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भारत-चीन संबंध

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भारत-चीन के बीच सदियों पुराना सांस्कृतिक-राजनयिक संबंध रहा है. आजादी के पश्चात जवाहरलाल नेहरू ने चीन के साथ उसी प्रगाढ़ता के साथ संबंध कायम करने के लिए तहेदिल से प्रयास किया किंतु उसने अपनी विस्तारवादी नीति को व्यापक आयाम देते हुए भारत पर ही हमला बोल दिया. आज स्थिति यह है कि चीन वैश्विक रूप से अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए जीतोड़ प्रयास कर रहा है. ऐसे में भारत को एक सतर्क कूटनीति अपना कर अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश करनी चाहिए. इस आलेख में लेखक एवं वरिष्ठ स्तंभकार तरुण विजय ने इस मसले को गंभीरता से समझाने का प्रयास किया है.

 

विदेश मंत्री एसएम कृष्णा बीजिंग में चीन राजनयिक संबंधों के साठ वषीय उत्सव का उद्घाटन करने जा रहे हैं.यह अवसर भारत के अनसुलझे मसलों पर चर्चा का भी हो सकता है. भारत-चीन के मध्य चार हजार किलोमीटर की सीमा अनिर्णीत स्थिति में है.इसके अलावा चीन भारत के अरुणाचल प्रदेश में 83,743 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र पर दावा करता है.अकसाई चीन पर उसने 60 हजार वर्ग किलोमीटर पर कब्जा किया हुआ ही है.भारत की चतुर्दिक घेराबंदी भी उसने की है.इन सबके बावजूद चीन भारत का विश्व में सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और पूंजी निवेशक बनने की ओर बढ़ रहा है.

 

अगले महीने दिल्ली में भारत-चीन सीमा आयोग की 13वीं बैठक होने वाली है.कृष्णा इसी की तैयारी के लिए चीन जा रहे हैं.वह चीन के पुराने अध्येता और भारत की सामरिक परिस्थिति के दबावों से परिचित हैं.उनके साथ विदेश सचिव निरूपमा राव भी जा रही हैं जो चीन निष्णात हैं और चीन में राजदूत रह चुकी हैं.आशा की जानी चाहिए कि भारत-चीन संबंधों के सामरिक महत्व को समझते हुए यह यात्रा सफल होगी.भारत और चीन के बीच सैन्य तथा आर्थिक क्षमताओं के फासले काफी बढ़ गए हैं.

 

चीन का रक्षा बजट भारत के रक्षा बजट का लगभग 10 गुणा है.वह पाकिस्तान को आज भी मदद दे रहा है चूंकि उसे अपने मुस्लिम बहुल प्रदेश सिक्याग में इस्लामी आतंकवाद नियंत्रित करने में पाकिस्तान से मदद की आशा है.लेकिन वह इन सबके समानातर भारत के साथ व्यापारिक और अन्य गैर विवादित क्षेत्रों में संबंध बढ़ाते रहना चाहता है.इसके पीछे उसकी भावना यह है कि भारत पर सामरिक दबाव बनाए रखते हुए तात्कालिक विवाद की स्थिति से बचा जाए.

 

विश्व में सैन्य तथा आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए चीन को 20 वर्ष का समय चाहिए.वह भारत, अफ्रीका और अरब देशों से कच्चे माल की आपूर्ति प्राप्त करते हुए तथा भारत के सूचना विज्ञानी विशेषज्ञों से अपने यहा का आईटी स्तर बढ़ाते हुए शक्ति संचय में लगा है.इसका एक दिलचस्प उदाहरण है.भारत ने अफगानिस्तान में 1.2 अरब डालर का पूंजी निवेश कर राजमार्ग, अस्पताल और विद्यालय आदि बनवाए हैं.भारत की तुलना में चीन का पूंजी निवेश नगण्य है, लेकिन वह अफगानिस्तान से कीमती खनिज औने-पौने दामों में खरीदकर भारत द्वारा बनाए राजमार्ग का इस्तेमाल करते हुए चीन ले जा रहा है.ऐसी स्थिति में भारत की चीन नीति क्या है?

