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युद्ध की आधुनिकतम प्रणाली साइबर वार

Posted On: 23 Apr, 2010 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आधुनिक युग में युद्ध केवल परंपरागत हथियारों से ही नहीं जीत लिए जाएंगे बल्कि इसमें गैर-परंपरागत हथियारों की महती भूमिका रहेगी. इसमें भी सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा साइबर वार में दक्षता हासिल करना. साइबर वार के अंतर्गत दुश्मन देश की कंप्यूटर आधारित प्रणालियों को हैक कर उससे सूचनाओं की चोरी सभी कंप्यूटर सिस्टम में उलट-पुलट कर देना आदि आते हैं. चीन अनेक देशों के विरुद्ध एक प्रकार का साइबर वार ही चला रहा है. सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस मुद्दे की गंभीरता को अपने इस आलेख में उकेरा है.

 

हाल ही में कनाडा के शोधकर्ताओं के एक समूह ने साइबर वार पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इसमें बताया गया था कि कैसे चीन के खुफिया साइबर नेटवर्क ने क्रमबद्ध तरीके से भारत के शीर्ष सुरक्षा और प्रतिरक्षा दस्तावेजों में सेंध लगाई. खुलासे ने भारतीय खुफिया तंत्र को हिलाकर रख दिया. यह स्वीकार कर पाना कतई संभव नहीं है कि इन हैकरों के पीछे चीन की सरकार का कोई हाथ नहीं था. यह नहीं माना जा सकता कि भारतीय खुफिया तंत्र के नेटवर्क में सेंध लगाकर खुफिया जानकारी हासिल करने वाले हैकर निजी तौर पर इस कृत्य में संलिप्त थे. खुफिया तंत्र से चुराई गई रक्षा व प्रतिरक्षा जानकारी का इस्तेमाल चीन अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी भारत के खिलाफ कर सकता है.

 

भारतीय रक्षा व प्रतिरक्षा नेटवर्क में सेंध लगाने वाले चीन के ये हैकर अनियमित बल जनमुक्ति सेना (पीएलए) से संबद्ध हैं. युद्ध के दौरान इसके पीछे रहते हुए या इससे मिलने वाली जानकारियों के आधार पर पारंपरिक जनमुक्ति सेना भारतीय सेना से मोर्चा लेगी. दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि नियमित पीएलए उस वक्त मोर्चा संभालेगी जब साइबर योद्धा अपने दुश्मन की रक्षा प्रणाली को बुरी तरह नुकसान पहुंचा चुके होंगे.

 

साइबर वार और सीमापारीय आतंकवाद विषम युद्ध के दो प्रमुख मोर्चे हैं. दोनों ही हमलों में हर देश ऐसे हमलावरों को शत्रु देश के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करता है जो अनियमित हों या सरकार से किसी भी तरह जुड़े हुए न हों. इस तरह के हथियारों को मदद करने वाले देश किसी देश पर होने वाले हमले में उनकी मिलीभगत से अनजान बनने का नाटक करते हैं. उदाहरण के लिए पाकिस्तान हमेशा कहता रहा है कि वह लश्कर-ए-तैयबा का भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करता है और चीन ने कहा कि भारतीय खुफिया विभाग की जानकारियां चुराने वाला चेंगदू स्थित साइबर रिंग उसका स्पाइंग आर्म नहीं है. दोनों ही मामलों में दुश्मन ने आड़ में रहकर युद्ध की विषम प्रकृति का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध किया. इंटरनेट युग में राष्ट्रीय सुरक्षा और संपन्नता को बनाए रखने के लिए साइबर स्पेस को सुरक्षित करना अहम हो गया है. इसमें इंटरनेट के जरिये वित्तीय प्रवाह और भारतीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज व आंकड़ों के साथ ही दूसरे गोपनीय दस्तावेजों को इधर-उधर करते समय अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है. साइबर क्राइम से निपटने के उपायों को प्राथमिकता के तौर पर लागू किया जाना भी जरूरी है.

