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पाकिस्तान में मीडिया

Posted On: 29 Jul, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान में टीवी चैनलों की बाढ़ सी आ गई है। सन 2002 में पाकिस्तान में टीवी पत्रकारों की संख्या दो हजार थी, जो अब बढ़कर 11 हजार हो गई है। उनमें घोर उत्साह है और वे पाकिस्तान में हो रही सभी आतंकवादी गतिविधियां तथा राजनेताओं के भ्रष्टाचार की कहानी विस्तार से अपने चैनलों पर प्रसारित कर रहे हैं। यही नहीं, न्यायालयों में अतिविशिष्ट लोगों पर चल रहे मुकदमों पर भी तीखी टिप्पणियां की जा रही हैं, जिनमें देश के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भी शामिल हैं। जाहिर है कि इससे पाकिस्तान सरकार घबरा गई है और वह हर हालत में मीडिया का, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जल्द से जल्द मुंह बंद करना चाहती है। जल्द ही सरकार ‘पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेग्युलेटरी अथारिटी बिल’ संसद में पास करने वाली है, जिसके अनुसार जो भी पत्रकार ऐसे दृश्य अपने चैनल पर दिखाएगा जिससे सरकार की छवि बिगड़ती हो, उसे तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा हो सकती है और छह लाख रुपये का जुर्माना देना पड़ सकता है।


पाकिस्तान में आए दिन जगह-जगह आत्मघाती हमलों में सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं। एक मशहूर कहावत है कि आप जैसा बोएंगे वैसा काटेंगे। पाकिस्तान की सरकार और वहा की सेना खासकर आईएसआई ने अपने जानते आतंकवादियों को यह सोचकर भरपूर बढ़ावा दिया था कि ये आतंकवादी भारत जाकर खासकर कश्मीर में घुसपैठ करके व्यापक पैमाने पर खून खराबा करेंगे। अब वे पाकिस्तान के अंदर भी बड़े पैमाने पर ऐसी हरकतें जारी रखे हुए हैं। इन आतंकवादियों को यह जरा भी पसंद नहीं है कि पाकिस्तान सरकार अमेरिका का साथ दे।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, खासकर टीवी को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान सरकार जो कानून बनाने जा रही है उस सिलसिले में उसकी दलील है कि टीवी पत्रकार हाल में काबू से बाहर हो गये हैं। वे आतंकवादियो से बात कर उस बातचीत को अपने चैनलों पर दिखाते हैं। ये आतंकवादी जिस तरह से सरकार को डराते-धमकाते हैं और व्यापक पैमाने पर पाकिस्तान में खून-खराबा करने की धमकी देते हैं उससे आम जनता में बहुत अधिक डर बैठ गया है। आम जनता में सरकार के प्रति विश्वास भी बहुत कम रह गया है। सरकार के साथ-साथ पाकिस्तान की सेना भी इस पक्ष में है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, खासकर टीवी चैनलों पर नकेल डाली जाए। अत: नए कानून के अनुसार अब भविष्य में सभी टीवी पत्रकारों को कोई भी दृश्य टेलीकास्ट करने के पहले उसे सेना के अधिकृत अधिकारी से मंजूर कराना होगा। पाकिस्तान में समय-समय पर मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है। पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने 2007 में देश में आपातकाल की घोषणा कर दी थी और मीडिया को हिदायत कर दी थी कि कोई भी पत्रकार न्यायालय, सेना या सरकारी अफसरों की खुलेआम आलोचना नहीं कर सकता है। पाकिस्तान की मौजूदा सरकार टीवी पत्रकारों को नियंत्रित करने के लिए जो कानून बनाने जा रही है उससे पाकिस्तान में एक तरह से इमरजेंसी लागू हो जाएगी।


पाकिस्तान की जो स्थिति है वहा कभी भी कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है। ऐसे में यदि पत्रकारों पर कठोर नियंत्रण लागू किया गया तो उसके दुष्परिणाम सरकार को ही भुगतने होंगे। दुर्भाग्यवश पाकिस्तान सरकार ने भारत के उदाहरण से भी सीख नहीं ली। 1975 में भारत में इमरजेंसी लागू की गई उस समय सारे समाचार पत्रों से कहा गया था कि वे सरकार के खिलाफ कोई खबर नहीं छाप सकते हैं। दुर्भाग्यवश अखबारों का मुंह बंद कर देने के कारण तत्कालीन केंद्र सरकार को वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक पता चल ही नहीं पाया और अनजाने में सरकार एक के बाद दूसरी गलतिया करती गईं। नतीजा यह हुआ कि जब 1977 में आम चुनाव हुआ तब इंदिरा गाधी की सरकार बुरी तरह पराजित हो गई। 80 के दशक में एक हिंदी भाषी राज्य सरकार ने ‘प्रेस बिल’ लाकर समाचार पत्रों की स्वायत्ता को नियंत्रित करने का प्रयास किया था। बात जब इंदिरा गाधी तक पहुंची तब उन्होंने राज्य सरकार को बाध्य किया कि वह ‘प्रेस बिल’ वापस ले ले। कहने का अर्थ है कि पाकिस्तान सरकार को अन्य लोगों के अनुभवों से लाभ उठाना चाहिए और भूलकर भी इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

Source: Jagran Yahoo

This Hindi blog is about to Pakistan and condition of media. This blog recommended that Pakistan should not take any steps to control or censor to media voice. Free Media voice is most important thing for effective democracy.

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