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परमाणु ऊर्जा की झूठी दलीलें

Posted On: 27 Aug, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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परमाणु देनदारी कानून पर गतिरोध अभी जारी है। इस कानून के अंतर्गत दुर्घटना की स्थिति में कंपनी पर पड़ने वाली देनदारी की सीमा को बढ़ा दिया गया है। काग्रेस द्वारा प्रस्तावित कानून में इसे 500 करोड़ रुपये पर सीमित किया गया था। भाजपा इसे 1500 करोड़ कराने में सफल हुई है। यदि कोई परमाणु संयंत्र दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है तो कंपनी को अधिकतम 1500 करोड़ रुपये का मुआवजा देना होगा। शेष मुआवजा देश की सरकार देगी अथवा जनता स्वयं वहन करेगी। इस कानून का आधार है कि बिजली के उत्पादन से देश को लाभ बहुत अधिक है। इस बड़े लाभ को हासिल करने के लिए परमाणु हादसे के खर्च को हमें स्वयं वहन करना होगा, परंतु बिजली के उपयोग का वास्तव में इतना भारी लाभ होता है क्या?


बिजली की खपत से जनता को जो लाभ मिलता है उसकी तुलना बिजली की उत्पादन लागत से करनी चाहिए। यदि लाभ ज्यादा है तो अधिक मात्रा में बिजली बनानी चाहिए। लाभ कम है तो उत्पादन भी कम करना चाहिए, परंतु बिजली की खपत से होने वाले लाभ की गणना करना कठिन होता है। जैसे बच्चा रात में बिजली जलाकर पढ़ाई करता है तो उस लाभ का आकलन करना कठिन है। फिर भी अर्थशास्त्रियों ने इस गणित के लिए दूसरे उपाय निकाले हैं। पहला तरीका है कि जाच की जाए कि बिजली के लिए लोग अधिकतम कितना पैसा अदा करने को तैयार हैं। जैसे आम से मिलने वाले लाभ की गणना करनी हो तो लोगों से पूछा जा सकता है कि वे उसके लिए अधिकतम कितना पैसा देना स्वीकार करते हैं। मान लीजिए बाजार में आम का दाम 30 रुपये प्रति किलो है, परंतु ग्राहक उसके लिए 40 रुपये देने को तैयार है। अत: ग्राहक को आम की खपत से होने वाले लाभ को 10 रुपये आका जा सकता है। अर्थशास्त्र में इसे ‘उपभोक्ता की बचत’ कहते हैं।


‘द इनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ देश की प्रख्यात संस्था है। इसे ‘टेरी’ के नाम से ज्यादा जाना जाता है। टेरी ने कर्नाटक एवं हरियाणा के बिजली उपभोक्ताओं का सर्वेक्षण किया। पाया कि औद्योगिक उपभोक्ता बिजली की सप्लाई के लिए 5.20 प्रति यूनिट देने को तैयार थे। किसान केवल 3 रुपये देने को तैयार थे। यह अध्ययन 1999 में किया गया था। अत: वर्तमान में बिजली के लिए लोग अधिकतम 7 रुपये देने को तैयार होंगे। वर्तमान में कोयले से उत्पादन लागत लगभग 4 रुपये प्रति यूनिट है अत: बिजली के लाभ को 3 रुपये प्रति यूनिट माना जा सकता है। दूसरा उपाय है कि बिजली की उत्पादन लागत की दूसरे स्त्रोतों से तुलना की जाए।


