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नक्सली संहार को रोमांटिक जामा पहनाते बुद्धिजीवी

Posted On: 31 May, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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माओवादियों और छद्म मार्क्सवादियों के हिंसा समर्थक विचारों से निर्दोषों की हत्या की जा रही है. देश में बुद्धिजीवियों की एक जमात ऐसी है जो इनके कृत्यों को जब-तब उचित ठहराती रही है. यही कारण है कि सरकार को ऐसे संगठनों पर अंकुश लगाने में सोचना पड़ जाता है. इस आलेख में माओवादी हिंसा पर अपने विचार व्यक्त करते तरुण विजय.

 

कन्नूर में मा‌र्क्सवादी गुंडों द्वारा बम विस्फोट में दो लोगों की हत्या किए जाने के बाद झाड़ग्राम में रेल पर हमला करके माओवादियों ने सौ से अधिक लोगों को काल का ग्रास बना दिया है. वामपंथी विचारधारा के अतिरेकी आतंकवादी पिछले दस वषरें में बारह हजार से अधिक लोगों की हत्या कर चुके हैं. पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में एक महीने के भीतर सवा सौ से अधिक नागरिकों एवं जवानों की हत्या करने वाले माओवादियों के समर्थन में लिखने वाले दिल्ली के ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो आज तक निर्दोष नागरिकों एवं प्रजारक्षक सुरक्षा सैनिकों की शहादत पर एक शब्द भी नहीं बोले. वे माओवादियों की बर्बरता को छद्म गरीबोद्धारक का आवरण पहनाने से नहीं चूकते.

 

वैसे देखा जाए तो कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुगामी कायर और डरपोक हैं. ठीक उसी तरह जैसे जिहादी आतंकवादी होते हैं. वे विदेशी पैसे और ताकत के बल पर आधुनिक हथियार खरीदते हैं और फिर निर्दोष लोगों की क्रूरतापूर्वक हत्या कर देते हैं. कम्युनिस्ट एक भी ऐसा क्षेत्र नहीं दिखा सकते, जहा उन्होंने ग्रामीण जनता को सामंतों, सरकारी अफसरों और नेताओं के शोषण से मुक्त कर जन्नत स्थापित कर दी हो. इसके विपरीत होता यह है कि जहा-जहा उनका प्रभाव बढ़ता है, वहा-वहा अस्पताल, स्कूल, गरीबों के लिए सरकारी योजनाएं बंद हो जाती हैं. माओवादी फिरौती तथा लूटपाट के बल पर हर साल 15 सौ करोड़ रुपये से अधिक की उगाही करते हैं. केवल दहशत और जान से मार डालने की धमकी देकर वे गरीब बच्चों को अपनी गुरिल्ला फौज में जबरन भर्ती करते हैं. ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब पिता द्वारा अपने बच्चे को उनकी फौज में भेजने से इनकार करने पर माओवादियों ने छोटे-छोटे बच्चों के सामने ही उनके माता-पिता की हत्या कर दी. वे जिसको चाहते हैं उसे पुलिस का मुखबिर घोषित करके मार डालते हैं.

 

छत्तीसगढ़ जैसे विशाल क्षेत्र में एक-एक कदम पर सुरक्षा व्यवस्था बैठाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है. आखिरकार सुरक्षाबल क्या किसी निजी माफिया के लिए काम करते हैं या भारतीय लोकतंत्र और संविधान के लिए? इनके भी मा-बाप, भाई-बहन, बच्चे होते हैं. इनको बर्बरतापूर्वक मारकर खुशी मनाने वाले माओवादी क्या मनुष्य कहे जा सकते हैं? पिछले दिनों संप्रग अध्यक्ष सोनिया गाधी ने काग्रेस संदेश पत्रिका में एक ऐसा लेख लिखा, जिससे नक्सलवादियों का मनोबल बढ़ा और इस समस्या से जूझ रहे गृहमंत्री चिदंबरम एवं सुरक्षा सैनिकों को धक्का लगा. चिदंबरम की नीतियों से भले ही कोई शत प्रतिशत सहमत न हो, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने पिछले गृहमंत्री शिवराज पाटिल से बेहतर कार्य कर दिखाया और भाजपा जैसे प्रमुख विपक्षी दल ने भी वैचारिक तथा राजनीतिक मतभेद भूलते हुए चिदंबरम के हाथ मजबूत करने की अपील की, लेकिन दिग्विजय सिंह और मणिशकर अय्यर जैसे नेता मानते हैं कि चिदंबरम की नीतिया ठीक नहीं हैं. वे कहते हैं कि माओवादियों से रात्रिभोज पर विकास केंद्रित चर्चा करनी चाहिए. तो क्या अब रेल दुर्घटना में मारे गए निर्दोष भारतीयों के परिजनों को साथ लेकर वे माओवादियों के साथ मधुर वार्तालाप का प्रयास करेंगे?

