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भारतीय राजनीति का आईना

Posted On: 17 Jun, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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चर्चित फिल्म ‘राजनीति’ एक तरह से आज की भारतीय राजनीति का आईना है। फिल्म में सत्ता के लिए जो हिंसा, छल-फरेब, पैसों का लेन-देन, नेताओं की खरीद-फरोख्त आदि दिखाई गई है, वह सच्चाई से बहुत परे नहीं है। कुछ लोगों को यह फिल्म निराश कर सकती है, लेकिन आज हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौर के नेताओं की खेप खत्म हो चुकी है, जिन्होंने राजनीति में कदम एक मिशन के तौर पर रखा था। तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, सुभाष और अंबेडकर आदि के लिए सियासत देश सेवा का माध्यम थी। लेकिन आजादी के बाद राजनीति का धीरे-धीरे जो पतन शुरू हुआ, वह आज अपने चरम पर पहुंच चुका है। नेताओं ने राजनीति को इतना हावी कर दिया है कि हर चीज राजनीति से तय होने लगी है। हमारे नेताओं ने सभी जनतात्रिक संस्थाओं को ध्वस्त कर दिया है, पारदर्शिता खत्म हो गई है। हर काम के लिए नेताओं के चक्कर लगाइए, जुगाड़, सिफारिश या घूस दीजिए।

 

मुझे अपने अमेरिकी मित्र की बात याद आती है, जो हाल ही में भारत भ्रमण पर आए थे। मैंने उनसे पूछा कि भारत में उन्हें क्या खास लगा? उनका जवाब चौंकाने वाला था कि भारत जगह-जगह राजनीतिक पार्टियों के पोस्टर-बैनर या फिर राजनेताओं के बड़े-बड़े साइनबोर्ड या तस्वीर दिखाई पड़ती हैं। बरबस मुझे अमेरिका की याद आई। वहा इस तरह के पोस्टर और साइनबोर्ड आप नहीं पाएंगे। राजनीतिक-समाजशास्त्रियों ने अपने अध्ययनों में बताया है कि जो समाज अपेक्षाकृत बंद हो, जहां जड़ता अधिक हो और आगे बढ़ने में जाति, मजहब जैसे आदिम तत्वों की भूमिका महत्वपूर्ण हो, वहा राजनीति ही सामाजिक गतिशीलता का सबसे प्रभावी माध्यम हो जाता है। फिर सियासत सामाजिक गतिशीलता तक ही सीमित न रहकर एक कुरूप चेहरा धारण करने लगती है। यह सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ-साथ, धन कमाने का भी साधन हो जाती है।

 

राजनीतिक प्रभाव से वैध-अवैध तरीके से धन कमाना कोई गुप्त बात नहीं रह गई है। राजनीतिक प्रभाव से पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी हासिल करने से लेकर सरकारी ठेके हथियाना और काले धंधों के द्वारा करोड़ों-अरबों का घोटाला करना आम बात हो गई है। फिर, कई मामलों में नेता-मंत्री अपने को देश के कानून-संविधान आदि से भी ऊपर समझने लगते हैं।

 

संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट उल्लेख है कि कानून के समक्ष सभी समान होंगे। लेकिन इस सैद्धातिक वाक्य की पोल इसी बात से खुल जाती है कि अपवादों को छोड़ दें तो किसी भी गबन, घोटाले, अपराध, हत्या, अपहरण आदि में शामिल या लिप्त होने के बावजूद राजनेताओं का कुछ नहीं बिगड़ता। कोर्ट में मामला इस तरह उलझा दिया जाएगा, या फिर पुलिस, सीबीआई केस को इतना कमजोर कर देंगी या इतनी धीमी गति से कार्रवाई चलेगी कि मुकदमा आजीवन चलता रहेगा। अंग्रेजी उपन्यास ‘एनीमल फार्म’ की तर्ज पर नेता शायद यह सोचते हैं कि सब समान हैं किंतु वे कुछ अधिक ही समान हैं। राजनेता और मंत्री इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि तमाम सरकारी-गैर सरकारी पदों पर अवैध नियुक्तिया करवा सकते हैं। कुछ ही दिन पहले झारखंड में लोक सेवा आयोग के परिणामों के घोटाले का पर्दाफाश हुआ। सफल उम्मीदवारों में दो दर्जन नेताओं के बंधु-बाधव हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और मधु कोड़ा, पूर्व उप मुख्यमंत्री सुदेश महतो तक के लोग इन उम्मीदवारों में हैं।

 

