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कमजोर प्रधानमंत्री की अगुवायी का अभिशाप

Posted On: 21 May, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार ने दूसरी पारी में एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है. संप्रग की पहली पारी में सरकार के संचालन के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम बना था. सबकी सहमति से तैयार एजेंडे के अनुसार सरकार का संचालन होता था. इसलिए संप्रग-1 सरकार ज्यादा गरीबोन्मुख और जनपरस्त सरकार कही जा सकती है. किंतु संप्रग-2 सरकार निरंकुश होकर ऐसे फैसले ले रही है, जो आम लोगों के हित में नहीं हैं. इस बार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के बजाय आनन-फानन में कुछ सहयोगियों को जुटा कर सरकार बना ली गई. एक वर्ष में महंगाई आसमान छूने लगी. मुद्रास्फीति की दर दहाई अंक में पहुंच गई. खाने-पीने की वस्तुओं के दाम 20 प्रतिशत तक बढ़ गए. सरकार असहाय हालत में मूकदर्शक बनी रही. मंत्रीगण घोषणाएं करते रहे कि लोगों की कमाई बढ़ेगी तो जरूरी चीजों के दाम भी बढ़ेंगे. नई फसल आने पर खाद्य पदार्थो के दाम अपने आप घटेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

 

कृषि मंत्री की तरफ से कहा गया कि किसान को उपज का लाभकारी मूल्य दिया गया इसलिए दाम बढ़े हैं. महंगाई रोकने के ठोस उपाय ढूंढ़ने के बजाय सरकार गैर जिम्मेदाराना वक्तव्यों में उलझी रही. पिछले एक वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आई. दाल और चीनी की कमी आयात के जरिए पूरी की गई. हालांकि बाद में कृषि मंत्री ने स्वीकार किया कि अपने देश की खपत के अनुरूप चीनी का घरेलू उत्पादन हुआ है किंतु अधिकारियों ने उन्हें गन्ना और चीनी के उत्पादन के मामले में गुमराह किया. चीनी का बनावटी संकट दिखाकर सरकार ने सटोरियों और काला बाजारियों का साथ दिया और देश की जनता को लूटा.

 

पिछला एक साल भारत में चौतरफा हिंसा के लिए याद किया जाएगा. गृहमंत्री ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के साक्ष्य के 14 पुलिंदे भेजे. उन दस्तावेजों का पाकिस्तान मजाक उड़ाता रहा. मुंबई विस्फोट के दोषियों को दंडित करने का कोई प्रयत्न उसकी ओर से नहीं हुआ. फिर भारत के गृहमंत्री ने चुप्पी साध ली और पाकिस्तान के खिलाफ स्वत: बोलती बंद हो गई. अब नक्सलवाद ने उग्र रूप धारण कर लिया है. जबसे गृहमंत्री ने इसे समाप्त करने का व्रज जैसा संकल्प लिया, तबसे इसका कहर और बढ़ गया है. गृह मंत्रालय का जोर है कि नक्सलवाद के सफाये के लिए वायु सेना के इस्तेमाल की छूट मिले. भारत की सेना के समझदार अधिकारी इसके निहितार्थ समझते हैं. अपने देश के लोगों से तोप और टैंक से लड़ने के खतरनाक अंजाम हैं. नक्सली कोई परदेसी आक्रमणकारी तो नहीं. उन्हें खुफिया जानकारी और आधुनिक हथियारों की आपूर्ति तो रक्षा बल के ही लोग कर रहे हैं. वे केवल हथियारी संग्राम नहीं करते, विचार का भी आक्रमण करते हैं.

 

हथियार से सरकारी हथियार निपट सकता है क्योंकि यह ज्यादा घातक और वजनी है, लेकिन विचार से विचार नहीं टकरा सकता. सरकार तो विचारहीनता की शिकार है. उसके विचारों के प्रचारक विश्वविद्यालय स्तर से लेकर संसद के गलियारों तक हैं. नक्सलियों की बंदूक की नली से निकली गोली में विचार की भी बारूद रहती है. सरकारी स्तर पर उससे लड़ने की क्या तैयारी हुई? सिवाय इसके कि गृहमंत्री ने बौखलाहट में उन्हें कायर की संज्ञा से विभूषित कर दिया. जिससे उनमें पराक्रम दिखाने का उन्माद पैदा हुआ. इसका परिणाम दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या के रूप में सामने आया. जवानों की हत्या जिस स्थान पर हुई, वहां जाने की हिम्मत न तो गृहमंत्री जुटा पाए और न ही उनके वरिष्ठ पुलिस अधिकारी.

