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फ़तवों और फरमानों के बीच सिसकता इंसान

Posted On: 13 May, 2010 में

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भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, यहां संविधान द्वारा लागू कानून सर्वोपरि होता है…रुकिए यह सब शायद गलत है . अब भारत धर्मों में बंट चुका है, कानून का ठेका हमारे खाप पंचायत और मुस्लिम लीग के आला अधिकारियों ने ले रखा है. आज हर धर्म अपने धर्म को दूसरे से बड़ा मानता है और उसे दूसरा धर्म अपने धर्म के लिए खतरा नजर आता है. देश में तुगलकी फरमानों की झड़ी लग चुकी हैं.

veiled-muslim-women_7333हाल ही में भारत में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व और समय-समय पर खासकर महिलाओं  के खिलाफ फतवे जारी करने वाली संस्था दारूल उलूम, देवबंद ने अपने नए फ़रमान में कहा है कि मुस्लिम महिलाओं का पुरुषों के साथ काम करना इस्लाम धर्म के खिलाफ है और इसे हराम माना जाता है. ऐसा पहली बार नहीं जब इस संस्थान ने कोई फ़तवा सुनाया हो. हर दफा इस संस्था ने महिलाओं के खिलाफ कुछ न कुछ विवादास्पद फतवे जारी किए हैं जैसे डाई का इस्तेमाल न करना, गैर मर्दों के साथ घूमना हराम, शॉर्ट कपड़े पहनने पर फतवा और यहां तक कि सानिया मिर्जा के स्कर्ट में खेलने से लेकर उसकी शादी तक में फतवे सुनाए गए थे.

तो आइए समझते हैं आखिर फतवे में ऐसा था क्या जो इतना विवाद पैदा हुआ

फतवा इस्लाम धर्म में बडा मायने रखता है. उसे वह अल्लाह का हुक्म मानते हैं. इस्लाम धर्म हमेशा से ही धर्म के प्रति कट्टर रहा है और इस धर्म में महिलाओं की बडी इज्जत की जाती है और उन्हें पर्दे में रखने की वस्तु माना जाता है.

हां, जो फतवा हाल ही में सुनाया गया उसके मुताबिक महिलाओं का पुरूष के साथ नौकरी करना इस्लाम के खिलाफ है. इस्लाम में महिलाओं को घर के अंदर रहने की हिदायत दी गई है लेकिन अगर वे घर के बाहर काम करने जाती हैं और वो भी पुरुषों के साथ तो उन्हें बुर्का पहनकर बाहर निकलने की सलाह दी गई है .

असलियत में बात कुछ और है . शरिया जो कि इस्लाम में बहुत मायने रखता है उसके मुताबिक महिलाओं को मर्दों के साथ काम करते समय अपने कपड़े पहनने का ध्यान रखना चाहिए.

r221682_873036क्या मुस्लिम महिलाएं फतवों के बिना असुरक्षित हैं

जब भी कोई फ़तवा जारी होता है तो जो सवाल सबसे पहले मन में आता है वह है कि क्या मुस्लिम महिलाएं समाज में असुरक्षित हैं या वह अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकतीं? और क्या भारत के कानून के अलावा भी उन्हें कुछ अन्य कानूनों को मानना पड़ेगा ? खैर, भारत में दो कानूनों के विषय में हम बाद में बात करेंगे, पहले बात महिलाओं की सुरक्षा के बारे में.

दरअसल बात कुछ और है. इस्लाम जो एक तरफ महिलाओं को पर्दे में रहने का हुक्म देता है वहीं मात्र तीन बार तलाक कह बंधन से मुक्ति का फरमान भी इसी धर्म में है जनाब! इस्लाम हमेशा से पिछड़ी मानसिकता का शिकार रहा है जो महिलाओं को हमेशा पर्दे में देखना चाहता है.