सिपाही बहाली से लेकर शिक्षक-नियुक्ति तक में लाखों की रिश्वत चलती है। विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से लेकर लोकसेवा आयोग के सदस्यों तक की नियुक्ति ये नेता ही करते हैं। यह अलग बात है कि वे खुद चाहे मिडिल पास भी न हों। इसी तरह जिंदगी में क्रिकेट का बैट चाहे न पकड़ा हो, टेनिस का रैकेट न छुआ हो, पर खेल संगठनों के सर्वोच्च पदों पर राजनेता ही विराजमान होंगे। हर जगह उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट मिलेगा। यह अनायास नहीं कि आज देश की संसद से लेकर विधानसभाओं में अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है और बात एक पार्टी तक सीमित नहीं है। फिर नेता बनने के लिए किसी योग्यता-अर्हता की भी जरूरत नहीं। कोई कठिन परीक्षा पास नहीं करनी। अनपढ़ हों, बदमाश हों, हिस्ट्रीशीटर हों, सामाजिक-राजनीतिक जीवन का कोई अनुभव न हो; कोई बात नहीं। आपके पास धनबल, बाहुबल और जातिबल होना चाहिए; देश की भोली-भाली जनता आपको इन्हीं के आधार पर जिता देगी।

 

कम से कम अब लोगों को समझ जाना चाहिए कि क्यों हमारा देश इतने अच्छे संविधान, अच्छी नीतियों के बावजूद पीछे है। अमेरिका में राजनीतिज्ञों का वह रुतबा नहीं है, जो भारत में है। हर काम अपने रूटीन तरीके और आसानी से हो जाता है। बिजली का कनेक्शन लेना हो या कालोनी में नाली बनवाना हो, नेताओं के चक्कर काटने के कोई जरूरत नहीं। लोकतांत्रिक और शासन संस्थाएं स्वत: और सुचारू रूप से कार्य करती हैं। अगर कोई कानून तोड़ता है तो उसे सजा जरूर मिलेगी, चाहे वह राष्ट्रपति का बेटा ही क्यों न हो। बिल क्लिंटन की बेटी को कार चलाते वक्त कानून के उल्लंघन पर सजा मिली थी। वहा राजनीति में वही जाते हैं जो सचमुच सार्वजनिक जीवन से जुड़ना चाहते हैं। इस देश को अगर आगे बढ़ना है तो आम जनता और बुद्धिजीवियों को राजनीति में सकारात्मक हस्तक्षेप करना होगा। तभी हम दुनिया के सामने अपने देश और राजनीति की वह तस्वीर पेश कर सकेंगे जो ‘राजनीति’ फिल्म से अलग हो।

Source: Jagran Yahoo

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Deepak Jain के द्वारा
June 18, 2010

मनोज जी आज किसी नेता को गलत कहने से पहले हमे इस बात पर जरुर गौर करना चाहिए की उसे नेता बनाया किसने, हमने, आपने हमारे ही देश की जनता ने आज जब हम वोट देने जाते हैं हैं तो उम्मीदवार को न देखकर सिर्फ पार्टी के नाम पे ही वोट डालते हैं आज देश का हर तीसरा आदमी किसी न किसी पार्टी का कार्यकर्ता है चुनाव के समय जब नोट बाटें जाते हैं तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो इन पैसों को लेने से मना करता होगा आज हम खुद अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार को एक छोटे से चुनाव में जितने के लिए सारे गलत तरीके अपनाते हैं और हम खुद ही नेताओं को गाली देते हैं ये बात सिर्फ आपकी या मेरे नहीं है देश का हर व्यक्ति आज यही कर रह है राजनीती को भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने में हमार बहुत बड़ा योगदान है हम अपना काम निकलवाने के लिए नेता का सहारा लेते हैं , हम आज नौकरी के नाम पे लाखों रूपये देने को तैयार रहते हैं आज भ्रष्टाचार देश की जड़ों में इस कदर फ़ैल चूका है की इसे मिटा पाना बहुत मुश्किल है इसे मिटने का सिर्फ एक रास्ता है “हम बदलेंगे युग बदलेगा ” और मुझे नहीं लगता आज कोई ऐसा कर सकता है