 

मनमोहन राज का एक वर्ष आंतरिक सुरक्षा के मामले में एक लाचार सरकार का कार्यकाल है. यह कोई मामूली अफसोस की बात नहीं है कि संसद पर हमले के दोषी को मिली फांसी की सजा की दया याचिका पर फैसला लेने के लिए गृह मंत्रालय दिल्ली सरकार को विगत तीन वर्षो में छह पत्र लिखता है और दिल्ली की मुख्यमंत्री बयान देती हैं कि उन्हें कोई पत्र मिला ही नहीं. पूर्वोत्तर में वृह्द नगा राज्य और मणिपुर का झगड़ा गंभीर हो गया है. नगा विद्रोहियों के नेता भुइया का घर मणिपुर में है. वह अपने गांव जाने की जिद पर हैं. मणिपुर सरकार ने उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है. प्रतिकार स्वरूप पूरे नेशनल हाईवे को नगा उग्रवादियों ने जाम कर पूर्वोत्तर की जनता को तबाह कर दिया. नागालैंड, मणिपुर के लिए दवाओं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति अवरुद्ध रही.

 

वह कौन सी कसौटी है जिस पर कस कर मनमोहन सरकार के एक वर्ष के कामकाज को सफल कहा जा सकता है. रेल जैसा महत्वपूर्ण विभाग, जिसे देश की जीवनरेखा कहा जाता है, पिछले साल से लावारिस हालत में हैं. ममता बनर्जी की नजर केवल बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है. मोटरमैन हड़ताल कर महानगर मुंबई को लकुवाग्रस्त कर दें, तो भी उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. रेलवे की बदइंतजामी से नई दिल्ली के आधुनिक स्टेशन पर भगदड़ में लोग मर जाएं, तो उन्हें रेलवे का दोष नजर नहीं आता. सरकार हर दुर्घटना स्थल से गायब है. जो प्रधानमंत्री एक वर्ष में एक पूर्णकालिक रेलमंत्री की तलाश नहीं कर सके, उनके सक्षम प्रधानमंत्री होने का क्या आधार है? यह अकेली सरकार है, जिसका उर्वरक मंत्री संसद की बैठकों में ही नहीं आता. संसद के सत्र के दौरान वह विदेश में छुट्टियां मनाने चला गया. जिसने विभाग का कोई काम ही न किया हो, उसकी थकान देश में नहीं, विदेश में जाकर दूर होती है.

 

मनमोहन सिंह ने देश से वायदा किया था कि सौ दिन के भीतर देश की प्रमुख समस्याओं का समाधान कर दिया जाएगा. मंत्रालयों व मंत्रियों के कामकाज का लेखा-जोखा सौ दिन की भूमिका पर निर्धारित होगा. लेकिन क्या कोई मंत्री और मंत्रालय यह दावा कर सकता है कि उसने एक साल में भी सौ दिन के अपने लक्ष्य को हासिल कर लिया. हां ये आरोप जरूर लगते रहे कि वरिष्ठ मंत्री कनिष्ठ मंत्रियों से कोई काम नहीं लेते. प्रधानमंत्री के दरबार में फरियाद गई. प्रधानमंत्री ने कनिष्ठ मंत्रियों से काम लेने का सुझाव दिया, लेकिन उस पर किसी ने अमल नहीं किया. अब तो सोनिया ने राष्ट्रीय विकास परिषद के बहाने समस्त मंत्रालयों के कामकाज पर नजर रखने के लिए एक-एक पर्यवेक्षक नियुक्त करने का फैसला किया है.

 

अर्थात कांग्रेस संगठन यह स्वीकार कर रहा है कि प्रधानमंत्री का वर्चस्व अपने ही मंत्रिमंडल पर नहीं है. मंत्रिपरिषद की निगरानी के लिए गैर मंत्री नेताओं को नियुक्त करना तो अभूतपूर्व है और इससे प्रधानमंत्री की सक्षम कार्यप्रणाली स्वत: प्रकट हो जाती है. लोग उन्हें अच्छे प्रधानमंत्री होने का प्रमाण-पत्र दे रहे हैं परंतु उसका आधार क्या है? पूरे देश की पत्र-पत्रिकाओं ने संचार मंत्रालय में स्पैक्ट्रम नीलामी की प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया. आरोप है कि इस मामले में भारी रकम की हेराफेरी मंत्री स्तर से की गई. प्रधानमंत्री जानबूझ कर मौनावलंबन कर गए. इस प्रकार के कथित विद्वानों ने विगत एक वर्ष में अपनी विद्वता का जो भद्दा प्रदर्शन किया उसे इतिहास स्मरण करता रहेगा. सरकार हर मोर्चे पर विफल है. इसलिए मनमोहन सरकार के एक वर्ष के क्रियाकलाप निराशाजनक हैं. उनकी अगुवाई में देश आगे बढ़ेगा, इसकी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है.

Source: Jagran Yahoo

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajay के द्वारा
May 21, 2010

मममोहन सिंह मे6 तो प्रधानम&ंत्री होने जैसा कुछ दिखता ही नह्यी उनसे ज्यादा तो प्रणव मुखर्जी और राहुल ज्यादा रुतबे से दिखते है. यार वह यह कब समझेंगे कि जो दिखता है वही बिकता.

sunny rajan के द्वारा
May 21, 2010

आज कल तो सक्कर भी फीकी लगती है.


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