 

भारत की राजसत्ता अपने दोनों ओर परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु देशों से उत्पन्न खतरों का सामना करने के बजाय राजनीतिक प्रतिशोध और विदेशी दबावों में काम करने के रास्ते पर चल रही है.भारत को चीन के मुकाबले अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाते हुए सभ्यतामूलक हिंदू, बौद्ध पथ द्वारा अपने पड़ोसी देशों और तिब्बत, मंगोलिया एवं अन्य बौद्ध बहुल क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाना चाहिए.लेकिन दुर्भाग्य से भारत की सेक्युलर राजसत्ता भारतीय सभ्यता के मूल अधिष्ठानों के प्रति न केवल उपेक्षा का भाव बरतना अपना स्वीकार्य राजकर्म मानती है, बल्कि बौद्ध, हिंदू, सिख, जैन आदि मूल भारतीय विचारधाराओं के विश्व में प्रचार-प्रसार को अपना कर्तव्य भी नहीं समझती.

 

चीन इस मामले में नि‌र्द्र्वद्व और संदेह से परे है.इसलिए वह वर्तमान वैश्विक कूटनीतिक परिदृश्य में बुद्ध को अपनी छवि सुधारने और प्रभाव बढ़ाने का साधन बनाए हुए है.इसका असर भारत के दो अत्यंत महत्वपूर्ण सीमा क्षेत्रों लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश में भी दिखाई देने लगा है.वहां के बौद्ध घरों में चीन से छपकर आए भगवान बुद्ध के पोस्टर, चित्र, ल्हासा के चमचमाते नवीन रूप के विशाल चित्र और चीन के सामान्य जनजीवन की खुशहाली दिखाने वाले पिक्चर पोस्टकार्ड और सीडी आदि की भरमार है.इन सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय मुख्यभूमि के विभिन्न श्रेष्ठ स्थानों के चित्र न मिलकर चाइना के कारखानों से निकले उत्पाद और चित्र दिख रहे हों तो यह चीन के मानसिक युद्ध की सफलता का द्योतक है.जिस क्षेत्र पर कब्जा करना होता है पहले वहां की जनता का मन जीता जाता है.

 

भारत के नेता अमिताभ और सानिया के मुद्दों में ही उलझे रहकर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे़ प्रश्नों पर एकमत बनाने के लिए तैयार नहीं होते.इस परिस्थिति में आवश्यक है कि चीन के संदर्भ में एक राष्ट्रीय नीति बने.अधिक से अधिक चीन केंद्रित शोध केंद्र खुलें तथा भारत के युवाओं में चीनी भाषा सीखने की ललक जगे.आशा की जानी चाहिए कि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा भारत की चीन नीति को अमेरिकी प्रभाव और भारतीय क्षेत्र में प्रतिस्पद्र्धा से मुक्त रखते हुए अगले दो दशकों के लिए ऐसी सशक्त तैयारी की ओर ले जाएंगे कि चीन हमारी ओर कभी विस्तारवादी दृष्टि से देखने की हिम्मत नहीं करेगा और हम उसके कब्जे की जमीन भी वापस लेने में सफल होंगे.

 

आज तो तथाकथित चीन विशेषज्ञ ऐसी बात करने में भी संकोच करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि यदि चीन वर्तमान एलएसी अर्थात वास्तविक नियंत्रण रेखा को भारत-चीन के मध्य निर्णायक सीमा के रूप में मान्य कर ले तो यह भी काफी है.यह हारी हुई मानसिकता है.चीन अक्साई चीन पर कब्जे के बावजूद अरुणाचल पर भी हक जताने में संकोच नहीं करता.साथ ही भारत के इर्दगिर्द सामरिक घेराबंदी भी मजबूत कर रहा है ताकि आनेवाले वर्षों में भारत चीनी दबाव में प्रतिरोध का साहस ही न जुटा सके.पिछले एक वर्ष में लद्दाख और अरुणाचल सीमा पर चीन द्वारा की गई घुसपैठ की 216 से अधिक घटनाएं इसी रणनीति को दर्शाती हैं.

Source: Jagran Yahoo

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoj के द्वारा
April 6, 2010

भारत चीन के सबंध हमेशा से ही विवाद का विषय रह हैं, भारत जहां अपनी विदेश नीति के तहत जीओ और जीने दो में विश्वास रखता है वही चीन मुहं में राम बगल में छुरी रखता है. आशा है अब कोई शंका न होगी दोनों के सबंधो को लेकर.


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