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'वाकिंग विद द कामरेड्स' एक वामपंथी लफ्फाजी

Posted On: 12 May, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भारत के छद्म बुद्धिजीवियों का प्रपंच जाल स्वयं भारत राष्ट्र के खिलाफ ही षड़यंत्र रचता है. इन्हें हिन्दुस्तान की समरसता और सहिष्णुता से भरी संस्कृति के विरुद्ध वाहियात सोच प्रकट करने में मजा आता है क्योंकि यही सोच इन्हें प्रसिद्धि दिला रही है. अरुंधती राय भी इन्हीं बुद्धिवादियों की धारा का प्रतिनिधित्व कर रही हैं. इस आलेख में स्वतंत्र टिप्पणीकार एस. शंकर ने वामपंथी लफ्फाजियों की हानिकारक प्रवृत्तियों से आगाह किया है.

 

प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक हावर्ड फास्ट ने अमेरिका की कम्युनिस्ट पार्टी में 16 वर्ष काम किया था. वह लिखते हैं कि पार्टी से सहानुभूति रखने वाले बाहरी बुद्धिजीवियों में प्राय: पार्टी-सदस्यों से भी अधिक अंधविश्वास दिखता है. कम्युनिज्म के सिद्धांत-व्यवहार के ज्ञान या अनुभव के बदले वे अपनी कल्पना और प्रवृत्ति से अपनी राय बना लेते हैं. यह बात दुनिया भर के कम्युनिस्ट समर्थकों के लिए सच है. भारत में नवीनतम उदाहरण हैं अरुंधती राय, जिन्होंने कुछ समय से नक्सली कम्युनिस्टों के समर्थन का झंडा उठा रखा है.

 

हाल में अरुंधती दंडकारण्य में माओवादियों के साथ कुछ दिन बिता कर लौटीं. तब लिखा बीस हजार शब्दों का ‘वाकिंग विद द कामरेड्स’. इसे पढ़कर पुरानी बात याद आती है- जिस बात को साबित करना हो, उसे ही सिद्ध मान लो. भारत सरकार, राज्य पुलिस, माओवादी सेना, सलवा जुडूम, खनन कंपनियां, क्रातिकारी इतिहास, हिंदूवादी मिशनरी, आदिवासियों पर सरकारी कहर, चेयरमैन माओ, महान दृष्टा चारू मजूमदार, प्यारे-प्यारे माओवादी लड़के-लड़कियां, ग्रामीणों का नक्सल प्रेम, मीडिया की नक्सलियों के प्रति दुष्टता, निर्दोष मोहम्मद अफजल, हिंसक हिंदू उग्रवादी, बड़ा जमींदार महेंद्र करमा, भारत नामक ‘हिंदू स्टेट’, आदि अनगिनत विषय और प्रस्थापनाओं पर एक भी तथ्य उसमें नहीं मिलता. जो भी बात आती है, वह आरंभ से ही निष्कर्ष के रूप में.

 

उदाहरणार्थ, लेख के आरंभ में पी चिदंबरम को भारत के गरीबों पर छेड़े गए निर्मम युद्ध का मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहा गया है. इसी मुहावरेदार अंदाज में आगे तरह-तरह के रंग-बिरंगे और मनमाने निष्कर्ष हैं. ऐसे अनगिनत निष्कर्षों का अंतिम निष्कर्ष यह है कि सन 1947 से ही भारत एक औपनिवेशिक शक्ति है, जिसने दूसरों पर सैनिक आक्रमण करके उनकी जमीन हथियाईं. इसी तरह भारत के तमाम आदिवासी क्षेत्र स्वभाविक रूप से नक्सलवादियों के हैं, जिन पर इंडियन स्टेट ने सैनिक बल से अवैध कब्जा किया हुआ है. इस साम्राज्यवादी युद्ध-खोर ‘अपर कास्ट हिंदू स्टेट’ ने मुस्लिमों, ईसाइयों, सिखों, कम्युनिस्टों, दलितों, आदिवासियों और गरीबों के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है.