 

चीन की ओर से साइबर आतंक में तेजी से बढ़ रहा है. हाल के वर्षो में भारत के नेशनल इन्फोटिक्स सेंटर सिस्टम्स और विदेश मंत्रालय साइबर हमलों के शिकार हो चुके हैं. पिछले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने खुद खुलासा किया था कि उनके कार्यालय के कंप्यूटरों को चीन ने हैक किया था. इस तरह के हमलों का उद्देश्य पड़ताल व जासूसी में उलझाकर रखने के साथ ही भारतीय सत्ता को आतंकित करना था. भारत के विशेष कार्यालयों के कंप्यूटरों में घुसकर चीन खुफिया जानकारियों को आसानी से चुरा कर रणनीतिक फायदा उठा रहा है. समय-समय पर भारतीय साइबरस्पेस में घुसपैठ कर चीन दस्तावेजों को खंगालकर युद्ध के दौरान भारतीय नेटवर्क क्षमताओं का आकलन कर सकता है. साथ ही यह भी आकलन कर सकता है कि विषम हालात में किस तरह से भारत को कमजोर किया जाए.

 

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो चीन की साइबर घुसपैठ का शिकार है. जापान, ब्रिटेन और अमेरिकी अधिकारियों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनके सरकारी और सेना नेटवर्क में चीन के हैकरों ने सेंध लगाई है. ठीक उस समय जब चीन का साइबर हमला पूरे विश्व पर हो रहा है अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि किसी भी एक देश के कंप्यूटर नेटवर्क पर किया गया हमला पूरे विश्व पर हमला माना जा सकता है. क्लिंटन के बयान से शीत युद्ध की बू आती है. कहा जा सकता है कि उनके इन्फार्मेशन कर्टेन का मतलब आयरन कर्टेन से ही था. बाजार की ताकत को इस्तेमाल करने की रणनीति और राजनीतिक प्रणाली के लिए इंटरनेट के खुले मंच की नीति अब काम नहीं कर पा रही है.
निश्चित तौर पर चीन जैसे-जैसे आर्थिक मोर्चे पर मजबूत हो रहा है, साइबरस्पेस सेंसरशिप पर उसका नियंत्रण और भी बढ़ता जा रहा है.

 

चीन ने हजारों की तादाद में साइबर पुलिस कर्मियों को लगाया है जो गैरजरूरी वेबसाइटों को बंद करने, मोबाइल फोन के इस्तेमाल की निगरानी और इंटरनेट को लगातार इस्तेमाल करने वालों को ढूंढ़ने का काम करते हैं. मगर भारत जैसे देशों पर होने वाले साइबर हमले इस बात पर कतई निर्भर नहीं हैं कि चीन घरेलू स्तर पर क्या कर रहा है. ये हमले यह जानते हुए हो रहे हैं कि इनसे मिलने वाली जानकारी का विभिन्न मोर्चो पर होने वाला इस्तेमाल अनमोल होगा. इसके जरिये विभिन्न मोर्चो पर साइबर घुसपैठ के जरिये सही समय पर दुश्मन राष्ट्र को कमजोर कर चीन बड़ा फायदा उठा सकता है.
कनाडाई शोधकर्ताओं ने पहले चीन के सर्विलांस सिस्टम घोस्टनेट का खुलासा किया था. घोस्टनेट दूसरे देशों के कंप्यूटर नेटवर्क की पड़ताल करने के बाद दस्तावेजों को चीन में मौजूद डिजिटल स्टोरेज फैसिलिटी को स्थानांतरित कर सकता है. इन्हीं शोधकर्ताओं की नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर होने वाले साइबर हमले चेंगदू से किए गए थे. चेंगदू मे पीएलए के सिग्नल इंटेलीजेंस ब्यूरो का मुख्यालय है.

