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राष्ट्रहित के विरुद्ध जाति गणना की कोशिश

Posted On: 10 May, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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भारत में जातिप्रथा की परंपरा हमेशा से विद्यमान रही है लेकिन स्वतंत्र भारत का भविष्य तय करते वक्त संविधानविदों ने समरसतापूर्ण समाज के निर्माण के लिए इसे एक कुप्रथा के रूप में मानकर खारिज करने की कोशिश की. राजनीतिक दलों ने अपने विशिष्ट हितों की खातिर टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव क्षेत्रों में प्रचार करने तक जाति को ही आधार बना लिया. वरन कुछ प्रदेशों में जाति आधारित राजनीति ही दलों का मुख्य एजेंडा हो गया. बात और व्यवहार में दोगलेपन की मिसाल फिर देखने को मिल रही है जबकि जनगणना में भी जाति को आधार बनाया जा रहा है. वरिष्ठ स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता ने भारत राष्ट्र को बांटने की राजनीति दलों की साजिश और उनके दोमुंहे चरित्र को उजागर करने की कोशिश की है.

 

गत सप्ताह ब्रिटिश राजनीति में छाई रही अनिश्चितता पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षक प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन और उनके साथियों की किसी भी सूरत में सत्ता में बने रहने की लालसा को देखकर हैरान हैं. साफ तौर पर घबराहट पैदा करने वाले जनादेश द्वारा नकार दिए गए ब्राउन ने खुद को आनुपातिक प्रतिनिधित्व के चैंपियन के रूप में रूपांतरित कर लिया है. यह मुद्दा इंग्लैंड की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को उतना ही प्रिय है, जितना कि भारत में भाजपा को धारा 370 का उन्मूलन. इस तथाकथित उचित व्यवस्था की पुष्टि के कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं. किंतु जो स्पष्ट नहीं है वह है लेबर पार्टी की जनादेश के संदर्भ के बिना ही राजनीतिक व्यवहार में मूल बदलाव के लिए राजी होने की दलील.

 

यह दलील दी जा सकती है क्योंकि लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन देने वाले 22.9 प्रतिशत मतदाताओं ने आनुपातिक प्रतिनिधित्व का समर्थन किया है. इसमें कुछ छोटी पार्टियों और विदेश में रह रहे लोगों के वोटों को भी जोड़ दें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एक-चौथाई मतदाता मानते हैं कि ब्रिटेन के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा चुनाव प्रणाली में बदलाव लाना है. एक-चौथाई जनादेश असंतोषजनक संख्या नहीं है. किंतु यह आंकड़ा उतना चौंकाने वाला भी नहीं है कि 75 प्रतिशत मतदाताओं ने ब्रिटेन की विद्यमान फ‌र्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट व्यवस्था पर मुहर लगाते हुए यह जनादेश दिया है कि वहां की सरकार को अपना समय और ऊर्जा आर्थिक संकट हल करने पर लगानी चाहिए.

 

समय की कसौटी पर खरा उतरने वाली चुनाव प्रणाली का लक्ष्य स्थिर सरकार का गठन है. फिर भी, यह विचारणीय है कि गार्डन ब्राउन किस ढिठाई से छोटी पार्टियों के साथ समायोजन बिठाने के मतदाताओं के जनादेश को झटक सकते हैं. यह उन लोगों द्वारा लोकतंत्र के कपटी क्षय का प्रतीक है, जो नैतिकवादी होने का दावा करते हैं. ब्राउन किसी भी कीमत पर सत्ता पाने पर आमादा हैं. यह तुच्छता है किंतु इससे भी घिनौना यह होगा अगर वे बहुमत की राय को उलट दें और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के औजार के तौर पर राजनीतिक ब्लैकमेल पर उतर आएं.

 

हितकारी राजनीति केवल पारदर्शिता के ऊपर निर्भर नहीं रहती. निर्णय लेने और सलाह-मशविरा की प्रक्रिया भी इतनी ही महत्वपूर्ण होती है. अगर इंग्लैंड इसलिए मतदान और प्रतिनिधित्व की प्रणाली में बदलाव करता है कि लेबर पार्टी को अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए कुछ सांसदों की जरूरत है, तो इसमें समझदारी नहीं होगी. जो परिवर्तन राजनीतिक मूलाधार को प्रभावित करते हैं, उन पर बड़े धैर्य और समझबूझ के साथ विचार किया जाना चाहिए.