 

कम्युनिस्ट विचारधारा जहा कहीं भी फैली, वहीं नरसंहार हुए. स्टालिन के समय दो करोड़ से अधिक रूसी मारे गए थे. पोलपोट ने तो कंबोडिया में एक-तिहाई जनसंख्या को बर्बरतापूर्वक मरवा दिया था. माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीन की सास्कृतिक क्राति के दौरान चार करोड़ से अधिक चीनी नागरिक पाशविकता के शिकार हुए थे. केरल में मा‌र्क्सवादी आरएसएस के स्वयंसेवकों और भाजपा कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याएं कर रहे हैं. 60 के दशक में बंगाल में नक्सलवादी आंदोलन का नारा था, ‘चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन.’ उस समय इंदिरा गाधी की स्वीकृति से तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शकर राय ने दृढ़ता से नक्सलवादी आदोलन को कुचल दिया था. अब बंगाल में ही माओवादियों का इस्लामी जिहादियों, आईएसआई और उल्फा के साथ गहरा तानाबाना स्थापित हो गया है. इन हालात में नक्सलवाद की नृशंसता को विकास से जोड़ते हुए उसे रोमांटिक जामा पहनाने वालों को क्या कहा जा सकता है. जो कार्रवाई और दंड माओवादियों के विरुद्ध हो, वही माओवादियों के इन फैशनेबल शहरी समर्थकों के विरुद्ध होना चाहिए.

Source: Jagran Yahoo

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

anuj singh के द्वारा
June 7, 2010

अभी हाल में अरुन्धिती रॉय के कमेन्ट ने राजनेतिक गलियारों में हलचल मचा दी नक्सलवाद का समर्थन करने वाली अरुन्धिती ने शायद हजारो निर्दोष लोगो का खून नहीं देखा जो नक्सली हमले में मारे गए या वो शायद उस दिन का इंतजार कर रही है जब कोई उनका अपना नक्सलबाद की भेट चडेगा नक्सलवाद न तो प्रजातंत्र की समर्थक है और न उस क्रांति की पोषक जिसकी कल्पना कभी भगत सिंह, सावरकर या गाँधी ने की थी.

Dr S Shankar Singh के द्वारा
June 6, 2010

देश के स्वयंभुव बुद्धिजीवी और मानवाधिकारवादी छद्म रूप में माओवादी ही हैं. इनका काम है सिविल सोसाइटी में माओवादियों के पक्ष में भ्रम पैदा करना, माओवादियों के अमानवीय, घृणित, कुत्सित, कुकृत्यों के समर्थन में उल जलूल तर्क गढ़ना इत्यादि. लोकमान्य ज्ञानेश्वरी ट्रेन में 145 से ऊपर बेक़सूर लोगों की हत्या नें माओवादियों और उनसे सहानुभूति रखने वालों का असली घिनौना चेहरा उजागर कर दिया है. माओवादी हिंसा में इन तथाकथित बुद्धिजीवियों का उतरदायित्व सुनिश्चित किया जा चाहिए. हर मंच पर इनसे सवाल जवाब होना चाहिए इनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए.

मनोज् के द्वारा
May 31, 2010

कितने शर्म की बात है कि जिस मुद्दे पर सभी दलों को एक मत होकर बातचीत करनी चाहिए थे उसपर हमारे नेता राजनीति की रोटी सेंक रहे है , शर्म आती है भारतीय राजनीति पर. ऐसे बुध्दीजीवियों की तो बात ही मत करें जो नक्सलियों को सही मानाते है , यह सभी समाज सुधारक अपनी लोकप्रियता के लिए कसाब जैसे जल्लाद को भी बच्चा बताते है . जानते है हमरे नेता और यह बुध्धीजीवि ऐसा क्यों करते है क्योंकि उनका अपना कोई कभी इन हमलों में नही मरता न ही इन्हें कोई नुकसान होता हैं.


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