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[American Policy in Afghanistan] अमेरिका की नई रणनीति

Posted On: 18 Jul, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अमेरिका, भारत, पाकिस्तान और पश्चिमी यूरोप में एक बड़ी संख्या में विश्लेषकों की यह राय है कि अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ लड़ाई जीतने की स्थिति में नहीं है और उसका काबुल से अपनी सेनाएं वापस बुलाना बस अब कुछ समय की ही बात है। पाकिस्तानी सेना ने भी यह जमकर प्रचार किया है कि उसका समर्थन अमेरिकी सेनाओं के लिए बहुत जरूरी है। भारत में भी ज्यादातर नीति-निर्माता इस धारणा पर यकीन करते हैं कि अफगानिस्तान एक युद्ध स्थल है और तालिबान वह शत्रु है जिसे परास्त किया जाना है।


हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि दुश्मन तो अल कायदा और उससे जुड़े संगठन हैं और उन्होंने जो सुरक्षित ठिकाने बना रखे हैं वही असली युद्धस्थल है। ये सुरक्षित ठिकाने पाकिस्तान में हैं। अल कायदा और उससे जुड़े संरक्षण पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के सहयोग, समर्थन और संरक्षण के बिना अपनी गतिविधियां जारी नहीं रख सकते। अफगानिस्तान में जारी संघर्ष में पाकिस्तान भले ही ऊपरी तौर पर अमेरिका का साथ दे रहा हो, लेकिन अंदर ही अंदर वह यह उम्मीद कर रहा है कि अमेरिकी सेनाएं थककर अफगानिस्तान से लौट जाएंगी। जब ऐसा होगा तो पाकिस्तान को अफगानिस्तान पर फिर से दबदबा बनाने का मौका मिल जाएगा।


अमेरिकी उम्मीदों को वे आतंकी संगठन झटका दे रहे हैं जिन्हें अतीत में पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने पाल पोसकर बड़ा किया। दोनों ही पक्षों को यह उम्मीद है कि उनका सामरिक तर्क ही अंतत: टिकेगा। अमेरिकी रणनीति जहां आतंकी समूहों के विनाश के साथ पाकिस्तानी जनता और एक देश के रूप में पाकिस्तान का भला चाहती है वहीं पाकिस्तानी सेना की रणनीति आतंकवाद को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर अमेरिका से अधिकाधिक मदद वसूलने की है। जब सितंबर 2001 में अमेरिका ने पाकिस्तान को यह अल्टीमेटम दिया था कि वह या तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसके साथ आए, अन्यथा उसे आतंकवाद के खेमे में समझा जाएगा तब अमेरिका ने यह गलत अनुमान लगाया था कि पाकिस्तान के पास यही केवल दो विकल्प हैं।


अमेरिका ने सोचा कि पाकिस्तान ने उसका साथ देने का सही विकल्प चुना है, जबकि हकीकत कुछ और ही थी। पाकिस्तानी सेना ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अमेरिकी सेनाओं का साथ देने का नाटक किया। अमेरिकी सेना, बौद्धिक वर्ग और कूटनीतिकों को यह समझने में आठ वर्ष लग गए कि पाकिस्तानी सेना समाधान का अंग नहीं, बल्कि समस्या का मुख्य कारण है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने पाकिस्तान को कैंसर सरीखी स्थिति बताया है और अमेरिकी खुफिया विभाग ने स्वीकार किया है कि पाकिस्तानी सेना अपने यहां के तालिबान के अलावा किसी अन्य आतंकी संगठन के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी।


अमेरिका के लिए निराशा के इस माहौल में राजदूत राबर्ट ब्लैकविल ने जिस नई रणनीति का प्रस्ताव रखा है वह ताजी हवा के झोंके के समान है। ब्लैकविल उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रह चुके हैं। उनकी रणनीति यह है कि उन स्थानों पर दुश्मन से जमीनी मुकाबला करने से बचा जाए जहां वह मजबूत स्थिति में है और उससे अपने पसंदीदा स्थानों पर दो-दो हाथ किए जाएं जहां हमारी स्थिति अच्छी है। इसीलिए वह अमेरिका को सलाह देते हैं कि तालिबान पश्तून अफगानिस्तान में जमीनी मुकाबला न किया जाए। ऐसे इलाकों में तालिबानों पर वायु हमले किए जाने चाहिए। इसके लिए तालिबान विरोधी गैर-पश्तून क्षेत्रों की सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अफगानिस्तान की 60 प्रतिशत आबादी गैर-पश्तून है।


इस रणनीति से अमेरिका और नाटो सेनाओं को अपनी सक्रियता का क्षेत्र सीमित करने में मदद मिलेगी। जाहिर है, इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों को नुकसान भी कम होगा तथा पाकिस्तान पर उनकी निर्भरता भी घटेगी। डूरंड रेखा के दोनों ओर तालिबान आतंकियों की सक्रियता के चलते अमेरिका की नई रणनीति पाकिस्तान की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है। अभी तक अमेरिका की रणनीति आतंकी संगठनों के नेटवर्क को बाधित करने, नष्ट करने और उन्हें परास्त करने की रही है, जिसमें पाकिस्तान की स्थिरता और एकता को कोई आंच न पहुंचाने की कोशिश भी थी, लेकिन पाकिस्तानी सेना धोखेबाजी में संलग्न रही।


अब ब्लैकविल ने जो रणनीति सामने रखी है वह नि:संदेह ओबामा प्रशासन के उस प्रभावशाली वर्ग की हताशा की सूचक है जो अब यह मांग करने लगा है कि अमेरिका को पाकिस्तान की एकता और स्थिरता की चिंता छोड़ देनी चाहिए। फिलहाल यह एक प्रतिष्ठित सामरिक विशेषज्ञ का एक प्रस्ताव भर है, लेकिन इसमें पाकिस्तान सेना के लिए यह चेतावनी निहित है कि वह अपना रवैया बदले।


अगर पाकिस्तान ऐसा नहीं करता है तो अगली समीक्षा बैठक में ओबामा ब्लैकविल रणनीति को स्वीकार कर सकते हैं। यदि वह ऐसा करते हैं तो वह यह दावा करने की स्थिति में होंगे कि वह लड़ाई छोड़ नहींरहे हैं, बल्कि केवल मजहब कट्टरपंथियों के खिलाफ नया मोर्चा खोल रहे हैं। वह अफगानिस्तान से लौटने का अपना वायदा भी पूरा कर लेंगे और आतंकी संगठनों के खिलाफ हवाई हमले जारी भी रख सकेंगे। इस स्थिति में पाकिस्तानी सेना के न केवल अफगानिस्तान में अपनी पैठ फिर से बनाने के मंसूबे पूरे नहीं हो सकेंगे, बल्कि उसे पाकिस्तान के विखंडन के खतरे से भी जूझना होगा।

Source: Jagran Yahoo

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1 प्रतिक्रिया

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kmmishra के द्वारा
July 18, 2010

काश ऐसा ही हो लेकिन संभवनाएं कम ही दिखती हैं ।


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