 

चीन के हैकरों ने कई बार हमले के केंद्र को छुपाने की कोशिश की है. वे इन हमलों के लिए कंप्यूटर के जरिये ताईवान या रूस या क्यूबा जैसे दूसरे देशों का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं. यह ठीक उसी तरह से किया जा रहा है जैसे कि कुछ समय पहले दवाइयों के सिलसिले में चीन ने किया था. भारत के मामले में दुनिया के सामने लाया गया हैकर नेटवर्क चीन में बैठकर खुले तौर पर घुसपैठ कर रहा था. इन्फार्मेशन तकनीकी दक्षता के बावजूद भारत साइबर वारफेयर के दौरान आक्रामक या रक्षात्मक रवैया अपनाने में पूरी तरह विफल रहा है. देश में साइबर ढांचे को सुरक्षा देने के लिए मौजूद कवच बहुत ही नाजुक है और यह किसी भी हमले को रोकने में नाकाम साबित हो चुका है. युद्ध के हालात के लिहाज से भारतीय कंप्यूटर नेटवर्क नाजुक और काफी उलझा हुआ नजर आता है. शांति काल में ही चीन समय-समय पर भारत को साइबर वार के डर से भयभीत कर रहा है.

 

टकराव के दौरान चीन से किया जाने वाला साइबर हमला भारत की बड़ी प्रणाली को पंगु बना सकता है. पहले ही आतंकवाद ने लंबे समय से भारत को परेशान किया हुआ है. ऐसे में चीन की ओर से होने वाले इस नए हमले को कतई बरदास्त नहीं किया जाना चाहिए. चीन तकरीबन पिछले पांच साल से भारत पर साइबर हमले कर रहा है. एक साथ दो मोर्चो पर लड़ना भारत के लिए बहुत महंगा पड़ सकता है. भारत को कनाडा से जारी हुई रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए अपनी कमजोरियों को खत्म करना चाहिए और समय रहते सही जवाबी कार्रवाई के लिए तैयारी कर लेनी चाहिए. साथ ही दुश्मन के खेमे में घुसकर लड़ने की अपनी क्षमता का विकास करना चाहिए. कई बार आक्रामक होना रक्षात्मक होने से बेहतर साबित होता है.

Source: jagran Yahoo

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ashok Kumar Singh Bharat के द्वारा
April 29, 2010

आतंकवाद और नक्कसलवाद से जूझ रहे भारत के लिए चीन का साईबर वार भारतीय अर्थव्यवस्था और आत्मरक्षा के लिए निहायत ही एक अति चिंता का विषय है इस आलेख ने मुझको बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है क्योकि बीते दिनों पाकिस्तान में विदेश सचिव स्तर की अधिकारी माधुरी गुप्ता की दिल्ली में हुई गिफ्तारी ने तो अब हमलोगों को बहुत ही हताशा की दशा में ला छोड़ा है।इसके अलावा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लिए जासूसी के आरोप में गृहमंत्राल्राय के कुछ अन्य अधिकारियों का भी गिरफ्तार होना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। जब उच्चपदों पर आसीन भारतीय नागरिक पाकिस्तान के लिए चंद पैसों में राष्ट्रीयता को बेच रहे है, तो चीन की बात…पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। वास्तव में ऐसा लग रहा है कि देश में सभी लोग व्यापारी है, नागरिक कोई नहीं। जो अपने लाभ के लिए कुछ भी कर सकता है। आलेख के लिए चिंतक को साधुवाद। ऐसे विचारों से राष्ट्रभक्त लोग अब और भी ज्यादा सक्रिय होंगे।  

viraj sinha के द्वारा
April 23, 2010

advancement in technology is a boom but every good things has few negative aspects associated to it and cyber crime and hacking is one of its part

manoj के द्वारा
April 23, 2010

आज नही तो कल तो यह होना ही था, आखिर वैश्वीकरण के दौर में इंटरनेट का इतना उपयोग किसी और तो झुकना ही था. इंटरनेट वार में खडे दो सबसे बडे देश अमेरिका और चीन जरुर पूरी दुनिया को ले डुबेंगे. आपसी समझ की कमी और मुनाफे की चाह इन दोंनो को ऐसे रास्ते पर ले आई हैं. इस युद्ध से भारत अछुता न रहेंगा क्योंकि चीन अपनी भरपूर कोशिश करेगा कि वह हमारी कमजोर व्यवस्था पर तगडा प्रहार करें.


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