क्या सही है यह

हालांकि यह सही भी है अगर इसे सही मायनों में लिया जाए. इस फतवे का जो मतलब हमने और आपने निकाला वह कई मायनों में गलत था. इस फतवे के मुताबिक सिर्फ यह कहा गया है कि महिलाओं को पुरुषों के साथ काम करते समय अपनी इज्जत और सम्मान का ख्याल रखना चाहिए. यह सही भी है आज कल जिस तरह पश्चिमी मानसिकता बढ रही है उससे काफी हद तक लोग अपने अधिकार और हद भूल जाते हैं.

लेकिन इससे हमारे मौलिक अधिकार प्रभावित होंगे. आखिर सारे अधिकार मर्दों को ही क्यों? मर्दों को सभी अधिकार होंगे और महिलाओं के कुछ नही. मर्द चाहे तो कुछ भी पहने, कहीं भी घूमें,कितनी ही महिलाओं के साथ संबंध बनाएं और महिलाएं सिर्फ पर्दे में रहें, किसी गैर मर्द से बात करें तो पर्दा.

क्या सिर्फ फतवों से ही है भारत के कानून को खतरा

हिंदुस्तान में हैं इसलिए यह नहीं कि मुस्लिमों के बारे में जो चाहा बोल दिया. भारतीय भी कट्टर होते हैं और उसके प्रत्यक्ष नमूने हैं हमारी पंचायतें और उनके आदेश. एक बार को तो फतवों के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि कम से कम भारत में उसकी वजह से किसी की हत्या तो नहीं होती बावजूद कि उसका मतलब कुछ भी हो, लेकिन हमारी पंचायतों ने तो हत्या जैसे घृणास्पद कृत्य भी किए हैं. भारत में पंचायतों का गठन और उनके अधिकारों की पैरवी की थी माननीय स्व. राजीव गांधी ने. लेकिन जो काम आज पंचायते कर रही हैं वह शायद राजीव जी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. पंचायतों की सबसे बडी भूल है उनका जाति के प्रति प्रगाढ़ स्नेह.

आए दिन यूपी, राजस्थान हरियाणा तथा अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ दिल दहला देने वाले आदेश देती हैं यह खाप पंचायतें. हाल ही में पंजाब में दो हत्याएं, राजस्थान में दिए गए फैसले इस बात को दर्शाते हैं कि शायद पंचायत कानून है.

खैर, पंचायतों के इस रवैये से तंग आकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने पंचायतों को डांटा-फटकारा , इसके बाद इनके रुख में थोडी नरमी आई. सरकार ने अब इनके अधिकार भी नियंत्रित करने का मन बनाया है. अगर फतवों के मुकाबले देखें तो खाप पंचायत और भी अधिक कातिलाना तथा नैतिकता के ठेकेदार हैं.

यह कैसा अन्याय

लेकिन एक बात गौर करने की है जहां पंचायतो का मामला था वहां सभी बड़े नेताओं ने प्रतिक्रिया की चाहे वह युवा नेता नवीन जिंदल हो या देश के गृह मंत्री चिंदबरम. लेकिन मुसलमानों के फतवों के खिलाफ सिर्फ आमजन या गिने-चुने नाम ही सामने क्यों है?

जवाब है वोट बैंक. वोट बैंक यानी मुस्लिम वोट बैंक जिस की बदौलत कई सरकारें और पार्टियां अपनी चांदी करने में लगी हैं. मुस्लिमों के मामले में कोई पार्टी या नेता इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि सब जानते हैं कि इनके मामलों, मसलों और समर्थन से वोट बैंक इक्कठा होता है. फिर चाहे गुजरात दंगे का मामला हो या जामिया में सामूहिक हत्या हर जगह मुस्लिमों को साथ लेने से कई बार सरकारें बदली हैं. अगर निकट भविष्य में भी मुस्लिम समाज के वोट का भय सताता रहा तो जल्द ही भारत में तालिबान का अस्तित्व में आना तय है.

आखिर एक देश में दो कानून कैसे और क्या है धर्म निरपेक्षता की व्याख्या

भारत के धर्म निरपेक्ष देश होने पर समय-समय पर सवाल उठे हैं. आजादी के समय से लेकर गुजरात और अयोध्या से लेकर इंदिरा गांधी हत्या प्रकरण में सब जगह वही सवाल. आखिर किस मुंह से हम अपने आप को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं.