 

यह एक सबक है जो भारत के प्रधानमंत्री और अन्य तमाम जिम्मेदार लोगों को सीखना चाहिए, जिन्होंने जातीय आधार पर जनगणना-2011 का भयावह फैसला लिया है. साठ साल पुरानी नीति को गंभीर बहस के बिना ही अचानक बदलने में षड्यंत्र की बू आ रही है. यह अपराध इसलिए और भी संगीन हो जाता है क्योंकि इतना महत्वपूर्ण फैसला बिना कोई भी तर्क दिए ले लिया गया है. 1990 में वीपी सिंह ने परेशानी पैदा कर रहे उप प्रधानमंत्री देवीलाल की प्रस्तावित रैली की हवा निकालने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था. पिछले सप्ताह, कांग्रेस अध्यक्ष ने बड़ी उदारता से जाति आधारित जनगणना को स्वीकार कर लिया क्योंकि इससे जाति-आधारित पार्टियों से कांग्रेस के बिगड़ते जा रहे रिश्तों में सुधार की आस बंधती है.

 

अंतिम निर्णय एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया जो शायद भारत में पहले जनगणना के जातीय विभाजन के कारण मची उथलपुथल से अनभिज्ञ है. नागरिक समाज से न तो विचार-विमर्श किया गया और न ही सरकार या विपक्ष ने नहीं सुझाया कि ऐसा फैसला तुच्छ निहितार्थ के कारण जल्दबाजी में नहीं लिया जा सकता. राजनीतिक वर्ग ने एक ऐसा कदम उठा लिया है जो जाति को राजनीतिक और आर्थिक निर्णय लेने में वैधानिक दर्जा प्रदान कर देगा, किंतु वे यह नहीं जानते कि इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा. सामाजिक प्रतिगमन का रास्ता खोल दिया गया क्योंकि भारतीय राजनेता बौद्धिक रूप से इतने आलसी हैं कि वे जो कर रहे हैं उसके परिणाम का अनुमान नहीं लगा पाते. अधिकारिक रूप से मान्यताप्राप्त जातिगत आधार पर हिंदू समाज की पुनर्परिभाषा भारत के परिदृश्य को बदल डालेगी. राजनीतिक मोलभाव के लिए जातीय संख्या का इस्तेमाल पहले डींग मारने के लिए किया जा चुका है, जबकि इस बार यह वास्तविक संख्या पर आधारित होगा और इसके आधार पर अधिक हिस्सेदारी की मांग की जाएगी.

 

पिछले साठ सालों से भी अधिक समय से भारतीय आधुनिकतावादियों का एक समूह या तो जातीय आग्रहों से ऊपर उठने का प्रयास करता रहा है या फिर इस सामाजिक संस्था को विवाह और विलाप के रीतिरिवाजों तक सीमित रखा है. अब एक झटके में मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने जाति को केंद्रीय बिंदु बना दिया है. अब भारत में फिर से भारतीयों को उनकी जाति से परिभाषित किया जाएगा और राजनीति भी जाति की गतिशीलता के साथ-साथ चलेगी. जैसे ही भारत बड़े लक्ष्य की दिशा में कदम बढ़ाता है, कुछ छिपे हुए हाथ इसे पीछे खींचने लगते हैं. कांग्रेस की गठबंधन प्रबंधन कुशलता की देश को भारी कीमत चुकानी पडे़गी. यह इतनी भारी होगी कि भारत में बहुत कुछ बाकी नहीं रह जाएगा.