 

पूरे लेख में आदि से अंत तक स्थापित भाव है कि वास्तव में नक्सली ही वैध सत्ता हैं और भारत सरकार नितात अवैध चीज है. उसके साथ-साथ पुलिस, संविधान, कानून संहिता, न्यायालय, कारपोरेट मीडिया आदि सब कुछ मानो अपनी परिभाषा से ही बाहरी, अतिक्रमणकारी और अनुचित सत्ता हैं. जबकि नक्सली और उनकी बनाई हुई ‘जनता सरकार’ ही सत्ता के सहज अधिकारी हैं, जिन्हें जबरन बेदखल रखा जा रहा है. इसके लिए ‘द्विज/नाजी भावनाओं’ से सलवा-जुडूम नामक संगठन बनाया गया है, जिसका उद्देश्य गांवों को लूटना, जलाना, सामूहिक हत्याएं और सामूहिक दुष्कर्म करना है. संक्षेप में, भारत सरकार और राज्य सरकारें हर बुरी, घृणित, अन्यायपूर्ण चीजों की प्रतिनिधि हैं, जबकि माओवादी हर तरह की सभ्य, सुसंस्कृत, कलात्मक, मानवीय भावनाओं और गतिविधियों के संचालक व प्रेरक हैं.

 

इस तरह का लेखन वामपंथी लफ्फाजी का प्रतिनिधि नमूना है. वस्तुत: यह चारू मजूमदार और माओ के भी गुरु व्लादीमीर लेनिन की शैली का अनुकरण है. लगभग सौ साल पहले रूसी कम्युनिस्टों को सार्वजनिक लेखन-भाषण की तकनीक सिखाते हुए लेनिन ने कहा था कि जो भी तुम्हारा विरोधी या प्रतिद्वंद्वी हो, पहले उस पर ‘प्रमाणित दोषी का बिल्ला चिपका दो. उस पर मुकदमा हम बाद में चलाएंगे.’ तबसे सारी दुनिया के कम्युनिस्टों ने इस आसान पर घातक तकनीक का जमकर उपयोग किया है. अपने अंधविश्वास, संगठन बल और दुनिया को बदल डालने के रोमाटिक उत्साह से उनमें ऐसा नशा रहा है कि प्राय: किसी पर प्रमाणित दोषी का बिल्ला चिपकाने और हर तरह की गालियां देने के बाद वे मुकदमा चलाने की जरूरत भी नहीं महसूस करते!

 

इसी मानसिकता से लेनिन-स्तालिन-माओवादी सत्ताओं ने दुनिया भर में अब तक दस करोड़ से अधिक निर्दोष लोगों की हत्याएं कीं. भारत के माओवादी उनसे भिन्न नहीं रहे हैं. जिस हद तक उनका प्रभाव क्षेत्र बना है, वहां वे भी उसी प्रकार निर्मम हत्याएं करते रहे हैं. अरुंधती ने भी नोट किया है कि नक्सलियों ने गलती से निर्दोषों की भी हत्याएं की हैं. किंतु ध्यान दें, यहां निर्दोष का मतलब माओवादी-लेनिनवादी समझ से निर्दोष. न कि हमारी-आपकी अथवा भारतीय संविधान या कानून की दृष्टि से. दूसरे शब्दों में, जिसे माओवादियों और उनके अरुंधती जैसे अंध-समर्थकों ने ‘दोषी’ बता दिया, उसे तरह-तरह की यंत्रणा देकर मार डालना बिलकुल सही.

 

अरुंधती जैसे बुद्धिजीवी माओवादी, लेनिनवादी इतिहास से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं हैं. किंतु भारत, विशेषकर इसके हिंदू तत्व से उनकी घृणा मनोरोग की हद तक जा पहुंची है. उन्हें इस ‘हिंदू स्टेट’ को खत्म करना प्रधान कर्तव्य प्रतीत होता है. अरुंधती के पूरे लेख में हर तरह की भारत-विरोधी देशी-विदेशी शक्तियों के प्रति सकारात्मक भाव मौजूद है. कुल मिलाकर माओवादी अभियान के सिद्धात और व्यवहार के बारे में अरुंधती ने ऐसी मनोहारी तस्वीर खींची है, जो स्वयं माओवादी सिद्धातकारों के लेखन और दस्तावेजों में भी नहीं मिल सकती. हावर्ड फास्ट ने दूर से कम्युनिस्ट आदोलन को समर्थन देने वाले सुविधाभोगी बौद्धिकों की जड़ता को सही समझा था. यद्यपि आज के भारतीय संदर्भ में उसे एक हिंदू विरोधी अंतरराष्ट्रीय मोर्चेबंदी की अभिव्यक्ति के रूप में भी लेना चाहिए. अरुंधती का लेख दोनों ही बातों की पुष्टि करता है.