Anuradh chaudhary के द्वारा
June 18, 2010

प्रिय मनोज जी आपने राजनी‍ति के बारे मे जो विचार व्‍यक्‍त किये वे समसामयिक है। आज हर व्‍यक्ति राजनीति मे सुधार चाहता है लेकिन सुधार कौन करेगा यही तो विचारणीय विन्‍दु है। यदि आप किसी वाप से पूछेगे कि आप अपने बेटे को क्‍या बनाना चाहते है तो हर कोई उसे सरकारी मुलाजिम बनाने की बात करेगा। कोई अपने बेटे को आई ए एस कोई डाक्‍टर कोई इन्‍जीनियर बनाना चाहेगा; लेकिन कोई अपने बेटे को राजनैतिक नेता; धार्मिक नेता या समाज सेवी बनाना नही चाहता है। जब सभी लोग राजनीति को अछूत समझेगें तो राजनीति मे सुधार कौन करेगा। राजनीति मे सुधार के लिये किसी दूसरे उपग्रह से तो कोई मानव नही आयेगा; राजनीति मे भी हम और आपको ही हस्‍तक्षेप करना होगा।

अरविन्द कुमार सोनी के द्वारा
June 17, 2010

प्रिय मनोज जी एक तरफ तो आप युवाओ को राजनीती से दूर रखने की बात कर रहे है ,वही दूसरी तरफ आज के राजनीतिज्ञों और राजनैतिक व्यवस्था को भ्रष्ट करार दे रहे है तो फिर इस समस्या का तो कोए समाधान ही नहीं निकल सकता आखिर किसी को तो आगे आना ही होगा वैसे भी ये नेता हमारे बीच से ही तो निकलते है अतः ऐसे लोगो को चुनने की जिम्मेदार जनता ही तो है इसलिए अगर आप अमेरिका के व्यवस्था से तुलना कर रहे है तो यहाँ की जनता में भी वैसी ही मानसिकता और समझ होने की आपेछा रखिए जनता में प्रचुर जागरूकता होनी चाहिए , जो राजनैतिक कटाव से तो शायद नहीं आ सकती। हर व्यक्ति अपने कम किसी भी तरीके से अपना काम निकलवाना चाहता है और ये उनपर किये गए चुनावी खर्च ही होते है जो एक सही नेता को भी अपनी लागत निकलने की निति पर चलने को विवश कर देता है और फिर वह धीरे धीरे भ्रष्ट बनता जाता है और बची खुची कसर हमारे कुछ दूषित नौकरशाह पूरी कर देते है अतः हमें हर स्तर से सोचना और सुधर करना पड़ेगा जिसमे युवाशक्ति अनिवार्य है ।

Nikhil के द्वारा
June 17, 2010

प्रिय मनोज जी, आपने राजनीति को भ्रष्ट तो कह दिया लेकिन उस भ्रष्टता को ख़तम करने के लिए युवाओं को प्रेरित करने के बजाय उन्हें राजनीति से दूर रहने की प्रेरणा दे कर; उसे मिटने की बात कैसे कर सकते हैं. मैं इस बात पे कहना चाहूँगा की युवाओं को राजनीति को एक करियर की तराह लेना पड़ेगा. जहाँ वो जैसा काम वैसा नाम वाला फ़ॉर्मूला फिट कर सकें. धन्यवाद, निखिल झा

Manoj के द्वारा
June 17, 2010

मैं आज की भ्रष्ट राजनीति को मात्र भ्रष्टाचार, गंदगी और अनुशासनहीनता की जगह मानत हू. जो राजनेता संसद में लडते हो, सभा में गाली देते हो और अश्लीलता के सारी हदें खुद ही लांघते हो उन्हें क्या कहेंगे. आज की राजनीतिइ के मेरी राय में तो यूवाओं को दूर ही रहना चाहिए वरना वह भी दूसःइअत हो जाएंगे. आज के नेता इतने भ्रष्ट है कि उन्हें देश की कोई चिंता नही कितने दंतेवाडा हो चुके, 26/11 भी हुआ, महंगाई सिर के पार चली गई, विमान हाअदसे हुए, पर मजाल की किसी नेता ने आगे आकर खुद अपने बल पर मदद की हर बार सरकार ने मुआवजे की घोषणा कर दी. और आप जानते है सरकारी घोषणाओं की हकीकत आज तक उपहार सिनेमा कांड के पीडितों का मुआवजा आज तक नही मिला. राजनीति में प्रधानमंत्री और राष्ट्र पति सब्से ऊपर होते है लेकिन भारत में अगर कोई सब्से दब्बु है तो यह मनमोहन सिंह  . इनको सिर्फ दुख व्यक्त करने आता है माना कि वह शा6त स्वभाव के है लेकिन क्या द6तेवाडा और 26/11 जैसे काण्डों पर आप शांत कैसे रह सकते है. राजनीति की बात हो और मायावती, लालू, मुलायम की बात न हो, हो ही नही सकता. भारतीय राजनीति में अगर भ्रष्टाचार का पुरुस्कार मिले तो यकीनन वहां भी इनमें से ही कोई जीतेगा.


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