Source: Jagran Yahoo

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

omprakashshukla के द्वारा
May 19, 2010

आपने बहुत मह्त्वापुर्द प्रश्न उठाया है हमारे यहाँ के सभी महान नेता जाति प्रथा के खिलाफ थे डॉ. भीमराव अम्बेडकर तो इसी जातिवाद के चलते हिन्दू धर्म का परित्याग तक किये थे और अज देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा की डॉ. लोहिया और जय प्रकाश नारायेंन के नाम पैर राजनीत करने वाले मुलयम ,लालू और शरद यादव को जातिवादी राजनीत करते देख ker sharm aati है.Sonia Gandhi और Manmohan की jodi gair rajneetic dhang se sochati है और दूरदर्शिता का भी abhaw है और कांग्रेस सरकार दबाव me भी है नाक्सस्ल्वाद,मूल्य वृद्धि ,आइपिल.डी.raja का bhrastachar etyadi की wajah se virodhi dalo का virodh करने की स्थिति में nahi है tatha sarkar और sahayogiyo में भी एकमत नहीं है .अपने बिलकुल ठीक likha है isaka duragami prabhaw padega jo देश के लिए atyant durbhagyashali होगा अभी भी समय है सर्कार को चाहिए की लोकसभा का विशेष सत्र बुला ker khuli bahas kara ker hikoi nirday le.

subhash के द्वारा
May 11, 2010

kahan to socha tha aajadi ke baad jati bandhan kamjor honge par ho ulta rha hai

rahim sheikh indore के द्वारा
May 11, 2010

देश एक बहुत बड़ी धर्मशाला बन गया है और जिनको हमने इसके प्रबंध का जिम्मा सोंपा है वो ही सारे कुकर्म कर रहे हैं,उन्हें सिर्फ अपनी और अपनों की चिंता है सारे देश की नहीं,अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं,भले ही इससे देश टूटता है तो उनकी बला से,हमने बौनों को बड़ा काम सोंप रखा है,हम भी बेपरवाह हैं,अब तो देश की जनता जो की इस देश की मालिक है उसे सारे जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र आदि के भेद भूलकर उठ खड़ा होना होगा और निर्णयों मैं सीधी भागीदारी रखनी होगी,एक और स्वतंत्रता संग्राम की जरूरत है इन भारतियों के भेष में “फूट डालो और राज करो” की अंग्रेजों की नीति को हो आगे बढ़ने वाले देश-द्रोहियों से, जब हमारा उद्देश्य सभी खासकर पीछे रह गए सभी लोगों का विकास है तो उसमें जाति कहाँ से आ गयी?आये तो आर्थिक स्थिति आये,शैक्षणिक स्थिति आये,सरकार कमजोर,गिद्ध तैयार कब देश मरे और उनको भोजन मिले, मालिक से ज्यादा होशियार मुनीम मालिक को ही खाता है,वोही हो रहा है,मालिक {जनता } बेपरवाह और मुनीम {नेता} दुष्ट,

DR S .N.MISHRA के द्वारा
May 10, 2010

 सही लेख .कोई कैसे बचे इन बेकार की बातो से जिसका जनता से कोई लेना देना नहीं ………………स्व हित की बाते ही राजनेता सोचते है यदि वो जनहित के बारे में सोचे तो अच्छा होगा .

priya के द्वारा
May 10, 2010

राजनेता अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए हमेशा कुछ गलत करते ही है ये कोई नयी बात नहीं है .जब तक ये नहीं सुघरेगे तब तक ये सारे विभजन होते ही रहेगे . जनता की कोई परवाह नहीं है इन लोगो को .

    Tufail A. Siddequi के द्वारा
    May 10, 2010

    प्रिया जी अभिवादन, दो-चार सौ साल बाद वह दिन जरूर आएगा, जब ये नेता लोग कहेंगे- “लो जी हम सुधर गए.” छोटा सा बच्चा भी दूध पीने के लिए रोता है, तब माँ उसे दूध पिलाती है, ऐसे में ये नेता क्या खुद सुधर जायेंगे ? सुधारने की बात कीजिये प्रिया जी. धन्यवाद.

sunny rajan के द्वारा
May 10, 2010

लोकतन्त्र सरकार का अर्थ सभी जनगणना जाति और वर्ग को समान हक प्रदान करना है. अतः आधार पर अधिक हिस्सेदारी की मांग है.

    dr.divya के द्वारा
    May 10, 2010

    sunny जी आप की बात समझ में नहीं आई ????????????????

manoj के द्वारा
May 10, 2010

बिलकुल सही मुद्दा उठाया , यह जनगणना जाति और वर्ग के आधार पर कराना सरासर गलत हैं. आखिर ऐसा करने से भारत की अखंडता को भारी दक्का लगेगा.


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