Source: Jagran Yahoo

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vikas के द्वारा
August 19, 2011

mere vichaar se lekhak ko khud dandkaranya ke jungle me ek bar jana chahiye….aur mujhe ye bhi lagta hai ki marksvad ki sthithi aapke saamne andhere me kaali billi wali hai…

Ram Kumar Pandey के द्वारा
May 19, 2010

अरुंधती राय जैसे लोग ही नक्सलियों के खिलाफ उठाने वाले क़दमों को रोक रहे हैं. देश को ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरूरी है.

पंकज साव के द्वारा
May 19, 2010

ठीक कहते हैं आप, ये लफ्फाजी नहीं तो और क्या है?

subhash के द्वारा
May 14, 2010

arudhanti gunahgar hai des ki

subhash के द्वारा
May 14, 2010

arudhanti ek ki sabse badi mujrim hai is bevkuf ko ye nahin pata loktanter hi garib ka sabse bada hathiyar hai ise barbad karke kiska bhla hoga

UTTAM KUMAR के द्वारा
May 13, 2010

अरुन्दाती तो पागल है उसे नकसली के पास भेज दो यह हिंदुस्तान ही है जो इन्हें ज्हेलता है इन्हें और जितने भी वामपंथी है इन्हें पाकिस्तान और चाइना भेज दो इन्हें अपने ओकात पता चल जायेगे

Diwakar Mani के द्वारा
May 12, 2010

एकदम सटीक अंदाज में आपने कम्युनिस्ट विचारधारा के संवाहक संततियों की पोल खोली है आपने। आलेख से पूर्णरूपेण सहमत।

navneet tripathi gorakhpur के द्वारा
May 12, 2010

कम्‍यूनिस्‍ट शुरू से ही चीजों को अपने हिसाब से परिभाषित करते रहे हैं। वे चीजों को अपने फायदे के हिसाब से परिभाषित करते रहे हैं। इस क्रम में उन्‍होंने अपने आदि देवता मार्क्‍स के विचारों तक बदल दिया। मार्क्‍स ने सर्वहारा वर्ग के क्रान्ति की बात की थी। उन्‍होंने कहा था कि दुनिया भर के मजदूर पूजीपतियों के शोषण से एक दिन इतना उब जायेंगे कि वे एक साथ क्रांति कर देंगे। सत्‍ता उनके हाथ में आ जायेगी। सर्वहारा वर्ग का अधिनायकत्‍व स्‍थापित होगा। वह पूजी का समान वितरण करेगा। जिसके बाद साम्‍यावादी व्‍यवस्‍था स्‍थापित होगी। मार्क्‍स के इस सिदधांत के बडे ध्‍वज वाहक लेनिन ने अपने फायदे के लिये मार्क के इस सिदधांत को सिर के बल खडा कर दिया, कहा सर्वहारा वर्ग नहीं बल्कि सर्वहारा पार्टी का अधिनायकत्‍व स्‍थापित होगा। बाद में स्‍टालिन महोदय ने इस सिदांधत को अपने हिसाब से परिभाषित करते हुये कहा कि न तो सर्वहारा वर्ग और न ही सर्वहारा पार्टी बल्कि सर्वहारा व्‍यक्ति का अधिनायकत्‍व स्‍थापित होगा। यह परिभाषा देने के बाद स्‍टालिन महोदय एक तरह से रूस के तानाशाह बन गये। साम्‍यवाद के मात्रि देश सोवियत रूस में उसका जनाजा उठ जाने के बाद भी खुद को सबसे बडा बुदिध्‍जीवी और अपने विचारों को अंतिम सच मानने वाले भारतीय साम्‍यवादी नक्‍सल और माओवाद जैसी असभ्‍य धारणाओं के साथ खडे हाकर साम्‍यवाद की लाश में जान फूकने की तंत्र साधना करते नजर आ रहे हैं। वे बुदिधजीवी जो लोगों की हत्‍याओं को भी सही करार देने से पीछे नहीं हट रहे।

SATYA के द्वारा
May 12, 2010

मुसलमान-मुसलमान भाई-भाई. उसी तरह कम्युनिष्ट-कम्युनिष्ट भाई-भाई हुआ करते हैं. मुसलमान मुसलमान को छोड़कर अपनी बिरादरी को नहीं मानते हैं. उसकी तरह कम्युनिष्ट भी. वो जो करते है. वही सही है, जो बोलते है, वहीं सही है. इस सिद्धांत को मानने वाले दुनिया के लिए खतरा है.

    पंकज साव के द्वारा
    May 19, 2010

    सत्या जी सही कहा है आपने। इस सच से अक्सर लोग मुँह मोड़ते हैं।


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