन्द्र सरकार द्वारा सबसे अधिक भत्ता और अन्य वित्तीय सहायता में विशेष रियायत से लेकर विशेष राज्य का दर्जा हर चीज हर सहूलियत कश्मीर को दी गई. जिस विशेष दर्जे को कश्मीर के लिए अमृत समझा गया था वह ही इसकी एकता के पतन का कारण बनती जा रही है.


कश्मीर मुद्दा कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर हम खुले में बैठकर दस लोगों के साथ विचार- विमर्श कर लें क्योंकि यह कदम पहले उठाना था, अब तो वहां की जनता का एक हिस्सा ही अलगाववादियों का राग अलाप रही है. अलगाववादियों का असर ऐसा है कि वह चाहते हैं कि जनता किसी की ना सुने बस एकमत बनाए और जो भी करना है कर गुजरे, फिर चाहे वह भारत से अलग होना चाहे या पाकिस्तान में मिलना चाहे.


जम्मू-कश्मीर देश का एकमात्र मुस्लिम बहुल प्रांत है जहां इस्लाम के नाम पर आतंकवादियों ने स्थानीय नेताओं की मौन परस्त प्रत्यक्ष सहमति से हिंदुओं को अपमानित करके बाहर निकाल दिया है. श्रीनगर का तंत्र पूर्णत: सांप्रदायिक विद्वेष के आधार पर काम करता है. वहां लद्दाख के बौद्ध इतने संत्रस्त हैं कि उन्होंने श्रीनगर से मुक्ति के लिए लद्दाख को पृथक ‘केंद्र शासित प्रदेश’ बनाने का आंदोलन छेड़ा और स्थानीय शासन में बहुमत हासिल किया.


लेकिन यह सब होने के पीछे हमारे अपनों ने ही गलती की थी. नेहरू सरकार की नीति का असर है कि कश्मीर और भारत के हालात आज एक ही देश में, अपने ही एक राज्य में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान की पद्धति जैसे हो गए हैं. आज तक देश नेहरू की कश्मीर नीति का नतीजा भुगत रहा है. देश में कश्मीर के पृथक एजेंडे के विरुद्ध असंतोष और गुस्सा है. वहां धारा 370 के कारण अलगाव को मजबूती मिली है. ‘पत्थरबाजी’ इसी का नतीजा है.


आज बहुत से लोग ये कह रहे हैं कि कश्मीर से सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून को हटा लेना चाहिए शायद उन्हें इसके परिणाम का अंदाजा नहीं और यदि उन्हें मालूम है कि परिणाम क्या होगा तो इससे बड़ा धोखा राष्ट्र के क्या साथ होगा. सच तो यह है कि आज सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून की वजह से ही जो वहां थोड़ी-बहुत शांति है वरना हालात और अधिक बिगड़ भी सकते हैं.


लोगों के आक्रोश की मूल वजह नेता और नेताओं द्वारा होने वाला शोषण है. अलगाववादियों ने इसी बात का फायदा उठाते हुए वहां के कुछ लोगों को अपने साथ मिला लिया और अपने कुछ लोगों को जनता में फैला कर ऐसा दिखाने की कोशिश की है कि जनता भी अब उनके साथ है.

एकता और मजबूत शासन की कमी को अगर दूर किया जाए तो कश्मीर में दुबारा शांति बहाली की जा सकती है.


कश्मीर घाटी को पूर्ण रुप से शांत रखने और भारत राष्ट्र के प्रति निष्ठा कायम करवाने के लिए एक साथ कई विकल्पों पर कार्य करने की आवश्यकता है. सबसे पहला और सबसे जरुरी तत्व है भारत विरोधी प्रचार माध्यमों और तत्वों पर किसी भी माध्यम से नियंत्रण कायम करना. झूठे प्रचार माध्यमों द्वारा फैलाए गए भ्रामक तथ्यों की काट पेश कर और सेना को विभिन्न शक्तियों से सुसज्जित कर इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई जा सकती है. घाटी के विकास, बेरोजगारी-गरीबी दूर करके और बदहाल क्षेत्रों की तरफ विशेष ध्यान देकर जनता को अलगाववादियों के चंगुल से मुक्त करवाया जा सकता है.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atharvavedamanoj के द्वारा
September 20, 2010

गुरु तुम संघर्ष करो ..हम तुम्हारे साथ हैं वन्देमातरम

आर.एन. शाही के द्वारा
September 20, 2010

बेबाक़, दोटूक और सटीक अभिव्यक्ति वाले विचार के लिये साधुवाद ।

preetamthakur के द्वारा
September 19, 2010

Sir! (The transliteration server is NA, submitting in English). The editorial is extremely to the point and timely depiction of this lingering problem of Kashmir. A saying in Hindi, ” Ik ghadi ka bhoola koson nikal jata hai” which conveys that one step in wrong direction and you have lost your objective. The root cause of this problem lies with the delay by Raja Hari Singh in signing the paper for merger with union of India. Those two or three days have left a permanent soar of cancer on our beloved country. Had he signed it timely India would got the legality to launch forces on the border of Kashmir with Pakistan. India behaved gentlemanly way. Kashmir was a separate State till 27 Oct 47 whereas the last date for signing the treaty was 24 Oct. Pakistan took advantage of this situation and accupied larged part by sending its Army in the garb of Kashmiri freedom fighters. The later mistakes are the offshoots of this blunder. One’s decision is as good as one’s information. The leaders of that time might have taken the best decision pn the basis of information available to them at that time. There is no use condemning the decision of the leaders of yesteryears but it is very important now to take a firm decision without fearing the consequences of political gains or loss. Peaple sacrifice their lives for the nation. Then leaders cannot not sacrifice small political gains for the nation of which they claim to be the BHAQT (DEVOTEES)? A very small segment of public of the velley concentrated around Lalchawk of Srinagar is extremely Pro-Pak. Jammu and Laddakh are completely Pro-India. The separatists may not be more than 5%. The condition of Pakistan is so worse now that no sane muslim of Kashmir will like to be part of that quagmire. This is the right time for the policy and decision makers of India to take a final and stern decision to abolish 370 and make Kashmir integeral part of India. there will be protests but there will also be jubbilations so great that the protests will not be audible. thanks for such eye opener.

K M Mishra के द्वारा
September 19, 2010

आईये हम सब मिलकर एक हुंकार भरे कि कश्मीर भारत का मुकुट है और उसे हमसे कोई छीन नहीं सकता । दुनिया को दिखा दीजिये कि हम भारतवासी कश्मीर को भारत से अलग नहीं होने देंगें । जो कोई विदेशी ताकत इस सब के पीछे है अगर वह न मानी तो उसकी भी खैर नहीं । वंदे मातरतम ।


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