मान लीजिए कि बिजली उतपादन के दो स्त्रोत हैं-जलविद्युत और थर्मल। जलविद्युत बिजली का उत्पादन मूल्य 3 रुपये प्रति यूनिट आता है और थर्मल का 4 रुपये। ऐसे में जल विद्युत के उत्पादन का लाभ 1 रुपया माना जा सकता है, क्योंकि वैकल्पिक स्त्रोत की तुलना में बिजली एक रुपया ही सस्ती होती है। जो बिजली 4 रुपये में खरीदनी होती वह जल विद्युत से तीन रुपये में उपलब्ध हो जाएगी। इसलिए लाभ एक रुपया हुआ। अधिकतम मूल्य देने को स्वीकार करने के आधार पर बिजली का लाभ 3 रुपये और वैकल्पिक स्त्रोत के आधार पर एक रुपया प्रति यूनिट आता है। औसत 2 रुपये प्रति यूनिट होता है। इस छोटे से लाभ के लिए देश की संप्रभुता और देश के पर्यावरण को दाव पर लगाना उचित नहीं है। परमाणु उर्जा के उत्पादन के लिए हमें देश को आयातित यूरेनियम पर निर्भर एवं परमाणु शक्तियों द्वारा निरीक्षण के लिए खोलना पड़ रहा है। जल विद्युत के उत्पादन के लिए अपनी पवित्र नदियों को बाधा जा रहा है। कोयले को भारी मात्रा में जलाकर हम संपूर्ण विश्व के पर्यावरण को खतरे में डाल रहे हैं। बिजली उत्पादन के इन दुष्प्रभावों की सही गणना की जाए तो बिजली का वास्तविक मूल्य 10 से 12 रुपये प्रति यूनिट बैठेगा। बिजली से मिलने वाला दो रुपये का लाभ इससे बहुत कम है। अत: बिजली का उत्पादन नियंत्रित करना चाहिए।


देश में अतिशक्तिशाली बिजली ठेकेदारों की लॉबी का वर्चस्व फैला हुआ है। इसलिए बिजली के लाभ को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जाता है। सरकार ठेकेदारों के साथ है। ठेकेदारों की यह लॉबी बुद्धिजीवियों से मनमाफिक रपट लिखा लेती है। टेरी को दो जल विद्युत परियोजनाओं के लाभ-हानि की गणना करने का ठेका नेशनल हाइड्रो पावर कार्पोरेशन ने दिया था। टेरी ने निर्णय दिया कि 2005 में एक यूनिट बिजली का लाभ 74 रुपये था। आज के दिन यह 100 रुपये होगा। ऊपर बताया गया है कि टेरी ने ही बिजली का लाभ 4 रुपये प्रति यूनिट बताया था। अब टेरी ने इसे बढ़ाकर 100 रुपये कर दिया। टेरी ने गणना की कि देश की आय 1981 में लगभग 4,500 अरब रुपये से बढ़कर 1999 में 12,000 अरब रुपये हो गई है। इसी अवधि में बिजली की खपत एक लाख मेगावाट से बढ़कर 3.8 लाख हो गई थी। आय तथा बिजली का परस्पर संबंध मानते हुए टेरी ने निर्णय दिया कि एक यूनिट बिजली से देश की आय में 100 रुपये की वृद्धि होती है।

टेरी द्वारा दिए गए इस निर्णय में पेंच है कि देश की संपूर्ण आय को एक मात्र बिजली के कारण बताया गया है। देश के नागरिकों के श्रम, भूमि, तकनीक, पूंजी आदि के योगदान को शून्य मान लिया गया है। कुल लाभ को उत्पादन के सभी स्त्रोतों के बीच बाटना होगा, परंतु विडंबना यह है कि टेरी ने बिजली के अतिरिक्त अन्य सभी लागतों को गौण बता दिया है। बिजली ठेकेदारों ने संपूर्ण देश को भ्रमित कर रखा है कि किसी भी कीमत पर उत्तरोत्तर अधिक बिजली बनाना है।

Source: Jagran Yahoo

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर.एन. शाही के द्वारा
August 27, 2010

बिजली की आवश्यकताओं से इंकार कर पाना तो मुश्किल है । आज का समाज बिजली से ही चल रहा है । आपका मतलब अगर निवेश की तुलना में बिजली उत्पादन के सरकारी मुनाफ़े से है, तो यह एक अलग मुद्दा है । ऐसा लगता नहीं कि हम अपनी आवश्यकताओं भर बिजली पैदा कर ले रहे हैं । कोई न कोई राह तो निकालनी ही होगी कि रोशनी, सिंचाई, उत्पादन या जहाँ कहीं भी हम खपत कर रहे हैं, उतना विद्युत उत्पादन भी हो, और आंकड़ों के खेल से बिजली को घाटे का सौदा भी न बनाया जा सके । अच्छे लेख के लिये बधाई ।

अनिल के द्वारा
August 27, 2010

परमाणु ऊर्जा विधेयक के मामलें में सरकार को बडी ही सावधानी से विचार करने की जरुरत है.


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