अब वक्त आ गया है जब न्यायालय को सार्वजनिक तौर पर धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या करनी चाहिए. आज जरुरत इस बात की है कि संविधान में कुछ कड़े नियम लागू करने चाहिए जिससे इन खाप-पंचायतो और मुस्लिम संथानों पर लगाम लग सके.

एक ही देश में जब न्यायालय और सरकार पंचायतों को खरी-खोटी सुना रही हैं वहीं वह दारूल उलूम जैसी संस्थानों को कुछ क्यों नहीं बोलतीं. क्या इस देश का कानून सबके लिए अलग-अलग है.

एक आम राय

आज देश आगे बढ़ रहा है और उसे जरुरत है एक सशक्त कानून और संविधान की जिससे मालूम हो कि क्या गलत है और क्या सही? कौन अपना है और कौन पराया? अगर कोई नियम-कानून एक धर्म या समुदाय पर लागू हो तो बाकियों के लिए भी वह मान्य हो.

भारत के कानून को सर्वोपरि मानना चाहिए और अगर जरुरत पड़े तो खाप पंचायतों की तरह मुस्लिम संस्थानों को भी बख्सा नहीं जाना चाहिए. सिर्फ अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमानों को विशेषाधिकार नहीं मिलने चाहिए.

जहां तक बात है महिलाओं की तो उन्हें पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए. किसी फतवे की वजह से देश की अर्थव्यवस्था को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए. महिलाओं के हक को सिर्फ कागजों में नहीं असल जिंदगी में भी जगह मिलनी चाहिए, तभी भारत खुद को धर्मनिरपेक्ष और स्वतंत्र मान सकता हैं.

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Junaid के द्वारा
May 26, 2010

Hello Friends, First of all I think Darul-uloom should start giving fatwa against men also.why always fatwa against women. Because Quran first talks about men’s Hijab (Lowering gaze when seeing unknown woman) before women’s Hijab. Now comming to recent fatwa. Mujhe nahi lagta fatwa me kuch burai hai, Its just a reminder for muslim girls for not to display there body to unknown persons.It will just reduce the crimes which are increasing in our society day by day. Prevention is better than cure. It will have positive impact on our society. Regards, Junaid

subhash के द्वारा
May 16, 2010

sab dirty politics ka natija hai darm ko keval niji level par rakhna chahiye

razia mirza के द्वारा
May 14, 2010

इस्लाम को इन बन बैठे फ़तवाखोरों ने बदनाम कर दिया है। इस्लाम में तो स्त्री और पुरुष दोनो6 के समान अधिकार रख्खे गये हैं। पर ये लोग इस्लाम को नयी शकल देने पर आमादा हो रहे हैं। ईन तालिबानी फतवो6 का तो विरोध खुल्कर करना चाहिये। आपकी सराहनीय पोस्ट के लिये आभार।

rishabh के द्वारा
May 14, 2010

Well said. I stand with you to raise this social issue that is a hindrance to the society as a whole. Come On we like in 21st century but still our mind-set is of 18th century.

sunny rajan के द्वारा
May 14, 2010

मुस्लिम महिलाओं को सबसे ज़्यादा असुरक्षा तो इन फ़तवा सुनाने वाले लोगो से है जों उनकी आज़ादी छीन रहे है, लेकिन इसके अलावा हिदू धर्म भी इससे अछूता नहीं है जहाँ पायी जाती है खाप पंचायतों जो अपने आप को कानून से भी सर्वोच्य मानती है. क्या कभी यह हो पायेगा कि वोट बैंक की राजनीति छोड़ नेता इन श्रापों को समाज से हटा पाएंगे.

suresh sharma के द्वारा
May 14, 2010

ज़रा दारूल उलूम, देवबंद के आकाओं से पूछिए की क्या कभी मोहम्मद ने कहा था कि औरतो का उत्थान नहीं होना चाइए, क्या आदमी औरतों से उपर होते है और क्या मोहम्मद ने फ़तवा बनाया था.


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